तनवीर जाफरी

वैसे तो दुनिया की नज़रों में भारतीय संविधान के अंतर्गत देश की संसदीय व्यवस्था ही भाारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व करती है। और देश के मतदाता देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक लोकसभा व राज्यों की विधानसभाओं में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर भेजते आ रहे हैं। 543 सदस्यों की देश की लोकसभा पूरे देश के आम नागरिकों का प्रतिनिधित्व करती है। देश के कायदे-कानून तय करना, उनमें संशोधन करना,देश की प्रगति तथा विकास के लिए समय-समय पर विभिन्न योजनाएं बनाना तथा आम भारतीयों के हितों के लिए निरंतर काम करते रहना या फिर इन्हें सीधे-सादे शब्दों में कहें तो देश की व समाज की सेवा करना इन जनप्रतिनिधियों का परम दायित्व है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों तथा देश के संविधान निर्माताओं ने देश को स्वाधीन कराकर तथा अपने देश के स्वतंत्र संविधान की रचना कर यही सपना देखा था कि देश के निर्वाचित जनप्रतिनिधि स्वतंत्र भारत को तरक्क़ी की उस राह पर ले जाएंगे जिस पर चलकर दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र भारत न केवल पूरी तरह आत्मर्निभर बनेगा बल्कि एक दिन ऐसा ाी आएगा कि हमारा देश दुनिया के विकसित देशों की श्रेेणी में शामिल होने तक की मंजि़ल को भी तय करेगा।

परंतु राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सहित समस्त स्वतंत्रता सेनानियों व संविधान निर्माताओं की उन उ मीदों पर शायद इन्हीं जन प्रतिनिधियों की राजनीति की शैली, महत्वाकांक्षा तथा राजनीति में अपना मज़बूत स्थान बना चुकी सत्ता व स्वार्थ की इनकी मनोवृति ने पानी फेर दिया। हमारे देश के तमाम जन प्रतिनिधियों ने राजनीति को देश व समाज की सेवा का सशक्त माध्यम समझने के बजाए इसे धन संग्रह करने,अपने परिवार के सदस्यों को अलोकतांत्रिक तरीके से जनता के सिर पर मढऩे,सत्ता का दुरुपयोग करने,काला धन कमाने व इक_ा करने,अपने बाहुबल को मज़बूत करने, अपने प्रतिद्वंद्वी अथवा विपक्षी नेता व दल को मान-स मान देने के बजाए उसे अपमानित करने व नीचा दिखाने तथा बेरोक-टोक भ्रष्टाचार करने का माध्यम समझ लिया है। इसके परिणामस्वरूप देश के तमाम नेता जो कल तक आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहे थे या आर्थिक रूप से संपन्न नहीं थे वही नेता आज करोड़पति,अरबपति,उद्योगपति तथा धनकुबेर बन चुके हैं। और स्वयं को संपन्न बनाने की इस प्रवृति ने नेताओं का ध्यान उनके अपने मु य दायित्व अर्थात् जन समस्याओं के समाधान की ओर से मोड़ दिया है। बजाए इसके कि यही नेतागण आम लोगों की समस्याओं के समाधान में अपनी उर्जा खर्च करते तथा देश की विकास संबंधी योजनाओं में अपनी शक्ति,राजनीति व योग्यता का प्रयोग करते उल्टे ऐसे भ्रष्ट नेता दिन-रात केवल इसी उधेड़-बुन में लगे रहते हैं कि आम लोगो को किस प्रकार से गुमराह कर, भड़काकर, वरगला कर अथवा इन्हें विभाजित कर अपने पक्ष में अधिक से अधिक मतों का ध्रुवीकरण कराया जाए। और ऐसे नेताओं की बदनीयती एवं स्वार्थपूर्ण राजनीति के परिणामस्वरूप ही हमारा देश कहीं अलगाववाद का शिकार है तो कहीं सांप्रदायिकता का। कहीं जातिवाद का बोलबाला है तो कहीं क्षेत्रवाद व भाषा को लेकर विवाद बना रहता है। और इन नकारात्मक परिस्थितियों का खामियाज़ा देश व देश की जनता को कुछ इस प्रकार भुगतना पड़ता है कि देश में भूख व गरीबी के चलते लोगों को आत्महत्याएं करनी पड़ती हैं। बेरोज़गारी अपने चरम पर है। बिजली,पानी व सड़क जैसी आधारभूत सुविधा समस्त देशवासियों को अब तक उपलब्ध नहीं हो सकी है। कृषि प्रधान देश का kकजऱ् में डूबा अन्नदाता $कजऱ् न चुका पाने के चलते आत्महत्या करता है। देश में कभी सांप्रदायिक दंगों में राजनैतिक लोग अपनी रोटियां सेकते हैं,कभी जातिवादी संघर्ष की आड़ में राजनीति की जाती है। गांव का विकास उतनी तेज़ी से नहीं हो पा रहा जितनी तेज़ी से होना चाहिए। हां यदि देश में कोई वर्ग आर्थिक तरक़्$की करता दिखाई दे रहा है तो वह है केवल देश का भ्रष्ट वर्ग यानी भ्रष्ट नेता,भ्रष्ट अ$फसरशाही तथा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारीगण या भ्रष्टाचार के नेटवर्क से जुड़े लोग।

देश की राजनैतिक व्यवस्था के भ्रष्टाचार में डूबने कापरिणाम अब यह देखने को मिल रहा है कि आम जनता भले ही वह अपना जनप्रतिनिधि क्यों न चुनती हो परंतु उसे अब अपने ही द्वारा निर्वाचित किए गए प्रतिनिधि पर विश्वास नहीं रहा। जो जनता कल तक $खामोश रहकर नेताओं व अधिकारियों के यहां तक कि भ्रष्ट न्यायाधीशों के भ्रष्ट आचरण को सहन करती रहती थी अब वही आम जनता यह महसूस करने लगी है कि अब पानी सिर से ऊपर हो चुका है। लिहाज़ा इस भ्रष्ट व्यवस्था का मुखरित हो कर विरोध किया जाना चाहिए। $खासतौर पर गत् कुछ वर्षों से राजनीति,भ्रष्टाचार तथा मा$िफया के मिले-जुले नेटवर्क के कुछ ऐसे दिल को दहला देने वाले उदाहरण सामने आए कि आज आम जनता सड़कों पर आने से स्वयं को नहीं रोक सकी। इनमें बिहार में इंजीनियर सत्येंद्र दूबे की हत्या,उत्तर प्रदेश में इंडियन ऑयल के अधिकारी मंजुनाथन का बेरहमी से किया गया कत्ल तथा मालेगांव में एडीएम यशवंत सोनावणे को जि़ंदा जलाकर मारा जाना जैसी घटनाएं शामिल हैं। गोया देश की जनता अब इस निर्णय पर पहुंच चुकी है कि ऐसी घटनाएं देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की ही देन हैं। और जनता के इसी निष्कर्ष ने देश को अन्ना हज़ारे तथा बाबा रामदेव जैसे लोगों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोलने के लिए इन पर विश्वास किया है।

देश में इस समय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों,धरनों व प्रदर्शनों का दौर चल रहा है। गांधीवादी तरीके से देश की जनता कहीं अनशन कर रही है तो कहीं धरना व प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है। इन सभी विरोध प्रदर्शनों में एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है कि भ्रष्टाचार समाप्त करो, भ्रष्टाचारियों को दंडित करो,भ्रष्टाचारियों की भ्रष्टाचार से कमाई गई संपत्ति को ज़ब्त करो तथा भ्रष्टाचारियों द्वारा विदेशों में जमा किए गए काले धन को ज़ब्त कर उसे सरकारी संपत्ति घोषित किया जाए तथा इस अकूत धन को देश के विकास कार्यों में लगाया जाए। यह मांग आम नागरिकों द्वारा आयोजित धरना व प्रदर्शनों में की जा रही है। यहां पेचीदा सवाल यह है कि आम भारतीय नागरिक अपने ही द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों का अपने अहिंसक विरोध प्रदर्शनों के माध्यम से इस बात का दबाव डाल रहे हैं कि भ्रष्ट व्यवस्था परिवर्तित हो तथा राजनीति व अ$फसरशाही तथा न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त हो। ऐसे में एक सवाल यह ज़रूर उठता है कि भ्रष्टाचार में डूबे लोग विशेषकर नीति निर्माता क्या अपने ही विरुद्ध कोई कानून बना सकेंगे? भ्रष्टाचार का आदी हो चुका यह वर्ग क्या अब स्वयं को भ्रष्टाचार के बिना रहने का आदी बना सकेगा? क्या यह लोग अपनेही विरुद्ध किसी जांच या कार्रवाई के लिए राज़ी होंगे? और इन्हीं प्रश्रों ने सिविल सोसायटी अर्थात् आम नागरिकों की ओर से कथित तौर पर जन लोकपाल विधेयक संसद में लाने हेतु एक प्रारूप समिति का गठन किया। अन्ना हज़ारे सहित चार और प्रमुख लोग इस प्रारूप समिति के सदस्य बने। इस प्रारूप समिति का दावा है कि वह आम नागरिकों की नुमाईंदगी करती है। अभी लोकपाल बनाम जनलोकपाल विधेयक का मुद्दा बीच में ही था कि अचानक बाबा रामदेव भी स्वयं को 121 करोड़ भारतीयों का कथित तौर पर प्रतिनिधि बताते हुए भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में कूद पड़े। गोया बाबा रादेव भी अन्ना हज़ारे की ही तरह जनता से यह बताने लगे कि भ्रष्टाचार व काले धन के विरुद्ध संघर्ष का सबसे सशक्त चेहरा मैं ही हूं।

नि:संदेह देश की जनता भ्रष्टाचार,भ्रष्टाचारियों, काला धन तथा देश को बेचकर खाने की प्रवृति रखने वाले नेताओं व अधिकारियों से त्राहि त्राहि कर रही है। इसमें भी कोई शक नहीं कि देश की $गरीबी,पिछड़ेपन,बदहाली तथा भुखमरी का मु य कारण भी देश के भ्रष्ट लोग ही हैं। परंतु भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम नागरिकों की ओर से अधिकृत रूप से भ्रष्टाचार विरोधी परचम कौन बुलंद करे इस बात का $फैसला आखिर कैसे होगा? जहां तक भीड़ जुुटाने का प्रश्र है तो हमारे देश में हज़ारों ऐसे नेता व समाजसेवी हैं जो दिल्ली के रामलीला मैदान व जंतर-मंतर पर इक_ी भीड़ की ही तरह या इससे भी ज़्यादा भीड़ चुटकी बजाते इक_ी कर सकते हैं। वैसे भी भीड़ इक_ी करने की कला नेताओं से अधिक कोई नहीं जानता जो न सिर्फ भीड़ इक_ी करने में महारत रखते हैं बल्कि इस भीड़ के बल पर जनप्रतिनिधि भी बन जाते हैं तथा बाद में इसी भीड़ की छाती पर बैठकर 5 वर्षों तक जमकर देश व देश की जनता को लूटते-खसोटते भी रहते हैं। कुछ इस तरह कि गोया जनता ने इन्हें देश व समाज की सेवा का नहीं बल्कि देश को बेच खाने का लाइसेंस दे दिया हो। परंतु इसके बावजूद हमारी व्यवस्था,हमारा संविधान हमें इनको माननीय विधायक,माननीय सांसद व माननीय मंत्री जी कहने को बाध्य करता है।

बावजूद इसके कि भारतीय संविधान विधायिका से जुड़े इन्हीं जनप्रतिनिधियों को ही वास्तविक एवं वैधानिक जनप्रतिनधि स्वीकार करने की भारतीय नागरिकों को हिदायत देता है परंतु राजनैतिक व्यवस्था के ज़मीनी हालात तो यही बता रहे हैं कि आम जनता का इनसे विश्वास उठ गया है। और अविश्वास के इसी वातावरण ने आम लोगों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट होने को मौका दिया है। परंतु भ्रष्ट व्यवस्था तथा भ्रष्टाचार विरोधी जनाक्रोश के मध्य यह प्रश्र अपनी जगह पर सबसे अहम है कि आखिर जनता की नुमाईंदगी करने का अधिकार किसे हो? यह अधिकार कौन दे? यह अधिकार किस प्रकार दिया जाए और इस बात की क्या गारंटी हो कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होने वाला व्यक्ति या संगठन स्वयं पूरी तरह पाक-साफ व भ्रष्टाचार मुक्त हो। और इससे भी अहम बात यह कि वह व्यक्ति या संगठन देश की आम जनता विशेषकर सभी विचारधाराओं के लोगों का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य व्यक्ति या संगठन