भगवा क्रांति के बहाने चंद बातें- भाग-2
जावेद अनीस
ज्यादा नहीं सिर्फ तीन साल पीछे मुड़ कर देखें तो कई ऐसी बड़ी घटनाये हुई हैं जो इस पूरी कहानी की एक सिलसिलेवार पटकथा सरीखी दिखाई पड़ती है, फिर चाहे वह जनलोकपाल आन्दोलन हो या दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद का आन्दोलन। हालांकि इन दोनों आन्दोलनों का केंद्र दिल्ली रहा है लेकिन इसका असर पूरे मुल्क में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि ये आन्दोलन किसी राजनीतिक दल के सीधी अगुआई में नहीं हुए और ना ही इसमें उनका नेतृत्व और भागेदारी थी। जनता का गुस्सा कांग्रेस सरकार के खिलाफ तो था ही लेकिन एक तरह से इसके दायरे में मुख्यधारा की सभी राजनीतिक शक्तियां शामिल थीं। माहौल बड़ा गैर राजनीतिक सा बन गया था जिसमें एक तरफ जनता थी तो दूसरी तरफ मुख्यधारा की राजनीतिक ताकतें। मजेदार बात तो यह है कि दिल्ली की चौकड़ी के नेतृत्व में भाजपा जैसी प्रमुख दल को यह सूझ ही नहीं रहा था कि वह इसको किस तरह से रिस्पांस करे, दूसरे दलों का भी कबोबेश यही हाल था।
अप्रैल 2011 में समाजसेवी अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल की अगुवाई में दिल्ली के जंतर- मंतर पर उस दौरान हुए बड़े–बड़े घोटालों के पृष्ठभूमि में यह आंदोलन हुआ। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किया गया यह आन्दोलन एक मजबूत जनलोकपाल की मांग को लेकर शुरू हुआ था, जल्दी ही इसका प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और देश भर से लोग इसके समर्थन में सड़कों पर भी उतरने लगे। इस आन्दोलन को मीडिया का भी भरपूर समर्थन रहा। मीडिया के एक वर्ग द्वारा इसकी तुलना इजिप्ट के तहरीर चौक क्रांति से की गयी। भारत में पहली बार किसी आन्दोलन के लिए सोशल नेटवर्किंग मीडिया की इस्तेमाल इतने बड़े पैमाने पर हुआ। यह एक तरह से पहला अलार्म था जो बता रहा था कि जनता में केन्द्र की सरकार और राजनेताओं के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है, लम्बे समय बाद देश का मध्यवर्ग सड़क पर आया था। इस पूरे आन्दोलन के दौरान मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार का रवैया नकारात्मक रहा तथा उन्होंने इसकी उपेक्षा की, सरकार के वजीर भी इसका मजाक उड़ाते नज़र आये। भाजपा और देश की दूसरी राजनेतिक दलों का नजरिया भी इस आन्दोलन के प्रति उदासीनता भरा रहा। बड़बोले नेताओं द्वारा “इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन” के खिलाफ अनाप शनाप बयान देकर आंदोलन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हवा ही दी गयी। यह आन्दोलन नवम्बर 2012 में अरविन्द केजरीवाल द्वारा एक नयी पार्टी बनाये जाने तक चलती रहा, बाद में इसी आन्दोलन के गर्भ से निकली “आम आदमी पार्टी” दिल्ली में सरकार बनाने में कामयाब हो गई। इस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ना केवल इस आन्दोलन को अपना समर्थन दिया बल्कि उसके स्वयंसेवक बड़े पैमाने पर इसमें भागादरी भी कर रहे थे।
दूसरा बड़ा अलार्म 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में चलती बस में एक लड़की के साथ हुये सामूहिक बलात्कार के विरोध में बाहर आया जन-सैलाब था। इस घटना ने एक तरह से देश की मानस को झकझोर दिया था और बड़ी संख्या में देश के युवाओं को इसके विरोध में सड़क पर उतर दिया। देश के सभी प्रांतों और शहरों में इस काण्ड को लेकर विरोध देखने को मिला। ख़ास बात ये थी कि इस आन्दोलन का कोई एक नेता नहीं था और इसमें अलग–अलग विचारधारा के लोग शामिल थे, यह आन्दोलन प्रमुख रूप से तत्कालीन कांग्रेस की कमजोरियों के खिलाफ था।
इन दोनों आन्दोलनों में जिस तरह से जनता का गुस्सा निकल कर आ रहा था वो इस बात की तरह इशारा था कि जनता विकल्प की तलाश में है, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और उसने अपना खेल पुराने पिच पर ही जारी रखने का निर्णय लिया। लगभग 129 साल पुरानी सत्ताधारी दल जमीनी हकीकत से कितनी दूर थी इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतना सब होने के बावजूद भी चुनाव के दौरान वह अभी भी मुसलमानों का वोट पाने के लिए “शाही इमाम” के फतवे और जाटों के वोट के लिए उन्हें आरक्षण देने का दांव चल रही थी। मुसलमानों ने तो वैसे भी शाही इमाम के आदेश पर कभी वोट नहीं डाला था लेकिन जाटों ने आरक्षण मिलने के बाद भी कांग्रेस को तो दूर उसके सहयोगी और खुद को जाटों का “चौधरी” मानने वाले अजीत सिंह को भी इस “एहसान का बदला” देने के बजाये भाजपा के साथ जाना ज्यादा मुनासिब समझा।
कांग्रेस की तरह दूसरे गैर भाजपाई दल भी जनता की मिजाज को समझने में नाकाम रहे। वामपंथियों द्वारा एक बार फिर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू की गयी, अवसरवादी पार्टियों और नेताओं के बोझ से दबे इस मोर्चे में विचारधारा के नाम पर वही “चुनावी धर्मनिरपेक्षता” का रामबाण था, इस कुनबे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में साम्प्रदायिकता के खिलाफ संयुक्त सम्मलेन से अपना आगाज किया। मंच के प्रमुख सितारों में मुलायाम सिंह यादव भी शामिल थे, जिन पर 2002 के गुजरात दंगों के बाद मुजफ्फरनगर में होने वाले सबसे बड़े दंगे का दाग है, खैर इस सम्मलेन के बाद तीसरा मोर्चा पटल से अदृश्य सा हो गया।
अरविन्द केजरीवाल ने परिस्थितियों को समझते हुए विकल्प पेश करने की कोशिश तो की लेकिन उनकी विचारधाराविहीन राजनीति, कमजोर सांगठनिक दांचा, एक साथ पूरे मुल्क में छा जाने की जल्दबाजी जैसी कमजोरियां थी जिसने एक सीमा के बाद उनके लिए रूकावट का काम किया।
इस उठापठक के बीच प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का व्यवहार विपक्षी पार्टी के बजाये सत्ताधारी दल की तरह ज्यादा था, जनवरी 2013 तक तो पार्टी की यह हालत थी कि उसके तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद इस्तीफ़ा दे रहे थे, दूसरी तरफ इसके लीडरान आपस में यह तय करने में ही व्यस्त थे कि पार्टी की तरफ से प्रधानमत्री कौन होगा, लेकिन भाजपा “पार्टी विथ डिफरेन्स” ऐसे ही नहीं है उसके पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है, इस दौर में संघ भी एक मुश्किल दौर से गुजर रहा था, तमाम कोशिशों के बाद भी संघ का विस्तार रुका हुआ था, उसकी शाखाओं में नये स्वयंसेवकों की आमद घट रही थी, कई शाखाये बंद हो रही थी, “भगवा आतंकवाद” की लौ सरसंघचालक तक पहुंचने लगी थी।
संघ को यह एक अवसर नजर आया, कह सकते हैं कि उसने बाकियों से ज्यादा जनता के बीच बदलाव की चाहत और मौजूदा सरकार के खिलाफ उबाल को समझा, इसके बाद हम देखते हैं कि परिवार के मुखिया मोहन भागवत ने किस तरह हालात को काबू में करने के लिए कमान अपने हाथ में लेते हैं, यह पहली बार था जब संघ इतने खुले तौर पर भाजपा को अपने हिसाब से हांक रहा था ताकि इस अवसर को अपने पक्ष में मोड़ा जा सके। अगर संघ के मुखिया मोहन भागवत को अभी तक का सबसे ज्यादा व्यावहारिक नजरिया रखने वाला सरसंघचालक कहा जाये तो गलत नहीं होगा, उन्होंने अपनी मूल विचारधारा से समझोता किये बिना वक्त और जरूरत के हिसाब से अपने आप को लचीला बनाया। संघ ने पार्टी में चौकड़ी को ठिकाने लगते हुए यह साफ़ कर दिया कि असली बॉस कौन है, इस बार संघ ने दावं पर अपने तुरुप के पत्ते नरेंद्र मोदी को लगाया, मोदी गुजरात के सूबेदार के तौर पर अपनी छवि हिंदुत्व के “पोस्टर ब्वॉय” के साथ “विकास पुरुष” के रूप में गढ़ने में पहले ही काफी हद तक कामयाब हो चुने थे, देश के शीर्ष उद्योगपति तो पहले से ही गुजारत में अपना “विकास” होता देख कर प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी वकालत कर ही रहे थे।
इस प्रकार संघ ने सामने आये अवसर को न सिर्फ पहचाना बल्कि अपने पुराने खोल से बाहर निकल कर इसके लिए नयी रणनीति बनायीं, जिसके तहत विकास,सुशासन के नाम पर नए नारे गढ़े गये और जातीय ध्रुवीकरण को साधने के लिए हिन्दुत्व और जाति के फर्क को कम किया गया, विवादित समझने जाने वाले एजेंडों को परदे के पीछे रखा गया लेकिन बीच–बीच में अमित शाह और गिरिराज सिंह जैसे सिपहसालारों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा की इसकी पूरी तरह से परदेदारी भी न हो।
जारी......
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जावेद अनीस, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।