गलत आर्थिक नीतियों का नतीजा है आर्थिक मंदी
गलत आर्थिक नीतियों का नतीजा है आर्थिक मंदी
सुरेश शर्मा
उम्मीद के मुताबिक अब केंद्र सरकार की ओर से भी अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आशंका प्रगट की जा रही है I कहा जा रहा है कि अर्थव्यवस्था कि अपेक्षित विकास दर प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है इसलिए सरकार के पास भी मुकाबला करने के सीमित विकल्प है I
सरकारी अर्थशास्त्रियों और योजना आयोग की इस लीपा-पोती को जायज नहीं ठहराया जा सकता बल्कि मौजूदा और आनेवाली आर्थिक स्थिति के बारे में पिछले एक साल से मैं अपने अनेकों लेखों में अपनी आशंका स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर चुका हूँ कि मंहगाई का यह दौर आर्थिक प्रगति को डस कर रहेगा I यह आशंका अब सच होती दिख रही है ,सरकार की इस बात पर आपत्ति नहीं है कि विकास के साथ मंहगाई आती है किन्तु भारत में विकास का लाभ सिर्फ सीमित लोग ही उठा रहे है जब कि मंहगाई कि मार सारी जनता पर पड़ रही है , इसका नतीजा आर्थिक मंदी के रूप में निश्चित भोगना होगा I
मंहगाई को यदि नहीं रोका गया तो आर्थिक स्थिति डगमगा जाएगी ,सरकार ने भी बार-बार मंहगाई को स्वीकार किया कितु मंहगाई विरोधी कदम के रूप में बार-बार ब्याज की दरों को बढा कर क़र्ज़ को मंहगा किया I दूसरी ओर चीनी , रसोई गैस, पेट्रोल और डीज़ल जैसी वस्तुओं को मंहगा कर जनता की कमर तोड़ दी अर्थात एक ओर क़र्ज़ महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ी तो दूसरी ओर निरंतर बढती मंहगाई से जनता की क्रय शक्ति में कमी हुई I इस प्रकार की स्थिति में आर्थिक मंदी आना नितांत स्वाभाविक है I
जहाँ तक मंहगाई को विश्व व्यापी समस्या बताने की बात है,यह भी जनता को बहकाने वाली बात है जिसे सरकार की ओर से निरंतर दोहराया जा रहा है I अमरीका तथा योरोप की आर्थिक मंदी के पीछे अमरीका तथा ग्रीस का क़र्ज़ संकट है किन्तु हमारे देश में गलत आर्थिक नीतियों के चलते इस प्रकार की स्थिति पैदा हो रही है I विकास के साथ मंहगाई इस लिए आती है की जब विकास होता है तो लोगों की आमदनी बढती है जिससे खरीदने की क्षमता बढती है तो मांग पक्ष का पलड़ा भरी पड़ जाता है ,चूँकि मांग की तुलना में उत्पादन नहीं बढ़ पाता इसलिए मूल्य वृद्धि हो जाती है यह स्वाभाविक मंहगाई कही जाती है किन्तु अपने देश में स्थिति बिलकुल उलटी है यहाँ विकास का लाभ मात्र 25 फ़ीसदी लोगों को मिला जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ गयी किन्तु खाने-पीने और जरूरी चीज़ों की मंहगाई का बोझ सारी जनता पर पड़ा और उसकी क्रय शक्ति घट कर केवल जिन्दगी गुज़ारे तक सीमित हो गयी तो उद्योगों के लिए मांग का संकट पैदा हो गया I अर्थात उत्पादक और उपभोक्ता दोनों की हालत पतली हो गयी तो निश्चित रूप से इसका जिम्मेदार सरकार की गलत आर्थिक नीतियों को ही ठहराना होगा I
जहाँ तक खाद्य मुद्रास्फीति की ऊँची दर का सवाल है यह भी विचित्र बात है कि देश के भण्डारो में 6 करोड़ टन अनाज चूहे खा रहे है ,खरीद केन्द्रों पर खुले में रखा भारी मात्रा में अनाज सड़ रहा है किन्तु गरीब आदमी के पास पेट भरने लायक अनाज खरीदने को पैसे नहीं है , ज़ाहिर है कि सटोरियों और मुनाफाखोरों की बाज़ार पर पूरी पकड़ है और बाज़ार में हस्तक्षेप न करने की सरकारी नीति उन्हें मनमानी की पूरी आज़ादी दे रही है तो खाद्य मुद्रा स्फीति की दर नीचे लाने की कल्पना कैसे की जा सकती है ?
यद्यपि जनता काफी हद तक लुट चुकी है किन्तु अब भी वक्त है की सरकार मंहगाई के खिलाफ प्रभावशाली कदम उठाये अन्यथा आर्थिक मंदी और उससे उत्पन्न होने वाली भारी बेरोज़गारी देश के आर्थिक - सामाजिक ढांचे को तहस नहस कर देगी I


