जाहिद खान
गुजरात सरकार के ताजा परिपत्र ने एक बार फिर विकास के सामाजिक मानकों पर गुजरात मॉडल की असलियत पूरे देश के सामने उजागर कर दी है। सरकार की ओर से हाल ही में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की आपूर्ति शाखा को जारी एक परिपत्र के मुताबिक राज्य के ग्रामीण इलाके में प्रतिमाह 324 रुपए तथा शहरी इलाके में 501 रुपए से कम कमाने वाला ही गरीबी रेखा से नीचे माना जा सकता है। सरकार राज्य के शहरी इलाके में 16 रुपए 80 पैसे तथा गांवों में 10 रुपए 80 पैसे कमाने वाले को ही बीपीएल कार्ड के योग्य मानती है। यानी मोदी सरकार की नजर में गांवों में 11 रुपए और शहर में 17 रुपए रोजाना कमाने वाले गरीब नहीं हैं। जाहिर है कि जब सरकार इन्हें गरीब ही नहीं मानती, तो राज्य में उन्हें गरीबों को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी। एक तरफ मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे देश में गुजरात के विकास और सुशासन की दुहाई देते नहीं थकते, तो दूसरी ओर राज्य में गरीबों के प्रति उनकी सरकार का यह गैर जिम्मेवाराना और हिकारत भरा नजरिया है। मोदी सरकार ने राज्य में गरीब और उनकी गरीबी दोनों का मजाक बना के रख दिया है।
गौरतलब है कि साल 2011 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जब केंद्र सरकार की ओर से योजना आयोग ने सर्वोच्च अदालत को बताया था कि शहर में 32 रुपए और गांव में 26 रुपए रोजाना कमाने वाले ही गरीब हैं और इससे ज्यादा कमाने वाले को वह गरीबी के दायरे में नहीं रखता। तब संप्रग सरकार के इस गरीबी के मानक की सबसे ज्यादा तीखी आलोचना बीजेपी ने की थी। इस बात पर हाय-तौबा मचाने वालों में उसके प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी सबसे आगे थे। लेकिन अब गुजरात ने पूरे देश के सामने गरीबी का जो मानक रखा है, उसे क्या कहा जाए ? गरीबी निर्धारण को लेकर आज भाजपा खुद कठघरे में है और उससे इस बात का सही जवाब देते नहीं बन रहा। अपनी सफाई में बीजेपी और नरेन्द्र मोदी सरकार ऐसी-ऐसी गलतबयानी कर रही है कि जिस पर शायद ही कोई यकीन करे। मीडिया में जब यह बात सामने निकलकर आई, तो उसने तुरंत इस बात का पूरा ठीकरा केन्द्र सरकार के सिर फोड़ दिया।
गुजरात सरकार का कहना है कि केंद्र के साल 2004 के मापदंड के मुताबिक ही उसने अपने यहां बीपीएल परिवारों का चयन किया है। यानी उसमें राज्य सरकार की कोई गलती नहीं। अलबत्ता इस तरह का परिपत्र जारी होने का उसने खंडन नहीं किया है। लिहाजा उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।
अपनी बात को सही साबित करने के लिए गुजरात सरकार ऐसी-ऐसी दलीलें दे रही है, जिस पर सिर्फ सिर धुना जा सकता है। मसलन सरकार ने इस सूचना को सही बीपीएल परिवार की पहचान करने के मकसद से जारी किया है। गुजरात सरकार के वित्त मंत्री एक तरफ अपनी सरकार के इस निर्देश के लिए केंद्र सरकार और योजना आयोग को जिम्मेदार ठहराते हैं, तो दूसरी ओर बिहार और यूपी के लोगों को दोषी बता रहे हैं। उनके मुताबिक गुजरात में बढ़ती गरीबी की एक वजह यह भी है कि बिहार और यूपी के गरीब लोग वहां आ जाते हैं। गरीबी में बढ़ोतरी के लिए राज्य में आने वाले प्रवासी कामगार जिम्मेदार हैं। यह वही भाषा है, जिसका इस्तेमाल शिवसेना और राज ठाकरे की पार्टी मनसे बरसों से महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमले के लिए करती रही है। बहरहाल इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह सामने निकलकर आई है कि गुजरात राशन डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रह्लाद मोदी, जो कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई हैं, उन्होंने यह इल्जाम लगाया है कि राज्य में गरीबों को बीपीएल कार्ड भी नहीं मिल रहा है, जबकि अधिकारी व स्थानीय नेताओं की मदद से कई अमीर बीपीएल सूची में शामिल होकर सरकारी लाभ उठा रहे हैं।
यह कोई पहली बार नहीं है, जब गुजरात के ‘विकास’ मॉडल की हकीकत देश के सामने निकलकर आई है। नरेन्द्र मोदी के वाईब्रेंट गुजरात की पोल कई बार खुल चुकी है। कैग यानी नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने पिछले दिनों अपनी एक रिपोर्ट में गुजरात में कुपोषण की जो तस्वीर सामने रखी थी, उससे भी बीजेपी और नरेन्द्र मोदी दोनों को देश भर में शर्मिंदगी का मुंह देखना पड़ा था। कैग की इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में हर तीन बच्चों में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। कैग ही नहीं, बल्कि भारत मानव विकास रिपोर्ट ने भी इस बात का खुलासा किया था कि गुजरात में प्रति व्यक्ति आय ज्यादा होने के बावजूद कुपोषण के मामले में वह पिछड़े कहे जाने वाले राज्यों की ही कतार में है। यानी सारे देश में गुजरात के विकास मॉडल का जिस तरह से ढिंढोरा पीटा जाता है, उसमें सच्चाई ना के बराबर है। मोदी राज में गुजरात के अंदर किस तरह का विकास हुआ है, इसके लिए यह आंकड़े जानना बेहद जरूरी होंगे। मानव विकास सूचकांक के मामले में गुजरात फिलवक्त नौवें स्थान पर, तो भूख सूचकांक में वह ओडीशा के समकक्ष है। इस मामले में वह, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से भी पीछे है। सच बात तो यह है कि गुजरात में बीते डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता में रहने के बावजूद बीजेपी सरकार, राज्य के लोगों की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाई है। हर मामले में उसकी नाकामी साफ झलकती है। शौचालय की ही यदि बात करें, तो साल 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में सिर्फ 34 फीसदी ग्रामीण आबादी को शौचालय उपलब्ध हैं। बाकी आबादी को आज भी खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है।
अब सवाल यह उठता है कि कोई भी सरकार गरीबी रेखा को क्यों नीचे रखने की कोशिशें करती है ? उसका इस बात पर क्यों जोर होता है कि वह अपने राज्य में कम से कम गरीबी को दर्शाए ? गरीबी रेखा को नीचे रखने का सिर्फ और सिर्फ मकसद यही होता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को गरीबी के दायरे से बाहर दिखाया जा सके। ताकि सरकार अपने कार्यकाल में आर्थिक प्रगति का बढ़-चढ़ कर दावा कर सके। गुजरात की छवि पूरे देश में कैसे अव्वल हो, इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कई तरह के जतन करते रहे हैं। उनके यह जतन, ज्यादातर झूठ और फरेब पर आधारित हैं। मोदी सरकार का हालिया कारनामा आंकड़ों में हेर-फेर कर राज्य में गरीबी को कम दर्शाना है। ताकि पूरे देश को यह पैगाम दिया जा सके कि राज्य की आबादी में बीपीएल का अनुपात कितनी तेजी से ‘कम’ हुआ है। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में गुजरात ने काफी ‘तरक्की’ की है। जबकि तल्ख हकीकत यह है कि बीते कुछ सालों के अंदर राज्य में गरीबों की संख्या और ज्यादा बढ़ी है। मोदी सरकार के तमाम दावों के बरक्स राज्य की कुल आबादी का 31.8 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहा है। हालिया खुलासे ने एक बार फिर पूरे देश के सामने इस बात की तस्दीक कर दी है कि गुजरात में विकास के नरेन्द्र मोदी के बड़े-बड़े दावों में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं। वहां यदि किसी का विकास हुआ है, तो सिर्फ अमीरों का।
जाहिद खान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।