भारतीय राजनीति का तीसरा दावेदार
सुन्दर लोहिया
उड़ीसा के मुख्यमन्त्री नवीन पटनायक ने भाजपा प्रायोजित प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार और कांग्रेस में अघोषित भावी प्रधानमन्त्री राहुल गान्धी के बारे में यह कह कर खारिज कर दिया है कि ये दोनों देश की जनता द्वारा खारिज कर दिये जायेंगे क्योंकि दोनों ही जनता को अपने साथ ले चलने में असमर्थ हैं। इनके आकलन के मुताबिक आगामी चुनाव में तीसरा मोर्चा सत्तासीन हो सकता है। पर उनकी बात भी बनती दिखती नहीं क्योंकि जिस तीसरे मोर्चे की पटनायक बात कर रहे हैं उसके प्रमुख किरदारों में से एक तेलगुदेशम पार्टी के अध्यक्ष चन्द्रबाबू नायडू नरेन्द्र मोदी की नमो कीर्तन मण्डली में शामिल हो गये हैं और दूसरे जनता दल यूनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार कांग्रेस और भाजपा के बीच में किसी एक का चुनाव कर पाने का राजनीतिक साहस नहीं दिखा रहे। कभी बिहार को विशिष्ट राज्य का दर्जा दिये जाने के लिए सोनिया जी का गुणगान करते हैं तो कभी मोदी से नाराज़ लेकिन वाजपेयी और अडवानी वाली भाजपा के साथ मानसिक जुड़ाव की बात करते हैं। हां, लालूप्रसाद यादव को जेल हो जाने के बाद किस का नम्बर आयेगा इससे बेचैन मुलायम सिंह यादव प्रधानमन्त्री न भी बने तो किंगमेकर बन कर जान बचाने की जुगाड़ में जुटे हैं। वाम भी तीसरा मोर्चा बनाना चाहता है लेकिन उनकी वर्तमान राजनीतिक हैसियत देखते हुए नवीन पटनायक सरीखें चाकचौबन्द नेता उनका नाम नहीं ले रहे। उन्हें खतरा है कि तीसरे मोर्चे में यदि वामपंथियों की ताकत ज़्यादा हुई तो प्रधानमन्त्री उन्हीं का हो ऐसा दबाव बन सकता है जिससे वे बचना चाहते हैं।

ले दे कर पटनायक के तीसरे मोर्चे में उनकी कमान के नीचे सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के छोटे छोटे राज्य रह जाते हैं। लेकिन इन राज्यों के सांसदों की संख्या बहुत कम है इसलिए मोर्चं के कारगर होने की सम्भावना नज़र नहीं आ रही।

इसके बाद तीसरा मोर्चा नम्बर दो का दावा माकपा कर रही है। इसमें जो बाकी भ्रष्ट पार्टियां बची हुई हैं उनका गठबन्धन शेष बचता है। मुलायम की सपा मुज़्जफर नगर के साम्प्रदायिक दंगो से पहले दुर्गा शक्ति की बर्खास्तगी के मामले में दागदार हो चुकी पार्टी है। उत्तरप्रदेश के मुसलमानों का विश्वास उससे उठ चुका है। शेष बचे तामिलनाडु के नेता तो जयललिता मोदी के साथ मंच भले ही साझा न करे लेकिन वाम के प्रति रुझान नहीं है। उसे कांग्रेस या भाजपा में से एक चुनना है और जयललिता का चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसके धुर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के करुणा किस नाव के सवार बनते हैं। कांग्रेस गठबन्धन की दुहाई देते हुए ए राजा और कोनी मोझी के भ्रष्टाचार के मामले सिरे चढ़़ने से रोके हुए है इसलिए जयललिता ने भावी गठबन्धन का फैसला भी ताक पर रख दिया गया है। लेकिन इतना लगभग निश्चित है कि वह देश की दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में से ही किसी एक का ही साथ देंगी। भले ही पिछले चुनाव में उसे वामपंथियों के सहयोग के कारण सत्ता प्राप्त हुई है।

तीसरा मोर्चा बने या न बने लेकिन पटनायक की यह बात राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि प्रमुख पार्टियों के दोनों उम्मीदवार जनता को अपने साथ लेने की क्षमता नहीं रखते हैं। यह बात लोकतन्त्र की व्यवस्था में वह भी साठ पैंसठ साल के अनुभव के बाद क्या राष्ट्रीय विडम्बना नहीं है कि हम ऐसे नेताओं का चुनाव के लिए विवश हैं जो जनता को अपने साथ नहीं ले जा सकते पर वे उसका प्रतिनिधित्व करेंगे। यह कैसा जनतन्त्र होगा जिसमें जनता के साथ न होने पर भी लोकतान्त्रिक सरकार चुनी जायेगी? कहीं हम जनतांत्रिक तरीके से तानाशाह चुनने का तमाशा तो नहीं कर रहे होंगे ?

वैसे गहराई में झांक कर देखें तो इन दोनों पार्टियों के भीतर तानाशाही प्रवृत्तियां छलकती हुई नज़र आ जाती है। भाजपा ने जिस तरह से पार्टी ने वरिष्ठ और समर्पित नेताओं की अनदेखी करते हुए साम्प्रदायिक दंगों के लिए जवाबदेह गुजरात के मुख्यमन्त्री को अपना भावी प्रधानमन्त्री घोषित किया उसमें लोकतन्त्र की मर्यादाओं का उल्लंघन नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता। बहुदलीय लोकतान्त्रिक प्रणाली के अंतर्गत प्रधानमन्त्री का चुनाव बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी आपसी सहमति के साथ किया जाता है। चुनाव से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव पार्टी के एक उम्मीदवार के रूप में होता है। भाजपा भारतीय लोकतन्त्र की परम्परा छोड़ कर अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनाव पद्धति का वरण करके यह सिद्ध करना चाहती है कि उसे कैबिनेट के सामूहिक जिम्मेवारी की अपेक्षा एक व्यक्ति के विवेक पर ज़्यादा भरोसा है। इसमें फासीवाद की दबिश साफ सुनाई दे रही है। नाम की औपचारिक घोषणा के बाद नरेन्द्र मोदी के अन्दाज़ बदल गये। उसकी आंगिक भाषा में मन की गहराइयों में दबी कुचली आक्रामकता एकदम ऊफन कर बाहर आ गई है। जिस तरह की भाषा वे बोल रहे हैं वह लोकतान्त्रिक राजनीति के संस्कारों से विहीन हैं। हर बात के लिए सोनिया और राहुल को जिम्मेवार ठहराना सास बहू और दामाद को राजनीति की शतरंज के मोहरे बना कर उपहास करना अशोभनीय है। भाषा को लचर होने देने का ही परिणाम है कि उस नरेन्द्र मोदी को जिसे संघ परिवार हिन्दूपादशाही का आधुनिक संस्थापक देखना चाहता है, पहले शौचालय फिर देवालय का नारा देने के कारण शिवसेना बजरंगदल और विश्व हिन्दू परिषद नेताओं के कोप का भाजन बनना पड़ा।

एंग्रीयंगमैन उम्र के हिसाब से राहुल का गलत भाषा का इस्तेमाल क्षम्य माना जा सकता है लेकिन सफेद हो चुकी दाढ़ी के साठ साल वाले वयस्क को भाषा के मामले मे बख्शा नहीं जा सकता है। उधर काग्रेस खेमे में जो पक रहा है उसमें जनतन्त्र के जलने की गन्ध आ रही है। सत्ता का ऐसा नशा पहले कभी नहीं देखा। इंदिरा गान्धी को तानाशाही लादने का दोषी माना जाता है लेकिन उसने जनता के हित ऐसे काम किये हैं जिनके लिए यह देश उनका ऋणी रहेगा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण प्रीवीपर्स का खत्म किया जाना और बंगला देश को स्वतन्त्र देश के रूप में अस्तित्व में लाना। लेकिन तीसरी पीढ़ी में उसके वंश नाम पर जनता पर मंहगाई लाद कर रिलायंस जैसी कम्पनी की धोखा धड़ी पकड़े जाने के बावजूद फायदा पहुंचाने की आर्थिक नीतियां और दागी नेताओं को बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ आर्डिनेंस जारी करना और राहुल गान्धी की छवि को लोकहितकारी बताने की गरज़ से मन्त्रीमण्डल के फैसले को बकवास कहना कुल मिला कर ये संकेत देते हैं कि जनतन्त्र की सेहत वहां भी ठीक नहीं है।

तब समस्या है इस जनतन्त्र को बचाया कैसे जाये ?