गाँधी का व्यक्तित्व विराट था और उनके व्यक्तित्व और चिन्तन के अन्तरविरोध भी उतने ही गहरे थे
गाँधी का व्यक्तित्व विराट था और उनके व्यक्तित्व और चिन्तन के अन्तरविरोध भी उतने ही गहरे थे
गाँधी: एक पुनर्मूल्यांकन- भाग-1
विगत 9 सितम्बर 2014 के 'जनसत्ता' के सम्पादकीय पृष्ठ पर सुधांशु रंजन ने 'महात्मा गाँधी बनाम चर्चिल' लेख में गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोगों का प्रसंग एक बार फिर उठाया है। लेखक के अनुसार, आम लोगों की दृष्टि में विवादास्पदता के बावजूद, 'गाँधी का यह प्रयोग नायाब था, जिसे सामान्य मस्तिष्क नहीं समझ सकता' और सत्य का ऐसा टुकड़ा उनके पास था जिसने उन्हें इस ऊँचाई पर पहुँचा दिया।'
बेशक इतिहास का कोई भी जिम्मेदार अध्येता गाँधी के ब्रह्मचर्य-प्रयोगों पर उस तरह की सनसनीखेज, चटखारेदार चर्चाओं में कोई दिलचस्पी नहीं लेगा, जैसी वेद मेहता से लेकर दयाशंकर शुक्ल 'सागर' आदि लेखक अपनी पुस्तकों में करते रहे हैं। लेकिन किसी इतिहास-पुरुष के दृष्टिकोण में किसी भी प्रश्न पर यदि कोई अवैज्ञानिकता या कूपमण्डूकता होगी, तो इतिहास और समाज के गम्भीर अध्येता निश्चय ही उसकी आलोचना करेंगे।
यहाँ प्रश्न यह है ही नहीं कि गाँधी के ब्रह्मचर्य-प्रयोगों के पीछे ब्रह्मचर्य की शक्ति और न केवल व्यक्ति बल्कि पूरे समाज पर पड़ने वाले उसके सकारात्मक प्रभाव पर गाँधी की गहरी आस्था थी। गाँधी की आस्था से उनके प्रयोग के वस्तुगत प्रभाव पर कोई असर नहीं पड़ता। असर इस बात से पड़ता है कि उनके प्रयोग का आधार वैज्ञानिक था अथवा अवैज्ञानिक। मानव शरीर का और काम भावना के मूल उद्गम का आज तक जितना भी अध्ययन हुआ है, वह यही बताता है कि ब्रह्मचर्य और उसकी शक्ति एक धार्मिक मिथकीय बकवास है। स्त्री-पुरुष के बीच आकर्षण और यौन-सम्बन्ध नितान्त स्वस्थ, सहज और विज्ञान-सम्मत होता है। हाँ, इन सम्बन्धों के सामाजिक नियमन से उद्भूत नैतिक पहलू भी समाज के स्वस्थ-स्वाभाविक अस्तित्व और विकास के लिए उतने ही जरूरी हैं। समाज और मानव-चेतना के विकास के साथ ही इस सामाजिक नियमन और नैतिकता का भी विकास हुआ है, जिसका अध्ययन नृतत्वशास्त्र, सामाजिक इतिहास और नीतिशास्त्र के दायरों में काफी हुआ है।
यौनिक आकर्षण के वैज्ञानिक कारणों की समझ नहीं होने और धार्मिक संस्कारों की भयजनित कुण्ठा के कारण पिछले देशों के बंद समाजों के स्त्री-पुरुषों की भारी आबादी अपने चेतन-अवचेतन मन में तरह-तरह की मानसिक रुग्णताओं को पाले हुए पूरा जीवन बिता देती है तथा अपराध-बोध और ग्लानि उनके व्यक्तित्व की सर्जनात्मकता की धार को कुंद-भोथरा बनाती रहती हैं।
गाँधी का व्यक्तित्व विराट था और उसके व्यक्तित्व और चिन्तन के अन्तरविरोध भी उतने ही गहरे थे। दार्शनिक स्तर पर उनका चिन्तन रस्किन, थोरो और तोल्स्तोय की जमीन पर खड़ा था, लेकिन इन चिन्तकों के मानवतावादी यूटोपिया को भारतीय रूपरंग में ढालते हुए गाँधी ने हिन्दू धर्म की पारम्परिक कूपमण्डूकताओं, अंधविश्वासों, संकीर्णताओं से उसे सराबोर कर दिया था। वह अपने को सनातन धर्म का अनुयायी मानते थे और आचरण से एक उदार हिन्दू थे। चातुर्वर्ण्य को वे आदर्शीकृत करके सामाजिक श्रम-विभाजन के रूप में स्थापित करना चाहते थे और अस्पृश्यता को समाप्त करना चाहते थे। जाहिर है कि यह एक उदार हिन्दू का यूटोपिया था। व्यवहारत: धर्म के उदारीकरण की नेक से नेक कोशिश धर्म के सामाजिक आधार और स्वीकार्यता को ही मजबूत बनाती है और अमली तौर पर हमारे सामाजिक जीवन में धर्म के दखल (चाहे जितने भी उदार रूप में) जब बढ़ती है तो अंततोगत्वा धार्मिक वर्जनाओं, रूढ़ियों और संस्कारों के दबाव कठोर और कट्टर रूप में ही सामने आते हैं, जिनके सर्वाधिक शिकार शोषित-उत्पीडि़त आम आबादी और स्त्रियाँ ही होती हैं। गाँधी धर्मनिरपेक्षता की जगह सर्वधर्म समभाव की बात करते थे। एक बहुधार्मिक समाज में सामाजिक-राजनीतिक दायरों से धर्म को यदि पूरी तरह अलग नहीं किया जाये, तो सर्वधर्म समभाव की लाख दुहाई देने के बावजूद, बहुसंख्या के धर्म का प्रभाव अन्ततोगत्वा वर्चस्वकारी रूपों में सामने आयेगा ही, और वस्तुगत तौर पर धार्मिक बहुसंख्यावाद की ज़मीन मजबूत होगी ही।
गाँधी के ग्राम स्वराज्य की अवधारणा उत्पादन की पिछड़ी हुई पुरानी तकनीक के आधार पर स्वावलम्बी-स्वायत्त ग्राम समुदायों की अर्थव्यवस्था का यूटोपिया पेश करती थी, लेकिन सामंती भूस्वामियों से बलात् भूस्वामित्व छीनने के बजाय वे उन्हें समझा-बुझाकर कायल करने के पक्षधर थे। इसी कारण से, एक ओर तो काश्तकार किसानों की पिछड़ी चेतना वाली, धर्मभीरु और ज़मीनों का मालिक बनने की आकांक्षी भारी आबादी गाँधी के पीछे लामबंद हुई, दूसरी ओर किसान विद्रोहों की संभावना से भयभीत सामंतों को भी गाँधी का यूटोपिया फिलहाली तौर पर अपने लिए मुफीद जान पड़ा और गाँधी उनके खुले विरोध को रोक पाने में काफी हद तक सफल रहे। देश के बहुतेरे सामंत कांग्रेस में शामिल भी हुए या कम से कम उसका विरोध नहीं किया, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि स्वाधीनता यदि गाँधीवादी नेतृत्व में हासिल होगी तो बलात् उनकी भूसम्पत्ति छीनी नहीं जायेगी और यदि भूमि-सुधार किसी रूप में होंगे भी तो उनके हितों की हिफाज़त का पूरा खयाल रखा जायेगा।
गाँधी श्रम और पूँजी के बीच के अन्तरविरोध को हल करने की स्वाभाविक क्रान्तिकारी प्रक्रिया को अपनाने के बजाय उनके बीच सामंजस्य का सिद्धान्त प्रस्तुत करते थे। ट्रस्टीशिप का सिद्धान्त पूँजीपतियों को इस बात का कायल करने की बात करता था कि वे स्वयं को सामाजिक सम्पदा का ट्रस्टी और मज़दूरों का संरक्षक/अभिभावक समझें। जाहिर है कि दार्शनिक स्तर पर बहुत भोंड़े किस्म के प्रत्ययवादी होने के साथ ही गाँधी राजनीतिक अर्थशास्त्र का ककहरा भी नहीं जानते-समझते थे। मार्क्सवाद तो उन्होंने एकदम पढ़ा ही नहीं था ( इसीलिए समाजवाद और कम्युनिज़्म की उन्होंने जहाँ कहीं भी आलोचना की है, वह बेहद चलताऊ और सतही अनुभववादी किस्म की थी ), एडम स्मिथ और रिकार्डो के क्लासिकी बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र से भी उनका कोई परिचय नहीं था। अमूर्त वैज्ञानिक अवधारणाओं से प्रस्थान करने और पूँजीवाद को उत्पादन का एक शाश्वत और प्राकृतिक रूप मानने के बावजूद क्लासिकी बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी उपलब्धि थी 'मूल्य के श्रम सिद्धान्त' (लेबर थियरी ऑफ वैल्यू) की खोज। गाँधी ने अगर इसका थोड़ा भी अध्ययन किया होता तो ट्रस्टीशिप के अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कत्तई नहीं करते।
.........जारी..........
O- कात्यायनी


