गैर सरकारी संस्थाओं को सताने के लिए गृह मंत्रालय की निंदा
गैर सरकारी संस्थाओं को सताने के लिए गृह मंत्रालय की निंदा
गैर सरकारी संस्थाओं को सताने, अनुदान रोकने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गृह मंत्रालय की निंदा की।
सरकार से असहमति के अधिकार का सम्मान करने का अनुरोध किया
नई दिल्ली, 7 नवंबर। गैर सरकारी संस्थाओं को आतंकित करने के अभियान को बंद करने का गृह मंत्रालय से अनुरोध करने कई प्रमुख नागरिक ग्रीनपीस इंडिया के साथ आए।
गैर सरकारी संगठनों पर सरकार द्वारा हाल में की गई कार्रवाई पर बात करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण, महिला अधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर, परमाणु निरस्त्रीकरण व शांति गठबंधन के अचिन विनायक और पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता, ग्रीनपीस इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक कुमी नायडु और ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आइच के साथ एकजुट हुए।
उल्लेखनीय है कि गृह मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में ग्रीनपीस इंडिया के विदेशी अनुदानों पर रोक लगाने का संदेहास्पद बहाना बनाया है कि इसकी गतिविधियों से ‘‘राष्ट्रहित” बाधित हो रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण ने ग्रीनपीस की गतिविधियों को राष्ट्रहित के खिलाफ बताने के लिए गृह मंत्रालय की निंदा की है। उन्होंने सवाल किया कि ‘‘ स्वच्छ विकास, सबों के लिए उर्जा की उपलब्धता और भारतीय कानूनों को लागू करने की बातें कब से राष्ट्रहित के खिलाफ हो गई? ग्रीनपीस इंडिया जैसे संगठन पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं और भारतीय संविधान के दायरे में कार्य करते हैं तो उन्हें ऐसा करने देना चाहिए। सरकार ने खनन, बीमा, खुदरा व्यापार और दूसरे क्षेत्रों में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए घुटने टेक दिए हैं तो वह विधिसंगत गैर-सरकारी संस्थाओं को पैसे मिलने से डरती क्यों है?”
ग्रीनपीस ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह और वन व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेदकर को पत्र लिखकर इस मुकदमें और ग्रीनपीस इंडिया के कामकाज के बारे में बात करने के लिए समय माँगा है। (1)
ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आइच ने कहा कि ‘‘आईबी की अविश्वसनीय रिपोर्टों ने भारत में ग्रीनपीस के कार्यों को विकृत कर दिया है- चाहे वह बिहार के धरनई गाँव को बिजली से रोशन करने का काम हो जो पिछले तीन दशकों से अंधेरे में डूबा था या मध्यप्रदेश के महान वनक्षेत्र के आदिवासियों के कानूनी अधिकारों का समर्थन करना हो। ये मसले सभी भारतीयों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के विकास के मूलभूत तत्व हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं समावेशी विकास और सबों के लिए बिजली के लक्ष्यों का समर्थन किया है, फिर इन कामों को राष्ट्र-विरोधी कैसे कहा जा सकता है?’’
श्री नायडू आईपीसीसी की पांचवीं रिपोर्ट जारी होने के कुछ ही दिनों के बाद भारत-दौरा पर आए हैं जिसमें संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने विश्व के नेताओं से कोयला और ज्वलनशील ईंधन में निवेश घटाने और अक्षय उर्जा स्रोतों का अनुरोध किया है। इसका उल्लेख करते हुए श्री नायडू ने कहा कि “प्रधानमंत्री मोदी के पास ऐसे परिवर्तन करने की ताकत है। भारत को लेकर उनकी दृष्टि महात्वाकाँक्षी है, पर उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि यह समावेशी और लोकतांत्रिक हो। वास्तव में हम पहले से ही भयावह जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिये समय से देर चल रहे हैं, जो लोगों की जान ले रहा है, संसाधनों को नष्ट कर रहा है और लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रहा है। हमें वैश्विक स्तर पर भारत के नेतृत्व की जरूरत है जिससे हम अपने बच्चे और उनके बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं।’’
वक्ताओं ने इसका उल्लेख भी किया कि सरकार ने हाल में पर्यावरण के मामले में जो कार्रवाई की है, वह ‘सबका साथ,सबका विकास’ के नारे के खिलाफ है और सरकार की पर्यावरण नीतियों को जांचने और संतुलित रखने में ग्रीनपीस जैसे पर्यावरण की चिंता करने वाले संगठनों की भूमिका पर जोर दिया।
ग्रीनपीस इंडिया के अनुदान रोकने के बारे में गृह मंत्रालय के खिलाफ मुकदमा पर दिल्ली हाइकोर्ट जनवरी 2015 में सुनवाई करेगा।
“सरकार ने लीक हुए आईबी रिपोर्ट में कहा है कि ग्रीनपीस और अन्य संगठन जिनमें सामाजिक आंदोलन के नेता और कार्यकर्ता हैं, “राष्ट्र विरोधी” हैं क्योंकि वे मानते हैं कि ये भारत के विकास में बाधा हैं, लेकिन कहीं भी विकास को पर्यावरण संतुलन के प्रति संवेदनशील होना चाहिए, हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों और आजादी की रक्षा करने वाला और पहले से ही सबसे वंचित तबकों में शामिल लोगों की आजीविका की चिंताओं का सम्मान करने वाला होना चाहिए। आज विकास के ऐसे रास्ते का बचाव करना नैतिक और भौतिक जरुरतों को पूरा करने वाला है। ”
अचिन विनायक : सह-संस्थापक, परमाणु निरस्त्रीकरण और शांति के लिए गठबंधन (भारत)
‘‘असहमति का अधिकार लोकतंत्र का मूल तत्व है। सरकार नागरिक समाज के लोगों को दबाने और उन्हें विकास विरोधी कहने का साहस नहीं कर सकती, जबकि वह स्वयं कई बार प्राथमिक रूप से विशाल कारपोरेट घरानों का हित करने वाली नीतियों को बढ़ावा देती नजर आती है। हमें भारत की आदिवासी आबादी और जैव-विविधता के पक्ष में जोरदार आवाज उठाना होगा। भारत जैसा देश ऐसी स्थिति ज्यादा दिन नहीं स्वीकार कर सकता जिसमें सबसे गरीब लोग सबसे अमीर धरती पर बसे हों और अपनी संपदा से उन्हें मामूली लाभ भी नहीं मिले। यह समावेशी लोकतंत्र कतई नहीं है।’’
परंजय गुहा ठाकुरता- स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और फिल्म मेकर।
“भारतीय लोकतंत्र का नागरिक होने के नाते हमारे पास न सिर्फ राज्य की नीति और आर्थिक विकास के बारे में अलग राय रखने और अभिव्यक्त करने का अधिकार है बल्कि संविधान के आर्टिकल 51-ए के मुताबिक हमारा कर्तव्य है कि हम प्राकृतिक संसाधनों जंगल, नदी, वन जीव और झीलों की रक्षा करें। आंदोलनों और एनजीओ के माध्यम से लोगों को एकजुट होकर राज्य की उन नीतियों की आलोचना करनी चाहिए जो लोगों के अधिकार और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हों। सरकार द्वारा गैर सरकारी संगठनों के धन को अवरुद्ध करके उन्हें दबाने का प्रयास करना न सिर्फ सत्ता का गलत उपयोग है बल्कि यह संविधान का भी उल्लंघन है”।
वृंदा ग्रोवर, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता


