फासीवाद के उदय से लेकर आज तमाम तत्ववादी आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में

-सरला माहेश्वरी

बुद्ध ने कहा था कि यह जगत परिवर्तनशील है। परिवर्तनशीलता एक अटल सच्चाई है। सिर्फ पृथ्वी का जगत ही परिवर्तनशील नहीं है बल्कि आज तो हमारे वैज्ञानिकों ने इस बात को साबित कर दिया है कि समूचा ब्रह्माण्ड परिवर्तनशील है। उसका विस्तार हो रहा है, उसाक विकास हो रहा है। इस पृथ्वी पर मनुष्य, उसका जीवन, समाज, सामाजिक संस्थाए सभी परिवर्तनशीलता के इस नियम से बँधे हुए हैं। इसलिए जो कल सच था वह आज झूठ प्रमाणित हो सकता है और जो आज सच है वह हो सकता है कि अतीत में कभी उसका अस्तित्व ही न रहा हो और भविष्य में भी हो सकता है कि आज का सत्य सिर्फ भ्रम-मात्र साबित हे जाए।

मेरा कहने का तात्पर्य है कि हर चीज परिवर्तनशील, विकासान और नई संभावनाओं को समाहित किए हुए रहती है। यही बात कानूनों पर भी लागू होती है, यही बात अधिकारों पर भी लागू होती है। सामाजिक विकास के चरण में अधिकारों का जो एक स्वरूप होता है, हो सकता है कि परवर्ती काल में हमारे नागरिक के अधिकारों का वह स्वरूप न रहे क्योंकि यह भी लगातार बदलता और परिवर्तित होता है।

हम सभी जानते हैं कि जब से सामाजिक नियमों और कानूनों का उदय हुआ है, तभी से व्यक्ति के अधिकारों, उसकी स्वतंत्रता के बारे में भी एक ठोस समझ लगातार विकसित होती रही है और उसको कानूनी स्वीकृति भी मिलती रही है। व्यक्ति के इन अधिकारों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के साथ लगातार परिवर्तन होते रहे हैं समाज की नई जरूरतों के मुताबिक व्यक्ति के अधिकार परिभाषित किए जाते रहे हैं।

जीने का अधिकार तो मनुष्य को शुरू से ही हासिल था, सम्पत्ति के उदय के साथ सम्पत्ति का अधिकार भी मनुष्य को प्राप्त हुआ। इसी के परवर्ती विकास के क्रम में व्यक्ति के अधिकारों का दायरा और विकसित हुआ तथा उसमें व्यक्ति के आत्मिक जीवन से जुड़े सवाल, मनुष्य के सुख और शांति के सवाल, जीवन का आनन्द उठाने के सवाल, ये भी उन अधिकारों में शामिल हो गए। व्य

क्ति की भावनाओं के प्रश्न भी किसी न किसी रूप में कानून के दायरे में शामिल हने लगे… जैसे तेज शोर, तीखी गंध, धूल और धुएं से रक्षा, प्रदूषण के नाना रूपों से रक्षा के सवाल कानून में शामिल होने लगे। उसी प्रकार आदमी की इज्जत और आबरू से जुड़े हुए प्रश्नों पर, उसकी साख से जुड़े हुए प्रश्नों पर भी कानून बने और आज किसी को भी किसी के बारे में कुत्सित प्रचार करने का कोई हक नहीं है।

आदमी के पारिवारिक संबंध भी इस हद तक कानून के दायरे में शामिल कर लिये गये कि यदि किसी का अपने पति अथवा पत्नी के साथ निबाह नहीं हो सकता है तो कानून के जरिए वह इस मुसीबत से भी छुटकारा पा सकता है। आज कानून के दायरे में मनुष्य से जुड़े हुए भौतिक व आर्थिक सभी प्रकार के विषय क्रमश: शामिल कर लिये गये हैं। जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हो रहा है, आदमी की संवेदनाओं का भी निरंतर विकास हो रहा है और एक मनुष्य के नाते यह सामान्य समझ पैदा होती जा रही है कि जीवन के सुख-दुख सिर्फ भौतिक जीवन तक ही सीमित नहीं होते बल्कि मनुष्य का आत्मिक जगत भी उसके सुख-दुख के विषयों को निर्धारित करता है। इसीलिए आज जरूरी है कि आदमी के विचारों, उसकी भावनाओं और संवदेनाओं को भी इसी प्रकार कानून की स्वीकृति मिले, जिस प्रकार आदमी के जीने के अन्य अधिकारों , उसकी भौतिक परिस्थितियों को स्वीकृति मिलती है।

आदमी के विचार, उसकी भावनाएं और संवेदना ही वे मुख्य संघटक तत्व हैं जिनसे आदमी की अपनी निजता का निर्माण होता है और जिसे विधेयक की शब्दावली से बागडोदिया जी ने “एकांतिकता” शब्द के रूप में इस्तेमाल किया है।

उपसभाध्यक्ष महोदय, यह सच है कि अधिकार हमेशा से समाज की सापेक्षता में परिभाषित होते हैं लेकिन व्यक्ति का एक अधिकार अकेले रहने का भी अधिकार है। जिस अकेलेपन के खतरे में पड़ जाने की चिंता दीनानाथ जी कर रहे थे, इस अकेलेपन के अधिकार का महत्व सामाजिक स्तर पर उस समय बडा़ हो जाता है जब समाज का एक बड़ा हिस्सा किसी उन्माद की रौ में आकर विवेकहीन हिंसक भीड़ का रूप अख्तियार कर लेता है।

दुनिया में फासीवाद के उदय से लेकर आज तमाम तत्ववादी आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में भीड़ में अकेला व्यक्ति घुप्प अंधेरे में दीये की एक अकेली लौ की तरह रोशनी देता हुआ प्रतीत होता है। विवेकहीनता और उन्मादित भीड़ में तब्दील हो गए समाज में ही कविगुरु रवीन्द्र नाथ ने कहा था –

“एकला चलो रे। जदि तोर डाक सुने केउ ना आसे, तोबे एकला चलो रे”

यह है अकेले व्यक्ति के महत्व का स्वीकार। एक विवेकवान जागृत अकेला व्यक्ति उन्मादित समूह के सामने प्रतिरोध की सख्त दीवार की भूमिका अदा कर सकता है। इतिहास में व्यक्ति की भूमिका की इसी पहचान ने व्यक्ति की निजता की रक्षा को कानूनी स्वीकृति देने का ठोस आधार तैयार किया। इसलिए सभ्यता के विकास के साथ ही व्यक्ति की एकांतिकता की रक्षा का सवाल बार-बार उठता रहा है और इसे नाना प्रकार से कानूनी स्वीकृति भी मिलती रही है। लेकिन आज इस सवाल के कुछ नए आयाम हमारे सामने उपस्थित हुए हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने जहाँ व्यक्ति के अंतर बाह्य, दोनों को समृद्ध करने में जबर्दस्त योगदान दिया है, इसी विज्ञान और तकनीक ने कुछ ऐसे उपकरणों को भी जन्म दिया है जिनकी चर्चा हम अभी सुन रहे थे, जो पुन: राज्य और व्यक्ति के अधिकारों के बीच संतुलन के लिए घातक साबित हो रहे हैं। सूचना और तकनीकी के इस युग को “एसीलोन” का एक युग कहा जा सकता है और मैं समझती हूँ कि “एसीलोन” से शायद हमारा यह सदन परिचित होगा।

एसीलोन उस प्रणाली का नाम है जिसके जरिये अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा और न्यूजीलैंड की तरह के विकसित राषअट्रों ने मिलकर सारी दुनिया के अरबों लोगों के फोन, फैक्स, ई-मेल आदि तमाम प्रकार के इलेक्ट्रोनिक संवादों में हस्तक्षेप संवादों में हस्तक्षेप करने का रास्ता अपनाया है। यह खुफियागिरी का एक ऐसा नेटवर्क है जिसने संवाद के सर्वाधुनिक इलेक्ट्रोनिक माध्यम की एकांतिकता पर भी गहरा खतरा पैदा कर दिया है। उपसभाध्यक्ष महोदय, राज्य और नागरिकों के अधिकारों के बीच एक सही संतुलन, एक ऐसा संतुल कायम करना जिसमें किसी भी राष्ट्र और उसके नागरिकों का सर्वांगीण विकास हो सके और एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण हो सके, मनुष्यता के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है। जब कोई भी समाज व्यवस्था इस संतुल को कायम करने में असमर्थ होती है तभी व्यक्ति और राष्ट्र के जीवन में अनेक प्रकार की विकृतियों का जन्म होता है।

उपसभाध्यक्ष महोदय, थोड़ा सा समय और लूंगी। इसीलिए हमेशा इस बात की समीक्षा करने की जरूरत होती है कि व्यक्ति के जीवन की ऐसी कौन सी नई जरूरतें पैदा हुई हैं जिनकी पूर्ति के लिए नए कानूनी प्रावधान जरूरी है और साथ ही राजसत्ता के पास ऐसी कौन सी नई शक्तियाँ आ गई हैं जिन पर उचित अंकुश लगाकर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा की जाए। यह एक हमेशा चलने वाली निरन्तर प्रक्रिया है।

यदि हम व्यक्ति के एकांतिकता के अधिकार को स्वीकार करते हैं तो इस अधिकार की परिभाषा को भी हमें समय के साथ लगातार विकसित और परिवर्द्धित करना होगा। व्यक्ति के अधिकार जहाँ व्यक्ति के द्वारा कुछ किये जाने के संदर्भ में परिभाषित होते हैं, वहीं उपसभाध्यक्ष महोदय, कुछ न करने की इच्छा के रूप में भी परिभाषित होते हैं। उदाहरण के तौर पर एक लेखक को यह अधिकार है कि वह अपने लेखन को प्रकाशित करवाकर कॉपीराइट कानून के तहत या अन्य वाणिज्यिक कानूनों के तहत उस लेखन से लाभ अर्जित कर सकता है, वहीं हर लेखक को इस बात का भी अधिकार है कि वह अपनी लिखी हुई चीज को प्रकाशित न होने दे। जब कोई लेखक अपनी लिखी हुई चीज को प्रकाशित नहीं करने देना चाहता है या उससे लाभ नहीं कमाना चाहता है तो जाहिर है कि उसकी मंशा दूसरी है और वह लिखकर अपना मानसिक संतोष प्राप्त करना चाहता है।

मैं यहाँ मौलाना आजाद का उदाहरण देना चाहूँगी। मौलाना आजाद ने जब अपनी आत्मकथा लिखी तो उन्होंने चाहा था कि उनकी मृत्यु के 30 वर्ष बाद ही उसके कुछ अंशों को प्रकाशित किया जाए। यदि प्रकाशक उनकी इस इच्छा का सम्मान न करके उनकी आत्मकथा को पहले ही प्रकाशित कर देता तो यह उनकी इच्छा का हनन होता। उपसभाध्यक्ष महोदय, इन तमाम तथ्यों के उल्लेख से मेरा तात्पर्य यहां पर यही है कि समय के साथ व्यक्ति की एकांतिकता की पहचान भी लगातार बदलती जाती है। इससे कई नए-नए अध्याय शामिल होते जाते हैं और नए आयाम हमारे सामने आते हैं। इसीलिए एकांतिकता की रक्षा संबंधी कानूनों पर हमेशा नजर रखने की जरूरत है

जीवन के अनुभवों से राज्य और व्यक्तियों के अधिकारों के बीच संबंधों के जो नए-नए आयाम हमारे सामने आते हैं उन पर बहुत ही खुली दृष्टि रखने की जरूरत है। तभी आप इस समाज को हर प्रकार की तानाशाही प्रवृत्ति और नौकरशाही रूझानों और ज्यादतियों से सुरक्षित रख सकते हैं। हमारे साथ बागडोदिया जी ने जो निजी विधेयक पेश किया है उनका अपना खास संदर्भ है जिस पर गंभीरता से बात करने की जरूरत है। निश्चित तौर पर ऐसे कायदे कानून विकसित किए जाने चाहिए जिनसे मनुष्य के अपने स्वत्व की, उसकी इज्जत आबरू की रक्षा की जा सके। मसलन पिछले दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि अदालतों में किसी भी अभियुक्त को हथकड़ी लगाकर लाया जाना उचित नहीं है, उसके पीछे शायद अदालत का यही नजरिया था कि आदमी के साथ जानवरों जैसा सलूक न किया जाए।

इसी प्रकार उपसभाध्यक्ष महोदय, किसी भी भी प्रकार की जांच आदि के लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा अशिष्ट व्यवहार की अनुमति नहीं दी जा सकती जिसकी चिंता यहाँ पर बागडोदिया साहब ने की है। यहाँ तक कि जिन लोगों को फौजदारी कानून के अंतर्गत अभियुक्त बनाया जाता है उन पर भी किसी प्रकार की ज्यादती न हो इसलिए भी हमारे कानून में मानव अधिकार आयोग बना हुआ है, कानून बने हुए हैं। इसी प्रकार आर्थिक अपराधों की जांच के लिए जो अधिकारी काम करते हैं उनके लिए भी एक निश्चित आचार संहिता होनी चाहिए ताकि वे आदमी की एकांतिकता का हनन नहीं कर सकें।

उपसभाध्यक्ष महोदय, यह सच है कि हमारे अधिकारियों को अनेक कठिन हालात में काम करना पड़ता है। अपराधी तत्वों को सजा दिलाना बहुत आसान काम नहीं है। अपराधियों से सही तथ्यों को हासिल करना भी कभी-कभी बहुत मुश्किल हो जाता है। लेकिन इसके बावजूद किसी को भी किसी इन्सान के साथ मनमानी करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। यदि ऐसा ही होता तो सभ्यता के विकास के साथ कानूनों के विकास की बात का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। आज का मनुष्य सिर्फ अपनी भौतिक जरूरतों की पूर्ति तक ही सीमित नहीं है, उसकी आत्मिक दुनिया निरंतर समृद्ध होती रही है और आत्मिक जगत की अपनी मांगे हैं।

उपसभाध्यक्ष महोदय, इसीलिए यदि राज्य और व्यक्ति के अधिकारों का सही संतुलन बनाए रखना है तो आदमी के इस आत्मिक जगत की मांगों की अवहेलना हम नहीं कर सकते हैं। उसकी नैतिकता, उसकी मर्यादा और उसकी संवेदनाओं को हमें समझना होगा। मैं समझती हूँ कि बागडोदिया जी ने जो यहाँ निजी विधेयक पेश किया है, उस विधेयक को हमें यहाँ व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना है और मनुष्य की निष्ठा का और उसकी एकांतता का यह जो मूलभूत अधिकार है, उस अधिकार को हम इन्हीं संदर्भों में समझें और हमारी सरकार भी इन्हीं संदर्भों में समझकर आगामी कदम उठाए।

(राज्य सभा में कांग्रेस के संतोष बागड़ोदिया के 'एकांतता (निजता) का अधिकार' विषय पर निजी विधेयक पर हुई बहस दिया गया सरला माहेश्वरी का भाषण)

नोट - राज्य सभा मे कांग्रेस के सांसद संतोष बागड़ोदिया ने 22 नवंबर 2002 के दिन संविधान संशोधन विधेयक 1999 में 'एकांतता (निजता) का अधिकार' के विषय एक नई धारा 21 (ए) को जोड़ने पर निजी विधेयक पेश किया था जिस पर 21 फरवरी 2003 के दिन हुई बहस में दिया गया सरला माहेश्वरी का भाषण :