जर्मनी का उद्योग और व्यापार जगत मेक इन इंडिया को फ़ेक इन इंडिया के रूप में ही देख रहा है
जर्मनी का उद्योग और व्यापार जगत मेक इन इंडिया को फ़ेक इन इंडिया के रूप में ही देख रहा है
जर्मनी का हनोवर मेला और मेक इन इंडिया
बर्लिन। जर्मनी का हनोवर मेला शायद विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक मेला है. आज जब ज़्यादातर व्यापार और आर्थिक सहयोग लॉबी व इंटरनेट के जगत से प्रभावित है, इस मेले की अहमियत एक पतनोन्मुख ज़मींदार परिवार की पारंपरिक वार्षिक दुर्गापूजा की तरह हो गई है. अब भी चल रही है, काफ़ी लोग आ जाते हैं, धूमधाम पहले की तरह नहीं है, लेकिन रवायत निभाई जाती है. उनमें से एक है हर साल मेले का एक सहयोगी देश चुनना. सन् 2006 के बाद इस साल फिर भारत सहयोगी देश है. यानी जर्मन चांसलर आंगेला मैर्केल के साथ भारत के प्रधान मंत्री मेले का उद्घाटन करेंगे.
होना भी चाहिये. आख़िर जर्मनी यूरोप में भारत का सबसे बड़ा आर्थिक साझेदार है. लेकिन जर्मनी के आर्थिक साझेदारों की तालिका में भारत का स्थान 25वें पायदान पर है. पिछले दस साल में दोनों देशों के बीच व्यापार में तीन गुने की वृद्धि हुई थी, लेकिन चार सालों से व्यापार घटता जा रहा है. मेले के उद्घाटन के तामझाम के ज़रिये यह तथ्य छिपाया नहीं जा सकता कि जर्मनी की दीदीगिरी की महत्वाकांक्षा यूरोप में है. उसके बाद अमरीका और चीन का नंबर है. भारत के प्रधान मंत्री जर्मनी के ख़ुशमस्त मौसम में तीन दिन रहेंगे. उसके बाद भी साल के 362 दिन बचेंगे.
कुछ व्यापार होगा. अभी तक फ़्रांस की तरह किसी बड़े सौदे की ख़बर नहीं आई है, शायद आएगी. एअरबस को भारत में उत्पादन में दिलचस्पी है, आख़िर वहां पगार कम हैं. लेकिन क्या इस एक सौदे के बल पर मेक इन इंडिया का परचम लहराया जा सकेगा ? मोटे तौर पर जर्मनी का उद्योग और व्यापार जगत इसे फ़ेक इन इंडिया के रूप में ही देख रहा है.
कभी राजनीति के ज़रिये व्यापार बेचा जाता है, तो कभी व्यापार के बल पर राजनीति बिकती है. मैर्केल के साथ मोदी जी की तस्वीर का एक राजनीतिक महत्व ज़रूर है, लेकिन जर्मनी और यूरोप में कितने अखबारों में उसे छापा जाएगा ? राजनयिक शिष्टाचार में कोई कमी नहीं रखी जाएगी, लेकिन तस्वीरों में एक सरकार प्रधान के चेहरे पर अगर खिसियाती मुस्कान होगी तो दूसरे के चेहरे पर (बनावटी) शिकन छिपाये नहीं छिपेगी. आख़िर मोहतरमा को अपने देश के उदारवादी जनमत का ख़्याल रखना पड़ेगा. दोनों देश इस यात्रा से फ़ायदा उठाने की कोशिश करेंगे, लेकिन यात्रा समाप्त होने के बाद जर्मनी के सरकारी हलकों में राहत की सांस ली जायगी. वैसे भी आर्थिक संबंधों के क्षितिज पर कोई सुनहरा संकेत नहीं दिख रहा है.
भारतीय मेहमान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन और धरने भी होंगे. नहीं, 2002 की घटनाओं को अब प्रमुखता नहीं दी जाएगी. अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति सहिष्णुता का अभाव और आदिवासियों पर ढाये जा रहे ज़ुल्म इस बार प्रमुख मुद्दे हैंं. इसके अलावा ग्रीन पीस जैसे संगठनों के ख़िलाफ़ छेड़ा गया छोटा-मोटा युद्ध यूरोप के राजनीति सचेतन समुदायों को भारत की लोकतांत्रिक छवि के बारे में कायल नहीं करता है.
विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय नेता का एक प्रमुख एजेंडा मेज़बान देश में आप्रवासी भारतवंशियों को सक्रिय बनाते हुए अपने देश के समाचार साधनों में सिक्का जमाना होता है. अंग्रेज़ीभाषी देशों में यह आसान है. वहां भारतवंशियों की भारी तादाद है, उनकी एक विशिष्ट सामाजिक संरचना है, जो मेज़बान देश के समाज से कटी-कटी रहती है. यूरोप में हालत थोड़ी अलग है, यहां आप्रवासियों की सामुहिक गतिविधियों में मूलनिवासियों की भी अच्छी-ख़ासी शिरकत रहती है. उन्हें इस प्रकार के मीडिया सम्मत नेता की गौरव गाथा के लिये प्रोत्साहित करना कठिन नहीं, लगभग असंभव है. फ़्रांस की यात्रा के दौरान भी इसे देखा जा सका. जहां तक जर्मनी का सवाल है तो बर्लिन में कई बार श्री महोदय अपने तमाशे में चालीस हज़ार लोगों को इकट्ठा कर पाये थे. ऐसा आयोजन इस बार नहीं होने वाला है.
तीन दिनों के लिये भारतीय मीडिया को कुछ न कुछ खुराक मिलता रहेगा. जर्मनों के लिये यह खुराक काफ़ी नहीं है. सच पूछिये तो इसमें उनकी ख़ास दिलचस्पी भी नहीं है.
बर्लिन से हस्तक्षेप के लिए उज्ज्वल भट्टाचार्या की खास रपट


