जज साहब नहीं चुनेंगे जज साहब को-लोकसभा की मुहर
जज साहब नहीं चुनेंगे जज साहब को-लोकसभा की मुहर
नई दिल्ली। न्यायपालिका और सरकार के बीच तनाव का कारण बना राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक-2014 लोकसभा में पास हो गया है। विधेयक के पक्ष में 367 वोट पड़े।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 को एक सरकारी संशोधन के साथ ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इसके साथ ही सदन ने 99वें संविधान संशोधन विधेयक को शून्य के मुकाबले 367 मतों से मंजूरी दे दी गयी जो प्रस्तावित आयोग को संवैधानिक दर्जा देगा।
बिल अब राज्यसभा में पेश किया जाएगा, जहाँ सरकार के सामने इसे पास कराने की चुनौती होगी, क्योंकि वहाँ भाजपा के पास बहुमत नहीं है। संभावना है कि राज्यसभा में कांग्रेस इस बिल में संधोधन की मांग करे।
अब सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए 6 सदस्यीय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनेगा। न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने के मकसद से केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक भी पेश किया है। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में जजों की नियुक्ति के लिए छह सदस्यीय इकाई के गठन का प्रावधान है।
मंगलवार को इस बिल पर लोकसभा में लंबी बहस हुई थी। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता में यकीन करती है लेकिन संसद की सर्वोच्चता और पवित्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
This bill is a monumental disaster,we will eventually realize it later-Justice(Retd) RS Sodhi on Judicial Bill pic.twitter.com/lQMyGhrEhT
— ANI (@ANI_news) August 13, 2014
इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने कठोर रुख अपनाते हुए कहा था कि न्यायपालिका को बदनाम करने के लिये किए जा रहे प्रयासों और भ्रामक अभियान से लोकतंत्र को बड़ा नुकसान हो रहा है। मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था, ‘न्यायपालिका को बदनाम करने के लिये भ्रामक अभियान चल रहा है और बार-बार गलत सूचना फैलाने के प्रयास किए गए हैं।’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा था, ‘यदि जनता की आंखों में न्यायपालिका को बदनाम करने के लिये कोई अभियान चलाया जा रहा है तो आप लोकतंत्र को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं।’ उन्होंने कहा था, ‘न्यायपालिका से लोगों के विश्वास को न हिलाएं। ईश्वर के लिये न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश नहीं करें।’ उन्होंने कहा, “कॉलेजियम सिस्टम के पहले बैच से आने वाला जज मैं हूं और जस्टिस नरीमन इस सिस्टम से आने वाले आखिरी जज हैं। अगर सिस्टम गलत है तो हम भी गलत हैं।” पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति आर. एफ. नरीमन भी थे।
If we want efficient&clean judiciary then the judicial accountability bill must be supported-Sanjay Raut,Shiv Sena pic.twitter.com/JGEaGKcssX
— ANI (@ANI_news) August 13, 2014
मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि एक संस्था के रूप में लोगों को चुनने में कॉलेजियम की अपनी सीमाएं हैं। उन्होंने कहा, ‘आखिरकार न्यायाधीश भी उसी समाज से आते हैं, लेकिन केवल एक या दो न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों की वजह से कोई अभियान चलाना अनुचित है।’
मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि वर्तमान में सभी न्यायाधीश कॉलेजियम प्रणाली की देन हैं। उन्होंने कहा, ‘यदि आप कहते हैं कि प्रणाली विफल हो गई है तो इसकी देन भी विफल हो गई है। यदि आप ऐसा कहते हैं तो हम भी विफल हो गए हैं और हर कोई विफल हो गया है।’ उन्होंने कहा कि न्यायपालिका का नाम खराब करने के लिये जिस तरह अभियान चलाया जा रहा है, वह देश के लिये बड़ी हानि की जा रही है।
लोकसभा में सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सिर्फ मेधावी लोग ही उच्च अदालतों में न्यायाधीश के रूप में नियुक्त हों। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सदन में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 के साथ संविधान के 99वें संशोधन विधेयक पर हुई चर्चा का उत्तर देते हुए कहा कि प्रस्तावित विधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रभाव नहीं डालता। उन्होंने कहा कि नया कानून उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए व्यापक विचार विमर्श का अवसर प्रदान करेगा।
श्री प्रसाद ने उन आशंकाओं को गलत बताते हुए कि नया कानून न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कम करेगा। उन्होंने कहा, ‘‘हम न्यायपालिका की पवित्रता को बनाए रखने के पक्षधर हैं। हमने कहा है कि यह सदन न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करता है।’’ सभी दलों के समर्थन की अपील करते हुए प्रसाद ने कहा, ‘‘ यह संदेश जाना चाहिए कि यह सदन न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने के लिए एक है।’’
जजों द्वारा जजों की नियुक्ति किए जाने की मौजूदा कोलेजियम व्यवस्था में खामियाँ होने को रेखांकित करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि कई अच्छे जज उच्चतम न्यायालय तक नहीं पहुंच सके।
The Constitution (One Hundred and Twenty-First Amendment) Bill, 2014 and the National Judicial Appointments Commission Bill (NJACB), 2014 should be opposed unless the supremacy of judiciary is restored and the judiciary is fully insulated from the political processes. The Bills should be referred to a Parliamentary Select Committee and wider consultation must be held with all the stakeholders. Independence of judiciary is too sacrosanct to be compromised in any country claiming to be democratic and governed by the supremacy of the rule of law.
-Suhas Chakma, Director, Asian Centre for Human Rights
कॉलेजियम उच्चतम न्यायालय की वह व्यवस्था है, जिससे उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है। कॉलेजियम की कार्य-प्रणाली को लेकर सवाल कोई पहली बार नहीं उठा है। 1993 में, जब जजों की नियुक्ति का काम कार्यपालिका के हाथ से न्यायपालिका के हाथ आया, तभी से इस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में जब जज के पद पर गोपाल सुब्रमण्यम की नियुक्ति पर उच्चतम न्यायालय और केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई थी, तब भी कॉलेजियम व्यवस्था पर विवाद खड़ा हुआ था।
ताजा विवाद मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश रह चुके जस्टिस मारकण्डेय काटजू के हस्तक्षेप.कॉम पर प्रकाशित एक लेख से खड़ा हुआ, जिसमें उन्होंने एक तदर्थ जज को सेवा विस्तार देने का मामला उठाया था। इन जज के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें थीं, लेकिन कथित तौर पर संप्रग में शामिल दल द्रमुक उसके पक्ष में था। पहले उन्हें सेवा विस्तार दिया गया और बाद में स्थायी जज बना दिया गया।


