चुनावी पंच : परिवार बड़ा न रिश्ता, सबसे बड़ी है सत्ता
चुनावी पंच : परिवार बड़ा न रिश्ता, सबसे बड़ी है सत्ता
सत्ता के लिए अपने भी हुए पराये
बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रूपैया, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में कह सकते हैं- परिवार बड़ा न रिश्ता, सबसे बड़ी है सत्ता।
इस बात को सुनकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कहीं फिर से सपा यानी यादव कुनबे में कोई कलह तो नहीं छिड़ गई?
यादव परिवार में तो अब सब ठीक होने का दावा किया जा रहा है और नेता जी भी अपने बेटे के राजनीतिक फैसलों को स्वीकारने लगे हैं। लेकिन एक यादव परिवार ही नहीं, सत्ता के रास्ते में कई और परिवारों के भीतरी कलह उभर कर सामने आ गए हैं।
अमेठी में एक तरफ जहां एक राजा की दोनों रानियां आमने-सामने हैं, तो वहीँ, दोनों रानियों के समर्थक पिता-पुत्र भी आमने-सामने हैं।
जी हाँ, अमिता सिंह अमेठी राजघराने से ताल्लुक रखने वाले राज्यसभा सांसद संजय सिंह की दूसरी पत्नी हैं, जो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी ने भी संजय सिंह की ही पूर्व पत्नी गरिमा सिंह को टिकट दिया है।
अमेठी राजघराने के राजा संजय सिंह की सियासी विरासत को लेने के लिए बेटे अनंत विक्रम सिंह राजघराने की पुरानी परंपरा के विरोध में नजर आ रहे हैं।
डॉ. संजय सिंह के बाद अनंत विक्रम सिंह रियासत और सियासत दोनों के मालिक हैं, लेकिन वे बाद का इंतजार नहीं करना चाहते और इसलिए वे मां गरिमा सिंह के पक्ष में प्रचार कमान संभाले हुए हैं। जबकि पिता संजय सिंह कांग्रेस से राज्यसभा सांसद हैं और प्रियंका गाँधी के करीबी माने जाते हैं। उन्हीं के चलते राजा संजय सिंह राज्यसभा सदस्य बनें और फिर यूपी में कांग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष बनें। वे अपनी वर्तमान पत्नी अमिता सिंह को विधायक बनाने के लिए हर चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
पिता-पुत्र और दो रानियों के आमने-सामने होने का यह नजारा राजनीति के इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन जब-जब ऐसा होता है, तब-तब मानवीय रिश्तों पर सवाल खड़े होने लगते हैं।
और इधर अपना दल का हाल भी परायों की तरह हो गया है।
अपना दल में भी हाल कुछ ऐसा ही है। यहां मां-बेटी और दो बहनें आमने-सामने हैं। कृष्णा पटेल का कहना है कि राजनीति में खून के रिश्ते नहीं होते हैं। राजनीति में उनकी बड़ी बेटी अनुप्रिया, मां की शत्रु बन गई हैं, जबकि छोटी बेटी पल्लवी भी आधे की हिस्सेदार हैं।
दरअसल अपना दल में सोनेलाल पटेल की मौत के बाद कृष्णा पटेल पार्टी की मुखिया बनीं। इसके बाद कृष्णा पटेल ने अपना दल को आगे बढ़ाने के लिए सोनेलाल पटेल की बड़ी बेटी अनुप्रिया पटेल को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया। लेकिन अनुप्रिया ने पार्टी को अपने नाम कराकर कृष्णा पटेल को पीछे छोड़ दिया।
2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने बनारस की सीट की खातिर अनुप्रिया पटेल से गठबंधन किया था। अनुप्रिया पटेल सांसद और मंत्री बन गई और कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल से अलग हो गईं।
तो, अपना दल के सियासी बंटवारे में मां-बेटी आमने-सामने हैं। अनुप्रिया पटेल की नई पार्टी का नाम अपना दल (एस) हो गया है। इस चुनाव में कृष्णा के साथ अनुप्रिया की बहन पल्लवी हैं, जबकि अनुप्रिया अकेले हैं। मां-बेटी के अलग-अलग उम्मीदवार मैदान में हैं।
सत्ता के लिए रिश्तों के खून से भी परहेज नहीं होता, यह बात उत्तरप्रदेश चुनाव में एक बार फिर साबित हुई है। जहां खुर्जा विधानसभा सीट से आरएलडी प्रत्याशी मनोज गौतम पर अपने ही भाई के कत्ल का इल्जाम लगा है।
आरएलडी प्रत्याशी मनोज गौतम पिछले काफी समय से खुर्जा विधानसभा क्षेत्र में काम कर रहे थे, पहले उन्हें बसपा ने प्रत्याशी बनाया था, लेकिन बाद में उनका टिकट काटकर अर्जुन सिंह को बसपा का विधानसभा उम्मीदवार बनाया। वे बसपा छोड़कर राष्ट्रीय लोकदल में शामिल हो गए और टिकट हासिल कर ली। चुनाव से महज कुछ दिन पहले उनके भाई और उसके दोस्त की हत्या हो गई।
आरोप है कि विधायक बनने के लिए राष्ट्रीय लोकदल के प्रत्याशी मनोज गौतम ने ही अपने भाई विनोद और उसके दोस्त सचिन की हत्या कराई है।
आरोपी मनोज और शूटर फिरोज पुलिस की गिरफ्त में हैं।
इस दोहरे हत्याकांड का खुलासा करते हुए एसएसपी ने बताया कि रालोद प्रत्याशी मनोज गौतम ने ही अपने छोटे भाई और उसके दोस्त की हत्या कराई है। ऐसा मनोज ने जनता की सहानुभूति हासिल करने के लिए किया. जिससे वो चुनाव जीतकर विधायक बन सके।
रिश्तों का कत्ल करके सत्ता पाने का इतिहास भी काफी पुराना रहा है।
सत्ता चाहे शक्तिबल से हासिल की जाए या जनबल से, उसका मकसद सिर्फ लोगों पर राज करना होता है। ऐसे सत्ताधारियों को जनता की तरक्की से कोई वास्ता नहीं, उन्हें तो बस सत्ता चाहिए...उनके लिए न कोई अपना है और न ही कोई पराया...


