जंगलो में लगातार बढ रही है, मनुष्यों और बडे शिकारियों जानवरो के बीच खूनी लडाई।
जंगलो में लगातार बढ रही है, मनुष्यों और बडे शिकारियों जानवरो के बीच खूनी लडाई।
हरिशंकर शाही
उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद में संरक्षित वन क्षेत्र कतर्निया घाट आता है। यह वन क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और विभिन्न जानवरो की उपलब्धता से संपन्न है। इस जंगल में बडी शिकारी बिल्लियों बाघ और तेंदुओ का भी प्राकृतिक वास है। इस जंगल क्षेत्र को बाघ अनुकूलन क्षेत्र के रूप में भी माना जाता है।
प्राकृतिक रूप से सम्पन्न इस वन्य क्षेत्र से मानवो और इन बडी शिकारियों बिल्लियों के खूनी संघर्ष के समाचार लगातार आते रहते है। इस वर्ष 2011 की शुरूआत के जनवरी माह में ही लगातार घटी 3 घटनाओ में तीन लोगो की मौते हो चुकी है। 3 जनवरी को 70 वर्षीय सालिकराम 8 जनवरी को 55 वर्षीय जगमल और 10 जनवरी को 40 वर्षीय दूबर की मौत हो चुकी है। इसी प्रकार बीते वर्ष के अक्टूबर माह में ही दो घटनाये प्रकाश मे आई है। इन दो अलग घटनाओ में 18 साल के जगमोहन और 12 साल के हरिराम नामक दो लडके बाघ और तेंदुये द्वारा मारे जा चुके हैं। इसी प्रकार इस वर्ष के अन्य महीनो में 45 साल के व्यक्ति, 18 साल की लडकी और 7 साल के बच्चे की भी जान इन्ही संघर्षेा में जा चुकी है।
वन विभाग के आंकडो के अनुसार इस वर्ष 2010 में अब तक बाघ और तेंदुओ के साथ हुए संघर्षो में 6 लोग मारे गये है और 13 लोग बुरी तरह घायल हो चुके है। वन विभाग के ही पिछले दस वर्षो के विवरण के अनुसार अब तक कुल 19 लोगो की मौत और 72 व्यक्ति घायल हो चुके हैं।
इस खूनी संघर्ष पर कतर्निया घाट वन्य जीव प्रभाग के संभागीय वनाधिकारी आर0के0 सिंह कहते हैं कि यह ज्यादातर हमले मनुष्यो की गलती से होते है। लोग जाने अंजाने इन जानवरो को परेशान कर देते है जिससे स्वभावश वो हमला करते है। वह कहते है, ‘‘कई गांव वाले तो अनाधिकृत रूप से जंगल के काफी भीतरी हिस्सो मे चले जाते हैं, जो इन बडे शिकारीयों का प्राकृतिक निवास होता हैं, वहां वो इन जानवरो का शिेकार बन जाते है’’।
इन शिकारी जानवरो के हमलो में मारे गये या घायल ज्यादातर लोग वन ग्रामो के निवासी थे। इन ग्रामो के निवासीयो को आज भी जीवन-यापन के लिए जंगल पर ही आश्रित रहना पडता है। यहां के निवासी आज भी भारत के नागरिक होने के मूल अधिकारो के लिए संघर्षरत है। उस पर भी इन लोगो को इन घटनाओ को सहन करना पडता है।
इन हमलो में बाघ या तेंदुओ के आदमखोर होने की संभावना क्षीण लगती है। यहां यह घटनाये वन विभाग द्वारा अलग-अलग जानवरो से हुई रिकार्ड हुई है। विशेषज्ञ कहते है कि मानव रक्त नमकीन होता है। अगर इन बडी बिल्लियों को इसकी आदत पड जायेगी। तो वे केवल मानव शिकार ही करने लगेगा।
लगातार बढ रही मानव आबादी और सिकुड रहा वन क्षेत्र भी एक बडा कारक है। बाघ या अन्य इस तरह के जानवर मनुष्य से डरते है और मनुष्य इनसे। यही डर इन हमलो का कारक बन जाता है। वन क्षेत्रो में मानव आबादी को रोकने के लिए कुछ ठोेस कदम उठाने चाहिए अन्यथा ऐसे हमले होते रहेगें।
इस खूनी संघर्ष पर कतर्निया घाट वन्य जीव प्रभाग के संभागीय वनाधिकारी आर0के0 सिंह कहते हैं कि यह ज्यादातर हमले मनुष्यो की गलती से होते है। लोग जाने अंजाने इन जानवरो को परेशान कर देते है जिससे स्वभावश वो हमला करते है। वह कहते है, ‘‘कई गांव वाले तो अनाधिकृत रूप से जंगल के काफी भीतरी हिस्सो मे चले जाते हैं, जो इन बडे शिकारीयों का प्राकृतिक निवास होता हैं, वहां वो इन जानवरो का शिेकार बन जाते है’’।
इन शिकारी जानवरो के हमलो में मारे गये या घायल ज्यादातर लोग वन ग्रामो के निवासी थे। इन ग्रामो के निवासीयो को आज भी जीवन-यापन के लिए जंगल पर ही आश्रित रहना पडता है। यहां के निवासी आज भी भारत के नागरिक होने के मूल अधिकारो के लिए संघर्षरत है। उस पर भी इन लोगो को इन घटनाओ को सहन करना पडता है।
इन वन ग्रामो के निवासियो के अधिकार के लिए करीब 7 वर्षो से संघर्ष कर रहे एन0जी0ओ0 ‘‘देहात‘‘ के निदेशक डा0 जितेन्द्र चर्तुवेदी वन विभाग के कथन से विरोध करते है। वह कहते है कि वन ग्रामो के लोग के फंूस के घरो में रहते है। इन्हे ईधन से लेकर प्राकृतिक कार्यो तक के लिए जंगल पर र्निभर रहना होता है। यहां के लोगो को ना तो बी0पी0एल0 कार्ड मिलता है ना ही अन्य कोई सरकारी सुविधा। यह जंगल सबका है जंगल विभाग की संपत्ति नही है। वह आगे कहते है, ‘‘ इन हमलो के लिए लोगो ने कई बार वन विभाग से वन ग्रामो के आस-पास तार लगाने और खाई खोदने के लिए कहा है। परन्तु वन विभाग को कोई फर्क नही पडा’’।
बाघ/तेंदुये के संघर्ष के वन विभाग के आंकडे।
क्र0सं0 वर्ष बाघ/तेंदुये के द्वारा मृतक बाघ/तेंदुये के द्वारा घायल
1 2001 2 2
2 2002 - 1
3 2003 3 -
4 2004 - -
5 2005 2 8
6 2006 1 12
7 2007 - -
8 2008 5 20
9 2009 - 16
10 2010 6 13
11 2011 3 (अब तक) 5 (अबतक)
क्ुल 22 77


