जहां सब कुछ नाम में ही रखा है, तैमूर अली खान मतलब फौलाद सिंह
जहां सब कुछ नाम में ही रखा है, तैमूर अली खान मतलब फौलाद सिंह
जहां सब कुछ नाम में ही रखा है, तैमूर अली खान मतलब फौलाद सिंह
बाल मुकुंद
फिल्म अभिनेता सैफ और करीना ने अपने बेटे का नाम तैमूर रखा है।
तैमूर का मतलब होता है फौलाद का बना हुआ। कोई भी मां बाप अपनी संतान के अत्यंत बलशाली, मेधावी या विश्वविजेता होने की इच्छा रख सकते हैं।
यह स्वाभाविक है। इसीलिए लोग बलवान सिंह, शेर सिंह, मेधा या अजय जैसे नाम रखते हैं। ये नाम अपनी संतान के लिए उनकी कामनाओं की अभिव्यक्ति हैं।
कुछ लोगों को इस नाम पर सख्त आपत्ति है। 1399 में तैमूर ने हिंदुस्तान पर हमला किया था, जो तुगलक वंश के खात्मे का कारण बना। वह समरकंद का शासक था, लालची और क्रूर था और उसने यहां काफी मारकाट की थी।
एतराज की वजह यही है। भला कोई अपने बेटे का नाम वह कैसे रख सकता है, जिस नाम के शख्स ने यहां छह सौ साल पहले नरसंहार किया हो। इस नामकरण के लिए सैफ और करीना को ट्विटर और फेसबुक पर काफी गालियां पड़ रही हैं। उन्हें राष्ट्रविरोधी भी कहा जा रहा है।
पिछले हफ्ते लगातार दो दिनों तक सोशल मीडिया पर यही मुद्दा छाया रहा था।
जो लोग इस नाम के लिए सैफ और करीना को गालियां दे रहे हैं, उन्होंने शायद इतिहास नहीं पढ़ा हो। पढ़ा होता तो उन्हें अशोक महान का नाम भी जरूर याद होता, जिसके साथ कलिंग का नरसंहार जुड़ा हुआ है। इसमें राज्य विस्तार की आकांक्षा रखने वाले यहां के और भी कई राजाओं के नाम जोड़े जा सकते हैं।
पहले के सभी राजा यही करते थे। वैसे आज भी युद्ध में नरसंहार ही होता है।
जब कोई पिता अपने बेटे का नाम इंद्र या देवेंद्र रखता है, तो उसके किस अर्थ की वजह से रखता है? इसलिए कि वह देवताओं के राजा थे या इसलिए कि उन्होंने छल से अहिल्या को अपनी काम पिपासा का शिकार बनाया था?
एक ही नाम के कई लोग भी हो सकते हैं, सब के रूप और गुण अलग अलग होंगे, पर किसी एक के लिए उस नाम का पेटेंट तो नहीं हो जाता।
शेक्सपीयर का एक बहुत मशहूर नाटक है, रोमियो और जूलियट। उसमें एक जगह जूलियट, रोमियो को समझाते हुए कहती है, ‘गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, उसकी सुगंध तो वही रहेगी। नाम में क्या रखा है।’
जूलियट का यह संवाद इतना मशहूर हुआ कि आज भी जब गलियों और शहरों के नाम बदले जाते हैं, तो लोग यही टिप्पणी करते हैं, नाम में क्या रखा है।
लेकिन शेक्सपीयर का वह संवाद अब शायद बेमानी हो गया है। माहौल बदल गया है। लोग किसी व्यक्ति को उसके गुणों से नहीं, उसके नाम में छुपे किसी राजनीतिक या सांप्रदायिक निहितार्थ में देखना चाहते हैं।
इस लिहाज से लोगों को अपने बच्चों का नाम सिर्फ बबलू, पिंटू, बबली या मुन्नी ही रखना चाहिए। इनका कोई जाति, संप्रदाय नहीं होता। इनका कोई मतलब भी नहीं होता।
मेरे पिता केंद्र सरकार के कर्मचारी थे। उनके एक सहकर्मी का नाम हिटलर था। तब ऐसे नामों पर किसी को एतराज नहीं हुआ करता था।
जो लोग इतने पढ़े लिखे हैं कि फेस बुक पर अपनी टिप्पणियां लिख सकें और इतने संपन्न हैं कि ट्विट करने के लिए स्मार्ट फोन रख सकें, उन्हें कभी समाज के उस हिस्से को भी अपने ज्ञान से शिक्षित करना चाहिए, जहां आज भी झगड़ू, पलटू, डोमन, फेंकू और शनिचरी जैसे नाम रखे जाते हैं। क्या इस पर आश्चर्य नहीं होता कि ऐसे नामों पर यहां कोई फेसबुकिया विद्वान एतराज नहीं करता।
किसी और की जिंदगी का फैसला हम क्यों करना चाहते हैं?
आपको शायद याद हो, अभी बात ज्यादा पुरानी नहीं हुई है, जब पूरे देश में सहिष्णुता को ले कर बहस छिड़ी हुई थी। तब जिन लोगों ने कहा था कि समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है, उनके प्रति कुछ लोग इतने असहिष्णु हो उठे कि उन्हें देश छोड़ कर जाने का फर्मान सुनाने लगे।
असहिष्णुता और किसे कहते हैं?
क्या हम यह बताना चाहते हैं कि किसी मां बाप अपने बच्चे के प्रति अपने प्यार का इजहार कैसे करना चाहिए?


