संघ इन सातों बहनों को अपनी सियासी बहू बनाना चाहता है। संघ को पहाड़ भी चाहिए और यूपी बिहार भी चाहिए

पिछले दिनों संघ-प्रसूत प्रयोजनों और आयोजनों में मैं अनामंत्रित मेहमान था। स्थान था दिल्ली के वी पी हाउस का प्रांगण ! दो दिनों तक चले इस जलसे में भागवत, सिंघल, आडवाणी, जोशी सब उपस्थित रहे।

हाँ ! तोगड़िया को अवश्य खोजता रहा। उन्हें ही सुनने की इच्छा थी। तोगड़िया संघ की एक साधना है। एक शिखर है।

संघ की वैचारिक प्रक्रिया के निष्पत्ति हैं 'प्रवीण'। मैं एक ही बार इस शिखर की यात्रा कर सभा से लौट आना चाहता था। भागवत और सिंघल के उत्सवी-बौद्धिक से काम चलाना पड़ा।

अमूमन सार्वजनिक मंच पर सरसंघचालक जैसे लोग कम ही मुस्कुराते हैं। बहुत ही गंभीर होते हैं। एक एलियेंस की तरह पिकुलियर ? उस दिन परंपरा तोड़कर भागवत हंसते और हंसाते नजर आये। आडवाणी को बोलने से भी मनाही रही। उस दिन आडवाणी को छोड़ सब बोले।

सभा शिखर पर थी। वक्ताओं के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। भारत-विजय का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जश्न था। गोरॆ-नारे, खाए-पीये-अघाये चेहरे ही चेहरे थे! शकल से भी दीन और दलित जैसा मेरा एकलौता चेहरा उन शुभ्र-जनों के बीच कंट्रास्ट पैदा कर रहा था।

झारखण्ड और कश्मीर की जीत का नशा था। झारखण्ड को आदिवासी से खाली करा लिया गया है। भाजपा के अपने बनाये ये रघुवीर ! जंगल में मंगल ! झारखण्ड में होली खेलत रघुवीरा !! सभा में वाह वाह थी !! मोदी जी सा... रा ..रा ..रा !!!

उधर आसाम के आदिवासी जिन्दगी से बेदखल हो रहे थे। आदिवासी और हिन्दु-आदिवासी के बीच हो रहे और होने वाले संघर्ष के सिद्धान्तकारों के उस सभा के बीच मैं बैठा था।

किसी भी सभासद के चेहरे पर आसाम की घटना का दर्द नहीं था। जुबाँ पर उन मासूमों की मौत के लिए कोई शब्द नहीं था। इनके ही नाती फडणबीस के महाराष्ट्र में राष्ट्र के किसानों की मौत की सूचना भी मुट्ठी में ही थी।

किसानों की क्षय हो ! आदिवासियों की क्षय हो !! के नारे की आहट साफ़ सुनायी दे रही थी।

ह्रदय सिसक रहा था। आसाम की घटना को लेकर सभा में कोई आक्रोश अभिव्यक्त ना हो जाय इस कारण मैं सभागार से बाहर आ गया। मैंने वन्दे-मातरम् भी नहीं गाया। निर्जीव राष्ट्र की वंदना के मायने।

आतंकियों ने सौ के करीब आदिवासियों को मौत दे दी। वन- बालकों की जिन्दगी इस तरह लुट गयी जिस तरह इनकी वनोपज लूट ली जाती रही है। यह खबर सोशल मीडिया पर कुछ सुधिजन पोस्ट करते रहे। इस जघन्य हत्या पर उबलते रहे।

वी पी हाउस से ठिठुरते हुए जंतर-मंतर की ओर आया। उन आदिवासियों की मौत पर कोई मोमबत्तियां नहीं जलती दिखी। अमूमन कुछ मोमवत्तीधारी जीव पहले से ही मोमवाती तैयार रखते हैं। किसी घटना की वाट जोहते हैं । कुछ हुआ कि निकल लिए। पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। दामिनी की दुकान प़र ही कुछ मोमबत्तियां शेष थीं। जंतर-मंतर से कैंडिल-मार्चवादियों का गिरोह गायब था। वैसे मार्क्सवादी तो पहले से गायब रहे हैं?

पेशावर की घटना पर देश परेशान था। उम्मीद थी कि इन आदिवासियों की चीख-पुकार पर देश जागेगा और घर से बाहर निकलेगा।

मीडिया ने रोने का मौका नहीं दिया। मीडिया के बिना मोमबत्ती-मार्च के क्या मायने। कैमरे के सामने आंसू भी ठीक से बहते हैं ? मीडिया ने नंग - धड़ंग तस्वीर और आदिवासियों की तकदीर पर कैमरा घुमाना मुनासिब नहीं समझा।

पूर्वांचल की सातों बहनों पर संघ की निगाह पहले से ही पड़ी है। असंख्य संघ प्रचारक वहां शाखा-2 खेल रहे हैं। संघ इन सातों बहनों को अपनी सियासी बहू बनाना चाहता है। संघ को पहाड़ भी चाहिए और यूपी बिहार भी चाहिए।

गुजरात में भी यही हुआ था। मंडल कमीशन के आने के बाद संघ के लिए पिछड़ा वर्ग टारगेट पर था। दंगा का नेतृत्व इन्हें ही करने दिया। भागलपुर के बाद यह प्रयोग एक दशक तक चला।

गुजरात में आदिवासियों और मुसलमानों को आमने सामने कर दिया। झारखण्ड में सारे आदिवासी आपस में लड़ गए। इनकी सियासी मौत आज हमारे सामने हैं। सलवा-जुडूम की कहानी हम सब जानते हैं कि किस तरह शिवराज और रमण की सरकार चल रही है। किस तरह खनिजों की कार्पोरेट लूट जारी है।

अपनी आजादी, इज्जत और अपने राष्ट्र के लिए हूल-विद्रोह, संथाल-विद्रोह, पहाड़िया-विद्रोह और नागा-विद्रोह किया था। आज के कथित राष्ट्रवादी जब अंग्रेजों की दलाली कर राय, बहादुर, सिंधिया और चौधरी का तमगा लेने में लगे थे उस वक्त आदिवासी तमगा के बदले तीर-धनुष लिए लड़-मर रहे थे।

आदिवासी अभिशप्त हो गए हैं मरने के लिए। कल भी मर रहे थे और आज भे मर रहे हैं। आजादी के बाद तो ज्यादा ही मौतें हुयी।

हमें वंचित आदिवासियों की इज्जत अस्मिता और सम्पदा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध प्रतिकार की तरफ बढ़ना चाहिए।

( ...आदिवासियों को जीने का अधिकार मिले। पर जंगल और जिन्दगी से बेदखल करने का सिलसिला शरू हो गया है। समय रहते हम सावधान हो जाएं। इस लेख में मैंने उस संघ-सभा के भाव-भंगिमा की चर्चा की है। दूसरे भाग का इंतजार करें )
O- बाबा विजयेंद्र
बाबा विजयेंद्र, लेखक स्वराज्य खबर के संपादक हैं।