चुनावी वाकयुद्ध के भूलभुल्लैया में इतिहास और राजनीति
चुनावी वाकयुद्ध के भूलभुल्लैया में इतिहास और राजनीति
वाकयुद्ध में वाक का सांस्कृतिक पतन इस देश की राजनीति को
दिशाहीन ही नहीं अपितु धुरीविहीन भी बना रही है।
सुन्दर लोहिया
वाकयुद्ध में वाक का सांस्कृतिक पतन इस देश की राजनीति को दिशाहीन ही नहीं अपितु धुरीविहीन भी बना रही है। नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार से अपने आप को जनता के समक्ष पेश कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह देश का प्रधानमन्त्री बन चुके हैं। उन्हें प्रधानमन्त्री के स्तर की सुरक्षा देना सरकार का फर्ज है। पर एक सरकार में दो प्रधानमन्त्री कैसे हो सकते हैं? इस सवाल को मोदी सोचना गवारा नहीं करते। उनकी इस जि़द को मीडिया अभी तो खासकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया उनकी दबंगई के आगे नतमस्तक दिख रहा है। हो सकता है आने वाले दिनों में प्रिंट मीडिया भी उनकी लाईन पर आ जाये। इसका कारण साफ है कि मीडिया पर विज्ञापनों से कमाई के चलते उन्हें कारपोरेट की इच्छाओं को ठुकराने की हिम्मत नहीं है। पिछले दिनों जब तक आर्थिक घोटालों में सरकारी अधिकारी और मन्त्री के नाम आते रहे मीडिया उनके बारे खोज खबर के साथ जनता के आक्रेाश को हवा पानी देते रहे। लेकिन जब घोटालों में कारपोरेट जगत के तथाकथित आदर्शपुरुष के नाम जुड़ने लगे तो तमाम रंगों के कारखानेदार अपने असली रग में उतर आये और सरकार को असहयोग की धमकी दे कर नामी गिरामी उद्योगपतियों पर मुकदमे वापिस लेने के लिए दबाव बनाने लगे। उनकी दलील थी कि इस प्रकार की न्यायिक कारवाई से उनके काम करने की स्वतन्त्रता का हनन होता है इसलिए सरकार इन उद्योगपतियों के विरुद्ध की जा रही कारवाई पर लगाम लगाये। अन्यथा सरकार जिस प्रकार का निवेश देश के आर्थिक विकास के लिए चाह रही है देश और विदेश के उद्योगपति उससे अपने हाथ खींच लेंगे। उनकी देखादेखी सरकारी बाबुओं ने भी अपनी जुबान खोलनी शुरु कर दी। वे भी सेवानिवृत्त अफसरों को नौकरी के दौरान घोटालों में संलिप्तता के लिए निर्दोष बताने लगे। उनका संकेत भी लगभग कारपोरेट जगत के समतुल्य है कि इस तरह की कारवाई से प्रशासकीय सेवा में नियोजित अफसरों का मनोबल गिरता है। दोनों तरफ से मिल रहे दबाव के संकेत एक जैसे ही हैं कि सरकार कायदे कानून लोकतन्त्र न्यायपालिका और संविधान की संकल्पनाओं को भूल कर सिर्फ उनकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के लिए सत्ता का इस्तेमाल करें। इस दो तरफा हमले में घिर चुकी अर्थशास्त्री किन्तु गैरराजनीतिक प्रधानमन्त्री की सरकार अपने आप को राजनीतिक तौर पर असुरक्षित महसूस कर रही है। इस असहाय स्थिति का चुनावों में लाभ उठाते हुए भाजपा के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी अपने आप को बिना चुनाव जीते प्रधानमन्त्री जता रहा है। मीडिया उसके इस वहम को हवा देने में मशगूल है। इसकी टीआरपी इसी के कारण बढ़ रही है और कारपोरेट जगत उस पर विज्ञापनों की बौछार लगा रहा है। कुछ लागों को यह मोदी की राजनीतिक चतुरता का ही प्रमाण लगता है जबकि यह चतुराई मुझे पंचतन्त्र की कथा के उन पात्रों की चतुराई जैसी लगती है जो एक भोले भाले किसान की कंधे पर उठाई बछिया को बार-बार गधे का बच्चा बता कर उसे भ्रमित करके बछिया को हथिया लेते हैं। नरेन्द्र मोदी भारत की भोली भाली जनता को बता रही हैं कि सरदार पटेल ने देश को एक किया वे इसे श्रेष्ठ बनायेंगे जैसे सरदार पटेल ने जो देश के लिए किया है वह उतना श्रेष्ठ नहीं जितना नरेन्द्र भाई करके दिखायेंगे। साथ ही वे यह भी कह गये हें कि तक्षशिला को बिहार में न बताकर विदेशी इतिहासकारों ने हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया है। और देखो मुसलमानों को कैसे काबू में रखा जा सकता है इसे गुजरात के उदाहरण से समझो। और सुनो नीतीश तो फूहड़ ग्रामीण और की तरह काम करता है, मैं हूं न जो गुजरात की उद्योगसंचालिका महिलाओं का सम्मान करने वाला है। मेरे यहां गंवई फूहड़ औरतों की इज़्ज़त नहीं हो सकती आखिर हमें विकास की नई मंजि़लें स्थापित करनी हैं उसमें इन गंवार महिलाओं का क्या स्थान हो सकता है सिवा कूड़ादान के। इस घालमेल के साथ कांग्रेस को सत्ता के लिए अयोग्य पार्टी बता कर उसे सिंहासन खाली करने की धमकी दे रहा है।
कांग्रेस इस पूरे परिदृश्य में हतप्रभ दर्शक जैसा व्यवहार कर रही है। उसके पास मोदी को चुनौती देने के लिए न विद्वता है और न ही आत्मविश्वास। इस मामले में नीतीश कुमार की तारीफ की जानी चाहिए कि उसने मोदी की कमज़ोर नस को पकड़ कर एक जबरदस्त बौद्धिक पटकनी दे दी और कुछ समय के लिए भाजपा के धुरन्धर वाकपटु प्रवक्ताओं की बोलती बन्द हो गई थी। उस समय केन्द्रीय कानून मन्त्री कपिल सिब्बल ने भी मोदी को खुली बहस की चुनौती देते हुए उसी के बड़बोले अन्दाज़ में कहा कि वे किसी भी विषय पर किसी भी स्थान पर और किसी भी समय सार्वजनिक बहस के लिए तैयार हैं। लेकिन अपनी चुनावी रणनीति के तहत भाजपा के उम्मीदवार प्रधानमन्त्री ने इस चुनौती को अनसुना कर दिया और अब नेहरु गान्धी परिवार के साथ प्रधानमन्त्री पर भी आरोप लगाने शुरू कर दिये। अब मोदी ने मनमोहन सिंह को आतंकवाद से लोहा लेने में असफल और पाकिस्तान और इण्डियन मुजाहिद्दीन के प्रति नरम बता कर देश में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों के लिए ही नहीं बल्कि देश के विभाजन के लिए भी कांग्रेस को जिम्मेवार ठहरा कर फिर से इतिहास की मोदीय व्याख्या के सहारे कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
इस चुनावी वाकयुद्ध में भाजपा का पलड़ा भारी लग रहा है। इसके नेता शब्दों के बाजीगर हैं। वे शब्द के सम्मोहन से भीड़ जुटाने में माहिर हैं। अपनी बात को असभ्य तरीके से पेश करने में भी कतराते नहीं ये शब्द बहादुर लोग। कांग्रेसी प्रधानमन्त्री की मौजूदगी में यह कहना कि देश की तस्वीर कुछ और होती यदि नेहरु के स्थान पर सरदार पटेल भारत के प्रधानमन्त्री मन्त्री होते- यह राजनीतिक दुस्साहस मात्र नहीं अपितु असभ्य सम्भाषण है। प्रधानमन्त्री ने उसका जिस सभ्य ढंग से उत्तर दिया उसका नरेन्द्र मोदी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उल्टे एक दूसरी रैली में एक परिवार के लिए देश का भूगोल बदल दिया जैसा आपत्तिजनक बयान देकर नेहरु परिवार को देश के बंटवारे के लिए जिम्मेवार ठहराया। लेकिन कांग्रेस इन बयानों को अनसुना करके पार्टी के चुनाव चिन्ह को खूनी पंजा कहने की शिकायत चुनाव आयोग से कर रही है। पार्टी के चुनावचिन्ह पर आरोप कोई गम्भीर तौर पर अपमानजनक प्रतीत नहीं होता। कांग्रेस भी उनके नेताओं को तानाशाह पार्टी को सियार कह चुकी हैं। गलत जगह चोट करने से कांग्रेस अपना ही पक्ष कमज़ोर करती है। पर इस पूरे चुनावी माहौल में एक खतरनाक रोल मीडिया अदा कर रहा है। इस चुनावी माहौल में मीडिया देश पर दो पार्टियों वाली अमेरिकी प्रणाली को अप्रत्यक्ष रूप में समर्थन दे रहा है। मीडिया भी यह तो मानता है कि 2014 के संसदीय चुनाव में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने की सम्भावना नहीं है। फिर इस राजनीतिक रेखागणित का तीसरा कोण कहां है? यह नहीं बता रहा। ऐसा लगता है कि मीडिया लोक कथाओं के अनुसार उड़ती हुई अबाबील द्वारा किसी अज्ञातकुलशील किन्तु सुन्दर युवक के सिर चोंच मार कर राजगद्दी का वारिस चुनने की दैवी प्रक्रिया को स्वीकार करने के लिए अपने दर्शकों की मनोभूमि तैयार कर रहा है ?


