जन और लोक का भेद ही गलत है
जन और लोक का भेद ही गलत है
जन और लोक का भेद ही गलत है। भेद वर्ग चेतना के आधार पर नही सम्पत्ति के स्वामित्व के आधार पर करना चाहिए
एक समीक्षा पढी समीक्षक महोदय ने कविता पर बात की अपेक्षा 'जन' और 'लोक' के अन्तर को स्पष्ट करने मे सारी मेहनत जाया कर दी।
मुझे समझ मे नही आता कि 'जन' और 'लोक' को अलग मानकर लोग क्या सिद्ध करना चाहते हैं। अधिकतर उनका तर्क होता है कि 'जन' वर्गचेतन होता है और 'लोक' वर्गचेतन नही होता। यह सच है तो क्या 'जन' मे पढ़े- लिखे वर्गचेतन समझदार लोग ही आते हैं ? जबकि हमारी लडाई किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं के लिए है, जिनमें अधिकांश वर्गचेतन नहीं हैं। इसके विपरीत गांव और शहर का श्रमजीवी वर्ग पूंजीवादी मूल्यों व अन्धविश्वास, धार्मिक जातिवादी सरोकारों से युक्त है। क्या ये हमारी लडाई का हिस्सा नहीं हैं ?
पढ़े-लिखे होने, वर्गचेतन होने की बात ही न करिए, वो पूर्ण रूप से बुर्जुवा साजिशों मे उलझे हुए हैं। चूंकि यह लोग सर्वाधिक हैं, श्रमजीवी हैं, सर्वहारा हैं, हमारी लडाई का अंग हैं। अत: हम लोग 'लोक' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसमें वर्गचेतन और अचेतन दोनों प्रकार के संवर्ग सम्मिलित हैं। लोक का विलोम अभिजन या अभिजात्य है जिसे श्रेष्ठ कहा जाता है। ये वर्ग स्वामियों का वर्ग है। लोक में स्वामी धनपति वर्ग नहीं आते, अपितु वे वर्ग आतें हैं जिनके पास अपनी निजी सम्पत्ति नहीं है या है भी तो इतनी कम है कि उनका जीवन 'स्वामी' की तरह नही मजदूर की तरह श्रमप्रधान होता है।
मेरे कहने का आशय है कि जन और लोक का भेद ही गलत है। भेद वर्ग चेतना के आधार पर नही सम्पत्ति के स्वामित्व के आधार पर करना चाहिए इस दृष्टि से देखने पर दो ही वर्ग बनते हैं जन या लोक और अभिजन या बुर्जुवा।
उमाशंकर सिंह परमार


