जड़सूत्रवाद, वह वेदांतियों का हो या मार्क्सवादियों का, हमेशा हास्यास्पद होता है ! ‘
जड़सूत्रवाद, वह वेदांतियों का हो या मार्क्सवादियों का, हमेशा हास्यास्पद होता है ! ‘
जड़सूत्रवाद, वह वेदांतियों का हो या मार्क्सवादियों का, हमेशा हास्यास्पद होता है !
‘सूत्रारूढ़’ सोच की हास्यास्पदता
- अरुण माहेश्वरी
प्रकाश करात के 6 सितंबर 2016 के इंडियन एक्सप्रेस वाले लेख Know your Enemy के बारे में सोच कर अचानक ही हंसते-हंसते पेट फटने लगा था। उन्होंने इसमें लिखा था –
‘‘The classic definition of fascism leaves no room for ambiguity: Fascism in power is “the open terrorist dictatorship of the most reactionary, most chauvinistic and most imperialist elements of finance capital.”
अर्थात्
‘‘फासीवाद की शास्त्रीय परिभाषा में किसी प्रकार की अस्पष्टता की गुंजाइश नहीं है : सत्तासीन फासीवाद ‘‘ वित्तीय पूंजी की सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी, सबसे अधिक अंधराष्ट्रवादी और सबसे अधिक साम्राज्यवादी खुली आतंकवादी तानाशाही है।’’
हम फासीवाद संबंधी इस पूरे विमर्श से परिचित हैं, इसलिये इसे पढ़ पा रहे हैं।
लेकिन हम सोच रहे थे कि जो तमाम लोग (कह सकते हैं भारत के 99.99 प्रतिशत लोग) इन विषयों पर पुरानी मार्क्सवादी बहसों से परिचित नहीं है, उनको प्रकाश करात द्वारा उद्धृत यह ‘शास्त्रीय परिभाषा’ कैसी लगती होगी ?
करपात्री महाराज का दो खंडों में लगभग 2300 पृष्ठों का एक विशाल ग्रंथ है - ‘वेदार्थपारिजात:’। खंडन-मंडन की शास्त्रीय परंपरा का ग्रंथ। इसमें एक बहुत बड़ा हिस्सा है - ‘दयानंदमतखंडनम्’। अर्थात् दयानंद सरस्वती के मत का खंडन।
इसका मैं एक छोटा सा उदाहरण देता हूं (वैसे इस ग्रंथ में ऐसे हजारो उदाहरण भरे हुए हैं )।
इसमें करपात्री जी ‘यागो में प्रकृति-विकृतिविचार’ के अन्तर्गत सांख्यमत के एक अनुयायी लेखक से प्रकृति के रूप के बारे में विवाद करते हुए लिखते हैं कि
‘‘मीमांसकों ने ‘यत्र समाग्रांगेपदेश: सा प्रकृति:’ यह प्रकृति का लक्षण किया है। इसी लक्षण का परिष्कृतरूप यह होगा - जो पदार्थ, जिस प्रकार के उपकार के द्वारा जिसका अंग हुआ है, उसके सम्बन्धि के रूप में उसी प्रकार के उपकार के द्वारा उस पदार्थ में अन्यांगत्व बोधकप्रमाण को अतिदेश कहा गया है। तथाहि - जैसे प्रयाज-अनुयाजादि पर अदृष्ट उपकार और दृष्टार्थों पर दुष्ट उपकार के पदार्थ, अदृष्टार्थों द्वारा आग्नेयादि के अंग रूप में अवधारित हुआ है, अत: उस...’’(पृष्ठ - 2095)
‘प्रकृति के लक्षणों की करपात्री जी महाराज की इस ‘सूत्रारूढ़’ व्याख्या को पढ़ कर आपको कैसा लगा ?
इस पर आप सिर्फ पेट भर कर हंस सकते हैं !
जड़सूत्रवाद, वह वेदांतियों का हो या मार्क्सवादियों का, हमेशा सचमुच इतना ही हास्यास्पद होता है !


