जरा मुस्कुरा ‘दो’, आखिर सरकार भी तो यही चाहती है न...
जरा मुस्कुरा ‘दो’, आखिर सरकार भी तो यही चाहती है न...
लोकेश मालती प्रकाश
मोदी सरकार अर्थात केन्द्र सरकार के दो साल पूरे होने को आए हैं। इस मौके पर सरकार आठ घंटे के ‘टॉक शो’ (दूसरे शब्दों में आठ घंटे की बकैती) के कार्यक्रम की योजना बना रही है जिसका नाम दिया गया है "जरा मुस्कुरा दो"।
कितना अच्छा लगता है ये सुनकर कि कोई किसी को मुस्कुराने के लिए कह रहा है। लेकिन यहां मामला दो लोगों के बीच का तो नहीं है। यहां तो सरकार जनता को मुस्कुराने के लिए कह रही है। इसलिए शंका उत्पन्न होती है।
क्या सरकार को लग रहा है कि देश की जनता ने मुस्कुराना छोड़ दिया है?
अगर नहीं तो फिर क्यों लोगों को मुस्कुराने को कहा जा रहा है? किसी को भी वही चीज करने को कही जाती है जो वह न कर रहा हो। अगर लोग प्रसन्नता में डूबे मुस्कुरा रहे होते तो उन्हें कहने की जरूरत ही नहीं होती कि ‘जरा मुस्कुरा दो’।
इतना तो साफ है कि लोग प्रसन्न नहीं हैं, मुस्कुरा नहीं रहे हैं।
सरकार ने भी ये मान लिया है। लेकिन सरकार क्या ये भी सोच रही है कि ऐसी नौबत आखिर आई ही क्यों?
जहां तक मेरा मत है जनता की आधी मुस्कुराहट तो भाजपा अध्यक्ष ने पिछले साल ये कह छीन लिया था कि विदेशों जमा काला धन लाकर हर व्यक्ति के खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपया डालने का जो ‘वादा’ पार्टी ने आम चुनावों में किया था वो तो बस एक राजनीतिक ‘जुमला’ था। किसी को कुछ नहीं मिलना! लोगों की मुस्कान तभी फीकी पड़ गई। बाकी की मुस्कुराहट दाल की महंगाई में चली गई।
अगर लोगों ने इन दो सालों में मुस्कुराना सचमुच छोड़ दिया जैसा कि मोदी सरकार के इस नए विज्ञापन से लगता है तो इसके ठोस कारण भी होंगे ही। क्या कारण हो सकते हैं ये विचार करने की जिम्मेदारी मैं सुधि पाठकों पर छोड़ता हूं।
यह प्रसंग छिड़ ही गया है तो एक पुरानी फ़िल्मी नज़्म याद आती हैः "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो/ क्या ग़म है जिसको छिपा रहे हो " … लेकिन यहां तो जनता मुस्कुरा नहीं रही है। बल्कि लोगों ने अपने ग़मों को छिपाने की बजाय इतना हल्ला मचा दिया है कि सरकार घबराई लग रही है। पिछले साल इसी चक्कर में नया भूमि अधिग्रहण कानून नहीं लागू हो पाया। फिर विश्वविद्यालयों व उच्च शिक्षा संस्थानों में सरकार ने जो घुसपैठ शुरू की है तो उसका भी जमकर विरोध हो रहा है। हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या दिल्ली का जेएनयू, विद्यार्थी अपना ग़म छुपा कर मुस्कुराने का काम नहीं कर रहे हैं। यह हाल कमोबेश हर तरफ है। लोग गुस्से में तमतमा रहे हैं, सरकार पर सवाल उठा रहे हैं और लूट-खसोट की नीतियों को ढंग से लागू नहीं होने दे रहे हैं। इसीलिए सरकार लोगों से अपने दो साल पूरे होने पर अपील कर रही है कि "जरा मुस्कुरा दो"। शायद सरकार उम्मीद कर रही है कि उसके जन्मदिन के अवसर पर लोग उपहार स्वरूप अपने गिले-शिकवे छोड़कर मुस्कुराने लगेंगे।
वैसे "जरा मुस्कुरा दो" के इस अभियान में एक विरोधाभास भी प्रतीत हो रहा है।
इस सरकार के इन दो सालों के रेकार्ड को देखते हुए पूरी उम्मीद है कि ये अपने पांच साल खत्म होते-होते एक नया कीर्तिमान बनाएगी। ये कीर्तिमान होगा जनता के बीच सर्वाधिक हंसी की पात्र बनी सरकार का। मोदी जी के बारे में जितने चुटकुले खासकर इंटरनेट/सोशल मीडिया पर आ चुके हैं उतने शायद ही किसी और प्रधानमंत्री के लिए बने हों और बने भी होंगे तो शायद ही इतने लोकप्रिय हुए होंगे। होंगे भी कैसे? हालांकि प्रधानमंत्री जी देश में कम ही दिखते हैं मगर जब दिखते हैं तो कभी प्राचीन भारत में ‘प्लास्टिक सर्जरी’ की खोज कर लेते हैं और कभी इन्हें केरल में सोमालिया के दर्शन हो जाते हैं। ऐसा ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ शायद ही किसी और प्रधानमंत्री में रहा हो।
इस एंगल से देखें तो लोग तो सरकार की ऊटपटांग हरकतों की खूब हंसी उड़ा रहे हैं तमाम मुसीबतों के बावजूद। जनता की ये जिजीविषा ही आज़ाद देश की एकमात्र उपलब्धि है - खस्ताहाली में भी खुलकर हंसने की हिम्मत रखना। लोग सरकार पर खुलकर हंस रहे हैं - बेधड़क मजाक उड़ा रहे हैं।
अब सवाल ये उठता है कि अगर लोग सरकार के मजे लेने के लिए ही सही मगर चटखारे लेकर हंस रहे हैं तो सरकार "जरा मुस्कुरा दो" की गुज़ारिश क्यों कर रही है भला? इस बारे में कुछ अनुमान ही लगाए जा सकते हैं। शायद ये अपील सरकार अपने उन भूतपूर्व उत्साही समर्थकों से कर रही है जो दो साल पहले दुनिया फ़तह कर लेने के मूड में थे लेकिन सरकार की रीति-नीति ने इनके होश फ़ाख़्ता कर दिए हैं। हो सकता है इन भूतपूर्व नादानों के चेहरे से जो मुस्कान इन दो सालों में गायब हुई है उसे ही वापस लाने के लिए सरकार अपील कर रही है "जरा मुस्कुरा दो"।
पुनश्चः गुजरात विश्वविद्यालय को मोदी जी की राजनीतिक प्रतिभा का ज्ञान पहले ही हो गया था इसीलिए विश्वविद्यालय ने उन्हें “संपूर्ण राजनीति विज्ञान” में एम. ए. की डिग्री दी। सामान्य मनुष्यों को सिर्फ “राजनीति विज्ञान” की डिग्री मिलती है। या कहीं ऐसा तो नहीं कि ये डिग्री इसलिए दी गई थी कि मोदी जी की सरकार के दूसरे साल पूरे होने के अवसर पर इसे देख लोग जरा मुस्कुरा दें! आखिर सरकार भी तो यही चाहती है न।


