विकेन्द्रीकृत शासन के लिये देश में किये गये प्रयास
कन्हैया झा
भारत में सदिओं से पंचायतों ने ही स्वायत्त ग्राम इकाईयों द्वारा पूरे देश का शासन चलाया था। ये पंचायतें गाँव वाले स्वयं ही बिना किसी चुनाव के बना लेते थे। गांधीजी ने केन्द्रीकृत (Centralized) ब्रिटिश संसद प्रणाली को एक "बिना आत्मा की मशीन" कहा था। आज़ादी के पहले की कांग्रेस सरकारों के अनुभव से उनका यह निश्चित मत बना था की सत्ता के केन्द्रीकरण से भ्रष्टाचार बढ़ेगा। इसलिये उन्होंने स्वायत्त ग्राम इकाईयों के आधार पर विकेन्द्रीकृत (Decentralized) शासन तंत्र स्थापित करने की बात कही थी।
संविधान के पार्ट IV में पंचायतों की भूमिका गांधीजी के "ग्राम स्वराज" से भिन्न रखी गयी। डाक्टर अम्बेडकर के अनुसार गाँवों के जाति-पांति आदि आधारों पर बंटे होने के कारण पंचायतें स्वराज के लिये सक्षम नहीं थीं। सन् 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद् ने बलवंत राय मेहता कमेटी की सिफारिशों को मानकर त्रि-स्तरीय पंचायती राज्य संस्था के गठन को स्वीकृति दी। शासन के इस तीसरे स्तर पर सबसे नीचे गाँवों में ग्राम-पंचायत तथा नगरों में नगरपालिकाएं एवम् वार्ड्स रखे गये। मध्य स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र के लिये ग्राम-समितियां तथा शहरों में नगर निगम अथवा नगर पंचायत को बनाना था। पंचायती राज्य संस्था के शीर्ष पर जिला परिषद् बनाने का प्रावधान था। यह पूरी पंचायती राज संस्था (PRI) राज्य सरकार के नियंत्रण में रखी गयी।
सन् 1993 में 73 तथा 74 वें संविधान संशोधन से चुनाव द्वारा पंचायतों के गठन को अनिवार्य किया गया। इस क़ानून में उन्हें विकास तथा सामजिक न्याय के लिये सत्ता एवम् जिम्मेवारी देने का प्रावधान था। इसके अलावा संविधान के 11 वें शिडयूल में दिये गये 29 विषयों के क्रियान्वन की जिम्मेवारी भी उन्हें दी गयी परन्तु पंचायतों के अधिकारों का मामला राज्य सरकारों पर ही छोड़ दिया गया। देश के 15 राज्यों में किये गये एक अध्ययन (EPW: July 5,2003) के अनुसार राज्यों द्वारा पंचायतों को जिम्मेवारियां तो दी गयीं परंतु सत्ता का उचित हस्तांतरण नहीं किया गया है।
शहरों में भी आज़ादी के समय से आज तक ब्रिटिश शासन से विरासत में मिला केन्द्र-राज्य-नगरपालिका ढांचा ही चल रहा है। राज्य सरकारें वो ही नीतियाँ चला रही जो ब्रिटिश सरकार चलाती थी। नगरपालिकाओं के चुनाव होते हैं, मेयर का भी चुनाव होता है, सत्ता राज्य सरकार के अधीन एक प्रशासनिक अधिकारी कमिश्नर के हाथ में रहती है। जनता के प्रति जबाब देही से बचने के लिये ब्रिटिश सरकारें ट्रस्ट आदि बनाती थीं, जिन्हें भूमि अधिग्रहण क़ानून 1894 के अंतर्गत किसी भी मजदूर बस्ती (slums) को उजाड़ने का अधिकार होता था। आज राज्य सरकारें भूमि विकास, पानी की सप्लाई एवम् निकासी, औद्योगिक क्षेत्र, विशिष्ट निर्यात सेज (SEZs) आदि अनेक विषयों के लिये नए संस्थान बना कर प्रशासनिक अधिकारी कमिश्नर आदि के नियंत्रण में रखती हैं, जिनकी नगर पालिका में चुने हुये प्रतिनिधिओं के प्रति कोई जिम्मेवारी नही होती।
केन्द्रीकरण की जो प्रक्रिया राज्य स्तर पर है वही केन्द्र स्तर पर भी आज़ादी के समय से ही चल रही है। सन 1991 में नव-उदारवाद अपनाने के बाद तो इसमें और गति आयी। केन्द्र से राज्यों को उनके बजट में सहयोग एक फार्मूले के तहत मिलता है। इस राशि में केन्द्र की अपनी महत्वपूर्ण (Flagship) योजनाओं का भी पैसा होता है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में यह राशि बढ़ते-बढ़ते कुल बजट सहयोग के 42 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। केन्द्रीकरण राष्ट्रीय विकास परिषद् में भी केन्द्र एवम् राज्यों के बीच टकराव का विषय बना रहा है। फिर सरकार द्वारा गठित अनेक कमीशनों ने भी इस विषय पर अपनी चिंता व्यक्त की है।
विकास के कुछ प्रतिमान
1930 के दशक में पश्चिमी राष्ट्रों में मंदी का दौर था। सामान्य उपयोग की वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे थे। ऐसे में विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कीन्स ने आने वाली पीढ़ियों के बारे में सोचकर यह कहा कि वह दिन दूर नहीं जब सभी अमीर होंगे। और जब सब अमीर हो जायेंगे तो अमीर-गरीब का झगड़ा भी ख़त्म होगा और सब जगह शान्ति हो जायेगी। उनका यह विश्वास उत्पादन तंत्र की शक्ति पर आधारित था। इसके लिये त्याग, चरित्र आदि भली चीज़ों की कोई आवश्यकता नहीं होगी। बल्कि लालच, ईर्ष्या, सूदखोरी पर आधारित उत्पादन तंत्र उपभोग की सभी वस्तुएं प्रचुर मात्रा में और सस्ते दामों में उपलब्ध कराएगा। कीन्स की थीसिस के 80 वर्ष पश्चात भी सभी के अमीर होने की कोई सम्भावना नज़र नहीं आती।
सन 1993 विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शूमाखर ने अपनी थीसिस Small is Beautiful में विकास के लिये आवश्यक तीन पूंजियों की चर्चा की जो पृथ्वी पर केवल सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं। ये पूँजियाँ हैं खनिज ईंधन, प्राणियों की प्रदूषण सहन करने की क्षमता तथा मनुष्य का स्वयं का सत्व। आधुनिक उत्पादन तंत्र इस तीनों को पूंजी न मानकर आय मानता है और भविष्य की चिंता न करते हुये लगातार उनका उपभोग कर रहा है। शुमाखर ने एक नए उत्पादन तंत्र की कल्पना दी जिसमें बड़ी पूँजी एवम् बड़ी योजनाओं के स्थान पर छोटी पूँजी तथा छोटी योजनाओं को अपनाने की सलाह दी। बिजली उत्पादन, सिंचाई आदि के लिये उन्होंने बड़े बांधों की जगह छोटी परियोजनाओं के निर्माण पर बल दिया। घरेलू उपयोग की वस्तुओं का उत्पादन एवम् उपभोग स्थानीय स्तर पर सीमित कर माल की ढुलाई को कम किया जाये। उन्होंने सिद्ध किया कि इस प्रकार के विकेन्द्रित विकास से उपरोक्त तीनों पूंजियों का कुछ हद तक संरक्षण हो सकेगा।
जल्दी से अमीर बनने के लोभ में लगभग सभी राष्ट्रों ने पश्चिमी देशों द्वारा सुझाये गये नव-उदारवाद को चुना। उत्पादन तंत्र की विनाशकारी गति को खनिज ईंधन के उपयोग के आंकड़ों से ही सिद्ध किया जा सकता है। सत्तर के दशक में विश्व में प्रतिवर्ष 700 करोड़ टन कोयले के बराबर ईंधन का उपयोग होता था जो लगभग 30 वर्ष में अर्थात् सन् 2000 में तिगुना होकर 2100 करोड़ टन कोयले के बराबर हो गया और सन 2030 तक यह फिर तिगुना हो कर 6300 करोड़ टन प्रतिवर्ष हो जायेगा।
पिछले दो दशकों के नव-उदारवाद (Neo Liberalism) ने विकासशील देशों को लगभग उपनिवेश ही बना ही दिया है। उपनिवेश पूंजीपतियों के लिये कई महत्वपूर्ण संसाधन जैसे कि सस्ते मजदूर, जमीन, जंगल, आदि उपलब्ध कराते थे। साथ ही पूंजी के लिये निवेश तथा "बहु संख्या उत्पादन" अर्थात mass production के लिये बाज़ार भी उपलब्ध कराते थे। आज पश्चिमी देश मनचाहा लाभ कमाने के लिये बड़ी पूंजी से पूरे विश्व के बाज़ार पर अपना वर्चस्व बनाने में लगे है। साथ चीन आदि कुछ देशों में वहाँ के सस्ते मजदूरों का उपयोग कर घरेलु उपयोग की वस्तुओं का mass scale पर उत्पादन कर पूरे विश्व में बेच रहे हैं।
जनता का शासन
उपरोक्त वैश्विक सन्दर्भ में भविष्य को ध्यान में रखते हुये उपरोक्त तीनों पूंजियों के संरक्षण के लिये जनता को भी कुछ अधिक जिम्मेवारी ले सरकार की सहायता करनी होगी। जनता वोट देकर राज्यों तथा केन्द्र में सरकार बनाती है और फिर अगले चुनावों तक उसका किसी भी सरकार से कोई संवाद नहीं रहता। सरकारें अपने हिसाब से विकास की प्राथमिकताएं तय करती, वार्षिक बजट में उनके लिये धन निश्चित करती हैं और राजस्व के लिये नए टैक्स लगाती हैं। यद्यपि सरकार के सभी खर्चों का नियमित रूप से प्रशासनिक लेखा-जोखा अर्थात् audit होता है, इसके बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है, जिसमें जनता द्वारा चुने हुये प्रतिनिधियों की लिप्तता भी बढ़ती जा रही है।
यह पैसा जनता के विकास के लिये खर्च होता है, इसलिये यह जनता का कर्तव्य बनता है कि वह प्रशासन की उपरोक्त प्रक्रिया पर सतत नियंत्रण रखे। जनता सरकार का चुनाव अवश्य ही पार्टी आधार पर करती है, किन्तु यह आवश्यक है कि प्रशासन पर उपरोक्त नियंत्रण अ-राजनैतिक हो। नियंत्रण के लिये धन अथवा खर्चे की राशि जितनी छोटी होगी उतना ही अच्छा होगा। इस प्रकार देश के विकास के किये ऐसे जन-संचार तंत्र का स्वरुप भी विकेन्द्रीकृत होगा।
संचार के लिये उपयुक्त प्रतिमान
विकेन्द्रीकृत विकास के लिये यह जनता तथा सरकार के बीच संचार की समस्या है। बड़ी एवम् घनी आबादी वाले इस देश में प्रत्येक व्यक्ति सरकार से संवाद करे यह संभव नहीं है। दिल्ली प्रदेश की आबादी लगभग 1.5 करोड़ है। विधानसभा क्षेत्र में भी औसतन 2 लाख लोग रहते हैं। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र कुछ 8 से 10 कालोनियों में बंटा हुआ है। यदि कालोनियों को संवाद के लिये एक यूनिट मानें तो प्रति यूनिट लगभग बीस हज़ार की आबादी बनती है। उसी प्रकार प्रत्येक ग्राम को भी एक यूनिट मानें तो भी अधिक से अधिक इतनी ही आबादी बनेगी। सरकार से संवाद की सुविधा के लिये इन्टरनेट टेक्नोलोजी का उपयोग कर सूचना को कांट-छांट के लिये कालोनी, क्षेत्र तथा प्रदेश के स्तर पर एकत्रित करना होगा।
जनता के सन्देश को सरकार गंभीरता से ले इसके लिये प्रत्येक यूनिट में कुछ निःस्वार्थी एवम् प्रबुद्ध व्यक्तियों का होना जरूरी है जो पहले तो कालोनी के विकास की दीर्घ-कालीन जरूरतों को समझें और फिर आपस में विचार विमर्श कर वार्षिक योजनायें बनाएं। इन्टरनेट के माध्यम से वे कालोनी के अन्य लोगों से अपनी योजनाओं पर राय भी ले सकते हैं। एक कालोनी में एक से अधिक समूह होने से सन्देश की गहनता में बढ़ोतरी ही होगी।
कालोनी के स्तर पर योजनायें बनाने के लिये यूनिटों को सरकार की विकास योजनाओं के बारे में अनेक सूचनाओं की आवश्यकता होगी जिन्हें वे सूचना अधिकार (RTI) के अंतर्गत सरकार से प्राप्त कर सकते हैं। सरकार को भी बजट का विवरण बनाते हुये उसे अधिक विस्तृत बनाना पड़े।
दिल्ली विधानसभा के दिसंबर 2013 के चुनावों में एक नयी पार्टी ने शासन सम्भाला है जिन्होंने घोषणा की है कि वे प्रदेश में जनता का शासन स्थापित करेंगे। पिछले कुछ वर्षों में देश में अनेक घोटाले हुये जिनमें जन-प्रतिनिधियों की भी लिप्तता साबित हुयी। प्रतिक्रिया रूप में लोकपाल बिल के लिये आन्दोलन हुआ, जिसके बिल के तहत लोकपाल को शासन के किसी भी अधिकारी के खिलाफ जनता की शिकायत पर कार्यवाही करने का अधिकार दिया जाना था। इस बिल को केन्द्र सरकार ने पारित कर दिया है। दिल्ली विधानसभा के लिये भी लोकपाल बिल लाने की बात हो रही है। इसी सन्दर्भ में किसी भी जन-प्रतिनिधि को वापिस बुलाने का अधिकार अर्थात Right to Recall की भी बात चल रही है। इस प्रकार दिल्ली क्षेत्र में उपरोक्त शोध के लिये अनुकूल राजनीतिक वातावरण उपलब्ध है। अन्य प्रदेशों के मुकबले राजधानी क्षेत्र होने से जनता में अपने अधिकारों को लेकर सजगता भी अधिक है। तकनीकी दृष्टि से आम जनता में इन्टरनेट का उपयोग भी उचित है।
प्रयोग के लिये प्रदेश के 70 विधानसभा क्षेत्रों में कुछ पर यह प्रयोग हो सकता है। यह प्रयोग ग्रामीण तथा शहरी दोनों स्तरों पर होना आवश्यक है। विधानसभा क्षेत्र की दीर्घकालीन एवम् वार्षिक योजना बनाने के लिये पूरे क्षेत्र की सामाजिक एवम् आर्थिक जानकारी आसानी से एकत्रित की जा सकती है। प्रदेश की विभिन्न योजनाओं एवम् बजट प्रक्रिया को समझ यूनिटों की रचना की जानी चाहिए। सरकार एवम् क्षेत्रों के बीच संवाद के लिये एक वेबसाइट बनायी जा सकती है। इस प्रक्रिया के दौरान प्राप्त हुये अनुभवों से अन्य प्रदेशों के लिये उपयुक्त जन-संचार तंत्र का निर्माण संभव है।
कन्हैया झा, लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता वजनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल में शोधार्थी हैं।