तृतीय अरविन्द स्मृति संगोष्ठी का तीसरा दिन

लखनऊ, 24 जुलाई। देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे जनवादी व नागरिक अधिकार संगठनों, न्यायविदों, जनाधिकारों के समर्थक बुद्धिजीवियों, लेखकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को जनवादी अधिकारों पर एक सशक्त साझा आन्दोलन खड़ा करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना होगा। तीसरी अरविन्द स्मृति संगोष्ठी के अन्तिम दिन आज यह आम सहमति उभरकर आयी।
आज संगोष्ठी में चार आलेख प्रस्तुत किये गये तथा उनपर चर्चा हुई। पहला सत्र श्रीलंका, नेपाल, तथा दक्षिण एशिया पर केन्द्रीत था। श्रीलंका के पेरादेनिया विश्वविद्यालय के प्रो. कलिंग ट्यूडर सिल्वा ने ‘श्रीलंका में जातीय अल्पसंख्यकों के जनवादी अधिकारों का उतार-चढ़ाव - दक्षिण एशिया के लिए सबक’ शीर्षक अपने आलेख में कहा कि उनके देश का अनुभव बताता है कि अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए संघर्ष पूरे समाज के व्यापक मुद्दों से जोड़कर ही सफल हो सकता है। राजपक्षे सरकार द्वारा लिट्टे को कुचलने के बाद वहां तमिलों के बर्बर दमन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज श्रीलंका में तमिलों के जनवादी अधिकारों का सवाल एकदम पीछे धकेल दिया गया है। प्रो. सिल्वा ने कहा कि श्रीलंका का अनुभव भी यही सिद्ध करता है कि सिविल सोसायटी के संगठन जब तक व्यापक जनता से अपने को नहीं जोड़ेंगे तब तकउनकी आवाज भी निष्प्रभावी रहेगी।
नेपाल के प्रमुख जनवादी अधिकारकर्मी डाॅ. महेश मास्के ने अपने आलेख में नेपाल के जनवादी आन्दोलन की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में चर्चा करते हुए कहा कि नेपाल आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। भविष्य का नेपाल कैसा हो इसके लिए पूंजीवादी शक्तियों, राजतन्त्र समर्थकों और जनता के हितों की पक्षधर शक्तियों के बीच संघर्ष जारी है। संविधान निर्माण में हो रहे विलम्ब का भी यही कारण है।
न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने श्रीलंका और नेपाल के साथ अपने लम्बे रिश्तों की चर्चा करते हुए कहा कि वे श्रीलंका की शान्ति प्रक्रिया के सिलसिले में दो बार वहां जा चुके हैं। उन्होंने श्रीलंका सरकार द्वारा तमिलों के दमन की तीखी निन्दा की और कहा कि तमिल इलाकों में मानवाधिकारों के हनन की जांच के लिए संयुक्त राष्ट्र के दल को वहां जाने की इजाजत न देकर श्रीलंका सरकार अन्तरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रही है। उन्होंने नेपाल में नये संविधान के निर्माण में हो रहे विलम्ब को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए सभी पक्षों से इसके लिए मिलकर काम करने की अपील की।
आन्ध्र प्रदेश पीयूसीएल की अध्यक्ष जया विन्धला ने अपने आलेख में भारत में जनवादी अधिकार आन्दोलन के इतिहास, इसकी उपलब्धियों और समस्याओं की चर्चा करने पर बल दिया।
पंजाब से डाॅ. अमृतपाल ने अपने आलेखमें स्वास्थ्य को एक बुनियादी जनवादी अधिकार का दर्जा देने की बात की। उन्होंने विस्तृत ब्योरों और आंकड़ों के जरिए बताया कि भारत की आम आबादी को स्वास्थ्य जैसा मूलभूत अधिकार भी हासिल नहीं हो सका है। आज स्वास्थ्य को बाजार की शक्तियों के हवाले कर रहा-सहा अधिकार भी छीना जा रहा है। उन्होंने कहा कि जनवादी अधिकार आन्दोलन को स्वास्थ्य के सवाल पर जनता को जागरूक और संगठित कर सरकार पर दबाव बनाना होगा।
पीयूडीआर के परमजीत ने कहा कि नेपाल में हो रही घटनाओं पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। उन्होंने भारत के राजदूत द्वारा नेपाल के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप की भी निन्दा की।
आज की चर्चा में यह बात उभरकर आयी कि जनवादी अधिकार आन्दोलन को व्यापक सामाजिक आधार वाले जनान्दोलन के रूप में संगठित करना होगा और व्यापक जनता के बुनियादी जनवादी अधिकारों को इसके संघर्ष के एजेण्डा पर लाना होगा, दूसरे राज्यसत्ता के अतिरिक्त जनता के जनवादी अधिकारों का अपहरण करने वाली सामाजिक संस्थाओं-मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध व्यापक जन जागरूकता मुहिम चलाना भी जनवादी अधिकार आन्दोलन का कार्यभार होना चाहिए और तीसरे राजयसत्ता के बढ़ते दमनकारी रुख के प्रभावी प्रतिकार के लिए जनवादी अधिकार आन्दोलन की बिखरी हुई ताकत को राष्ट्रव्यापी स्तर पर एकजुट करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आज देश में जो जनवादी अधिकार संगठन मौजूद हैं, उनका न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर एक संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रस्ताब रखा गया।

संगोष्ठी में देश में लागू विभिन्न काले कानूनों पर विस्तृत चर्चा के बाद यह मांग भी रखी गयी कि राजद्रोह के औपनिवेशिक कानून (आई. पी. सी. की धारा 24ए) को पूरी तरह से रद्द किया जाना चाहिए तथा ए.एफ.एस.पी.ए. जैसे बर्बर निरंकुश कानून को न केवल उत्तर पूर्व एवं जम्मू-कश्मीर से तत्काल हटाया जाना चाहिए, बल्कि इसी प्रकार के हर ऐसे काले कानून को रद्द किया जाना चाहिए जो सेना या अर्द्धसैनिक बलों को आम नागरिकों की आजादी एवं जनवादी अधिकारों को कुचलने की छूट देता हो। गोष्ठी में यह मांग भी उठी कि क्रान्तिकारी सत्ता परिवर्तन में विश्वास के साथ राज्य के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ने वालों को किसी आपराधिक धारा के तहत अभियुक्त बनाने के बजाय युद्धबन्दी का दर्जा मिलना चाहिए और उनके सन्दर्भ में तत्सम्बन्धी अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन के प्रावधानों का अनुपालन होना चाहिए।
आज की संगोष्ठी के अन्तिम सत्र की अध्यक्षता महाराष्ट्र से आये शिरिष मेढ़ी, ‘अनीक’ पत्रिका के सम्पादक दीपांकर चक्रवर्ती व आन्ध्र प्रदेश पी.यू.सी.एल. के इकबाल खान ने किया। संचालन सत्यम ने किया।
तीन दिन तक चली इस चर्चाओं के दौरान असहमति एवं विवाद के मुद्दों पर ‘आह्वान’ के सम्पादक अभिनव, पीयूसीएल के उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह, दिल्ली मेट्रो कामगार यूनियन के प्रेम प्रकाश, आन्ध्र प्रदेश पीयूसीएल के महासचिव डी. प्रकाश, मुम्बई के बुद्धिजीवी हर्ष ठाकुर, विभिन्न जनसंगठनों से जुड़े तपिश, सन्नी, प्रशान्त, राजकुमार आदि ने भाग लिया।
संगोष्ठी समापन के बाद ‘विहान’ की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसमें दुनिया भर में चल रहे दमन के विरुद्ध गाये जाने वाले गीतों की प्रस्तुति हुईं।