- मनोज कुमार झा

गुजरात विधानसभा चुनाव में कुछ ही दिन बचे हैं। चुनाव प्रचार की गहमागहमी अपने चरम पर पहुंच गई है। अब तक हर तिकड़म और दुष्प्रचार के सहारे चुनाव जीतने वाले मोदी और अमित शाह को पहली बार इस चुनाव में दिन में ही तारे दिखाई पड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव मोदी सरकार और पूरी भगवा मंडली के लिए कहीं बुरे दिनों की सौगात लेकर न आ जाए। ये बात दीगर है कि भाजपा जीतती है या हारती है। गुजरात चुनाव में हार-जीत का महत्त्व ज्यादा नहीं रह गया है। महत्त्व इस बात का है कि इसी से मोदी सरकार की उलटी गिनती शुरू हो जाने की पूरी संभावना बनती दिखाई पड़ रही है। लगता है कि खुद मोदी को भी इसका अहसास हो चुका है। यही वजह है कि वे अपने बयानों और भाषणों से यह साबित करते जा रहे हैं कि ‘विकास गांडो थये छे’ यानी विकास पगला गया है। यह नारा गुजरात में मोदी विरोधियों का सबसे लोकप्रिय नारा बन गया है।

गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बहुत ही मजबूती से उभरी है और राहुल गांधी को पप्पू कहने वालों को भी करारी चपत लगी है। मोदी की हर चाल का जवाब राहुल बहुत संयत होकर दे रहे हैं और वहां पाटीदारों की राजनीति से भी संतुलित होकर कदमताल साध रहे हैं।

भले ही कांग्रेस को गुजरात में सत्ता हासिल कर पाने में सफलता मिले या नहीं, यह साफ हो चुका है कि इस चुनाव के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भगवा का विकल्प देने की विपक्षी दलों की कवायद शुरू होगी जिसका असर 2019 के लोकसभा चुनावों में देखने को मिलेगा।

पिछले दिनों ममता बनर्जी ने ये कहा था कि मोदी विरोधी तमाम दलों को एकजुट होने की ज़रूरत है। भगवा ताकतें एकजुट हैं और सत्ता के मद में पागल हो चुकी हैं। इनसे मुकाबले के लिए तमाम विरोधी दलों का एक मंच पर आना एक बड़ी ऐतिहासिक चुनौती ही है। 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही इनका जनविरोधी और आतंकी चेहरा खुल कर सामने आता रहा है। बावजूद कई राज्यों में ये सत्ता में आने में सफल हुए तो इसके पीछे इनकी साजिशें ही थीं। उत्तर प्रदेश में इनका सत्ता में आना नोटबंदी का परिणाम बताया जा रहा है। पर नोटबंदी से उत्साहित होकर जब मोदी सरकार ने जीएसटी लागू कर दिया तो यही गुजरात में इनके पतन का कारण बन कर सामने आ रहा है।

अब मोदी गुजरात की जनता के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं कि उन्हें जिता दे तो वे उसकी इच्छा के अनुसार जीएसटी के नियमों में बदलाव कर देंगे।

कहना न होगा कि नोटबंदी से देश की जनता को कितनी दुश्वारियां झेलनी पड़ी। पर मोदी लगातार इसे सफल बताते रहे। जीएसटी ने व्यवसायी वर्ग की कमर ही तोड़ दी। अर्थव्यवस्था में मंदी छा गई है। नौकरियां जा रही हैं। पर फर्जी रेटिंग एजेंसियों से अनुकूल रेटिंग हासिल कर ये मतिमंद खुश हो जाते हैं, लेकिन सरज़मीं पर जब देखते हैं तो होश फाख्ता हो जाते हैं। फिर इवांका ट्रम्प इन्हें सर्टिफिकेट दे देती है तो ये मतिमंद और भी खुश हो जाते हैं, लेकिन जैसे ही अपने घर गुजरात जाते हैं और पैरों तले जमीन खिसकती दिखाई पड़ती है तो सच में पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हैं।

पिछले दिनों कांग्रेस और राहुल पर हमला करते हुए नरेंद्र मोदी ने जो बातें कही हैं, उससे साफ है कि वे संभवत: यह भूल चुके हैं कि प्रधानमंत्री के पद हैं। राहुल के मंदिरों में जाकर दर्शन करने को लेकर उन्होंने जो टिप्पणी की है, वह दिखलाता है कि उनके लिए प्रधानमंत्री पद की कोई गरिमा है ही नहीं। जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को लेकर की गई टिप्पणियों ने उन लोगों को भी दुखी कर दिया जो किसी न किसी रूप में कांग्रेस के विरोधी रहे हैं, भले ही मोदी जी के समर्थक रहे हों या नहीं।

वैसे मोदी जी ने चुनाव प्रचार में कभी कोई गरिमा रखी नहीं, उन्होंने अपनी छवि एक भांड की बनाई। चीखना-चिल्लाना, मिमिक्री करना, विरोधियों पर व्यक्तिगत प्रहार करना उनकी आदत में शुमार रहा है। अनपढ़ होने के कारण किसी मुद्दे पर बात करना उनके बूते की बात है ही नहीं, पर इस देश में ऐसे नेताओं की भी कोई कमी नहीं रही जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, पर उनमें जनता की समस्याओं को लेकर एक अंतर्दृष्टि, एक सूझ होती थी जो अपने भाषणों में वे जाहिर करते थे। पर ये तो भांड की तरह पेश आते हैं।

बहरहाल, जनता इन्हें अब तक झेलती जा रही थी, लेकिन अब गुजरात की जनता ने ही इन्हें झेलने से मानो इनकार कर दिया है। यह जाहिर हुआ स्वयं मोदी जी और अमित शाह की सभाओं में जुटने वाली कम भीड़ से। कई जगहों पर कुर्सियां खाली ही रह गईं और जनता प्रलोभनों के बावजूद नहीं जुटी। इधर, राहुल की सभाओं में उमड़ती भीड़ देख मोदी जी ने अपना आपा खो दिया और उनके नाना नेहरू और दादी इंदिरा पर प्रहार करने लगे। वे यह भूल गए कि पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम बीसवीं सदी के दुनिया के पांच सबसे बड़े नेताओं में आता है। उनका नाम गांधी के साथ लिया जाता है। दुनिया उन्हें आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में जानती है। उनकी पहचान उस नेता के रूप में है जिनके विचारों ने भारत ही नहीं, दुनिया की राजनीति को प्रभावित किया। वे एक विश्व प्रसिद्ध लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। वहीं, इंदिरा गांधी की पहचान भी एक विश्व नेता की रही है। इनका जो कद रहा है, उसे समझ पाना मोदी जी के वश की बात नहीं है, न ही संघ के टुच्चे नेताओं के वश की।

मोहन भागवत तो बलात्कारी तथाकथित संतों जैसे आसाराम आदि से मिलता रहा है और मोदी जी भी मिलते रहे हैं। चाय बेचने वाले के रूप में अपनी छवि बना कर ये कितने हास्यास्पद हो चुके हैं, ये भी समझ पाना इनके लिए संभव नहीं। मूर्खता, लम्पटता और बदमाशी का मूर्तिमान रूप हैं ये संघी, जो इवांका ट्रम्प से सर्टिफिकेट लेकर खुश हो जाते हैं, जो एक मॉडल थी और अमेरिका में भी जिसकी कोई कद्र नहीं।

जहां तक अटल और आडवाणी का सवाल है, वे सपने में भी नेहरू और इंदिरा पर इस तरह प्रहार करने के बारे में नहीं सोच सकते थे। पर मोदी एक सड़कछाप नेता हैं जो देश के दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री जैसे पद पर पहुंच गए, लेकिन इनका पराभव और अंत सुनिश्चित है। आज चुनाव जीतने के लिए यह शख्स खुद पर फिल्में तक बनवा रहा है और नमोनमो गाने चलवा रहा है। इस तरह ये कितना हास्यास्पद होता चला जा रहा है, इसकी भी इसे परवाह नही है। बहुत से राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान नेहरू और इंदिरा पर प्रहार कर मोदी ने संभवत: अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली है। सच ही कहा है – ‘जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है’।

चुनाव प्रचार के दौरान विरोध किया जाता ही है, पर मुद्दे भी सामने रखे जाते हैं। मोदी कोई मुद्दा नहीं रखते, क्योंकि उनका जो मुद्दा था विकास, वह बुरी तरह पिट चुका है। कांग्रेस और पाटीदार नेताओं ने विकास के मुद्दे की हवा निकाल दी है, इससे मोदी खिसियाहट में नेहरू और इंदिरा पर प्रहार करने लगे, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। दूसरी तरफ, राहुल ने गंभीरता का परिचय देते हुए मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं पर कभी व्यक्तिगत प्रहार नहीं किया, बल्कि मुद्दों की ही बात करते रहे हैं। नेहरू और इंदिरा गांधी पर मोदी के प्रहार किए जाने से गुजरात के लोग भी नाखुश हैं। इसकी वजह ये है कि इन नेताओं से लोग पार्टीगत आधार पर नहीं, बल्कि भावनात्मक आधार पर जुड़े हैं।

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दयाल ने बीबीसी में लिखा है कि नरेंद्र मोदी जब इस प्रकार की बात करते हैं, तब वो ये बात भूल जाते हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं और देश के दिवंगत प्रधानमंत्री के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी कर रहे हैं।

प्रशांत दयाल ने कहा, "हमारे यहां ऐसी परंपरा है कि हम दिवंगत लोगों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी नहीं करते। फिर भी उन्होंने इंदिरा गांधी के बारे में जो टिप्पणी की है वह सच नहीं है।"

प्रशांत दयाल कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोरबी की जिस दुर्घटना के बारे में बात कर रहे थे, उस दुर्घटना के वक्त वे गुजरात में ही थे। वो उस वक्त स्वयंसेवक थे और उन्हें ये बात अच्छी तरह से पता है कि मच्छू डैम टूटने से कई इंसानों और पशुओं की जान की तबाही हुई थी, जिसके कारण महामारी फैलने का खतरा बढ़ गया था। उस वक्त सबके लिए मुंह पर रूमाल बांधना अनिवार्य कर दिया गया था और मोरबी में चारों तरफ़ बहुत बदबू फैली हुई थी।"

इस स्थिति में देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मोरबी दौरे के दौरान अपने मुंह पर अगर रूमाल रखा तो ये बिल्कुल सामान्य बात थी। प्रशांत दयाल ने कहा, "नरेंद्र मोदी इस बात को राजनैतिक फ़ायदे के लिए जिस तरीके से बता रहे हैं, उससे राजनीति का स्तर नीचा हो रहा है। इससे पहले भाजपा और कांग्रेस के किसी भी नेता ने इतने निम्न स्तर की राजनीति गुजरात में नहीं की है।"

इसी तरह, सोमनाथ मंदिर में राहुल के दर्शन के लिए जाने को लेकर मोदी की टिप्पणी बहुत ही आपत्तिजनक रही, जिसका बहुत विरोध हुआ। दरअसल, मोदी ने इसे उभार कर और यह कह कर कि नेहरू सोमनाथ के पुनरुद्धार के लिए सहमत नहीं थे और यह काम पटेल ने किया, मतदाताओं को धार्मिक आधार पर गोलबंद करने की कोशिश की जो संघियों की फितरत रही है, दूसरे राहुल किस धर्म के मानने वाले हैं, यह विवाद छेड़ कर भी कुटिल मनोवृत्ति का परिचय दिया है। जो भी हो, पतन के जिस गर्त में मोदी जी गिरते जा रहे हैं, उसके बाद देश में एक नई राजनीति की शुरुआत की उम्मीदें प्रबल होंगी।