वार्षिक प्रतिवेदन में सरकारी उदासीनता स्वीकारी

श्रीप्रकाश तिवारी
लखनऊ। यूपी में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा काफी निराश हैं। उन्होंने कहा है कि इस प्रदेश में कतिपय ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। और ये वह क्षेत्र हैं जहां अत्यधिक धन व्यय हो रहा है। लेकिन ऐसी संस्थाओं में भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर लोक आयुक्त का क्षेत्राधिकार ही नहीं पाया जाता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश न लग पाने के कारणों को दर्शाते हुए न्यायमूर्ति मेहरोत्रा ने कहा है कि लोकायुक्त के साथ कोई जांच एजेंसी सम्बद्ध नहीं है, जिसके कारण मंत्रियों और अफसरों के विरुद्ध जांच प्रभावी रूप से पूर्ण नहीं हो पाता है।

दरअसल लोकायुक्त की यह पीड़ा पिछले चार सालों के उनके अनुभव से छलकी है। इस दर्द को उन्होंने अपने वार्षिक प्रतिवेदन में व्यक्त किया है। मौजूदा सरकार और व्यवस्था से खिन्न न्यायमूर्ति सक्सेना ने बड़े ही स्पष्टतौर पर कहा है कि भ्रष्टाचार के कारणों में यदि कोई चीज दिखाई देती है तो वह है चरित्र और नैतिकता की कमी। जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी भी इन कारणों में से है जिसके कारण भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में कठिनाई हो रही है। राज्य सरकार को इन कारणों पर विचार करना चाहिए। लोकायुक्त ने कहा कि बीते वर्षो में मुझे शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार की सबसे अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं। शिक्षा ही एक ऐसा साधन है जिसके राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है। मगर शिक्षा का क्षेत्र काफी दूषित है जिसके कारण स्वार्थी, लोभी और भ्रष्ट नागरिकों की उत्पत्ति होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है। पिछले चार वर्षो के अपने कटु अनभवों को व्यक्त करते हुए जस्टिस मेहरोत्रा ने कहा है कि पूर्व वर्षो की भांति मैं आज भी यह अनुभव करता हूं कि इस प्रदेश में कतिपय ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। और ये वह क्षेत्र हैं जहां अत्यधिक धन खर्च हो रहा है। लेकिन ऐसी संस्थाओं में भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार ही नहीं पाया जाता है। ग्रामीण योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गांवों में अत्यधिक धन व्यय हो रहा है। परन्तु ग्राम प्रधान उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार में नहीं रखा गया है। यहीं नहीं पिछले चार सालों में अपने कड़े अनुभवों को आगे बताते हुए लोकायुक्त शायद सरकार को यह कह कर घेरने की कोशिश करते हैं कि प्रदेश के दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब नागरिक अपनी शिकायत लोकायुक्त तक नहीं पहुंचा पाते हैं। इसका एक कारण लोकायुक्त का एक स्थान पर केन्द्रित रहना है। उन्होंने सरकार को यह सुझाव भी दिया है कि लोकायुक्त का कार्यालय सभी मंडलों में खोला जाय।

एक तरह से सरकारी उदासीनता को बेनकाब करते हुए लोकायुक्त यह भी कहते हैं कि वह अकेले क्या कर लेने वाले हैं जब उनके पास करने के लिए कुछ संसाधन तक नहीं होगा। मसलन उनके पास एक अदद जांच एजेंसी तक नहीं है। इसकी वजह से मंत्रियों व भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जांच प्रभावी तरीके से नहीं हो पाती है। इसलिए राज्य सरकार को इस बात पर विचार करना चाहिए कि अन्य प्रदेशों की भांति यूपी के लोकायुक्त के साथ भी कोई जांच एजेंसी सम्बद्ध किया जाय।

साभार डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट