गौंडा में गिरफतार किये गये चारों वन टांगिया मज़दूर बाइज्ज़त बरी
गौंडा में गिरफतार किये गये चारों वन टांगिया मज़दूर बाइज्ज़त बरी
वन टांगिया महिलाओं के आंदोलन की जीत
रजनीश गंभीर
15 अगस्त 2011 उत्तर प्रदेश के जनपद गौंडा में डिप्टी रेंजर की तहरीर पर स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफतार किये गये चारों वनटांगिया मज़दूरों को टांगिया महिलाओं ने अपने आंदोलन से बाइज्ज़त बरी करा लिया। इससे वहां के सभी टांगिया गांवों में इस आज़ादी के जश्न का माहौल बना हुआ है और आज देश की आजादी के दिन झंडा फहराकर यहां के तमाम लोग अपनी खुशी का इज़हार कर रहे हैं।
विदित हो कि 13 अगस्त को यहां की तहसील मनकापुर के वनक्षेत्र में पीढि़यों से वनविभाग द्वारा बसाये गये बुटाहनी टांगिया गांव से 4 लोगों खुशीराम सहित, शिवराम, अमरसिंह और रामरंग को डिप्टी रेंजर अच्छेवर यादव की झूठी तहरीर के आधार पर गिरफतार कर लिया था। इनमें खुशीराम वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर पूरी जागरुकता व जानकारियों के साथ क्षेत्र में सक्रिय है। देर रात की गयी इस गिरफतारी के विरोध में यहां के सभी टांगिया गांवों बुटाहनी, अशरफाबाद और मनीपुर की सैकड़ों महिलाओं की अगुआई में बड़ी संख्या में लोगों ने थाना छपिया का घेराव कर लिया और पूरी रात हो रही बरसात में भीगते हुए वनविभाग तथा पुलिस प्रशासन के विरोध में जमकर नारे बाज़ी की। यह घेराव व नारेबाज़ी अगले दिन शाम तक गिरफतार किये गये चारों लोगों की रिहाई होने तक लगातार जारी रही। महिलाओं ने चुनौती देकर ऐलान कर दिया कि जब तक उनके साथी मज़दूरों को बाइज्ज़त बरी नहीं किया जायेगा तब तक वे अपना घेराव नहीं हटायेंगी। थानाध्यक्ष सिकंदर यादव द्वारा चालान काट कर चारों लोगों को जेल भेजने की पूरी तैयारी कर ली गयी थी, लेकिन राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के साथ मिलकर वनाधिकारों के लिये पिछले काफी समय से सतत आंदोलनरत इन टांगिया वनमज़दूर महिलाओं के घेराव के आगे झुक कर व मंच की कार्यकर्ता व उ0प्र0 निगरानी समिति की विशेष आमंत्रित सदस्य रोमा द्वारा हस्तक्षेप करते हुए जिलाधिकारी रामबहादुर से वार्ता करके चेतावनी दिये जाने के पश्चात शाम होने से पूर्व ही चारों वनटांगिया मजदूरों को बाइज्ज़त बरी कर दिया गया।
गत 29 जून को गौंडा से 600 से अधिक कि0मी0 दूर उ0प्र0 के ही जनपद सहारनपुर में वनगूजर वनाधिकार कार्यकर्ता नूरजमाल की भी ठीक इसी तरह से वनविभाग के रेंजर की तहरीर पर वहां के थाना बेहट की पुलिस ने गिरफतारी की थी और ठीक इसी तरह से ही वहां के वनटांगिया और वनगुजर समुदाय की महिलाओं ने थाने का घेराव करके अपने साथी को बाइज्ज़त बरी करा लिया था। उ0प्र0 में राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के कार्यकर्ताओं के साथ स्थानीय स्तर पर वनविभाग के इशारों पर पुलिस व प्रशासन द्वारा इस तरह की कार्रवाईयां किया जाना आम होता जा रहा है, जो कि बेहद चिन्ता का विषय है। दूसरी तरफ जिस तरह से गौंडा में ठीक सहारनपुर की ही तरह वनसमुदायों की महिलाओं ने अपने आंदोलन के आगे पुलिस प्रशासन को झुकने को मजबूर किया है, यह भी अपने आप में मिसाल है, जो कि जहां भी दमन की कार्रवाई सत्ता द्वारा हो रही वहां-वहां पर महिलाओं द्वारा कायम की जा रही हैं। गौंडा की घटना एक तरह से वनविभाग के इशारे पर पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई और महिला आंदोलन की जीत का एक्शन रिप्ले ही साबित हुई है। कहा जा सकता है कि वनविभाग के इशारे पर पुलिसिया दमन और इस दमन के खिलाफ वंचित तबकों के संघर्ष की जीत के मामले में शहर सहारनपुर हो या गौंडा बात तो एक ही है।


