मसीहुद्दीन संजरी

ज़ाकिर नायक पर आतंकवाद से सम्बंधित आरोप भारत में आतंक के खिलाफ युद्ध की दिशा को बदल सकता है।
जहां एक तरफ मुसलमानों में ही मसलकी (इस्लाम कें अनुयाइयों के विभिन्न पंथ) मत भिन्नता को लेकर कई लोगों ने ज़ाकिर नायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है तो वहीं साम्प्रदायिक ताकतें खुल कर मैदान में आ गई हैं। भारत में साम्प्रदायिक ताकतों और साम्प्रदायिकता का शिकार होने का रोना रोने वालों में इस प्रकार विचित्र एकजुटता देखने को मिलती रहती है और इस तरह साम्प्रदायिकता के शिकार लोग भी कभी-कभी साम्प्रदायिक ताकतों के लाडले बन जाते हैं।
लेकिन ज़ाकिर नायक आलोचनाओं के बावजूद कहीं से भी उनका सम्बंध बंगलादेश में होने वाली आतंकी घटना से साबित होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।

इन सब से अलग ज़ाकिर नायक अंतर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के मालिक हैं और उन पर लगने वाला आरोप भी कम से कम दो देशों के बीच का मामला है।

इस लिहाज़ से आरोपों और उनकी सत्यता पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों की निगाह रहेगी। निश्चित रूप से हमारी जांच एजेंसियां विगत में आतंकवादी घटनाओं और बेगुनाह मुसलमानों की गिरफ्तारी और प्रताड़नाओं को लेकर सवालों के घेरे में रही हैं और कई बार इस पर अदालत की मुहर भी लग चुकी है।
केंद्र की वर्तमान सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि वह हिंदुत्ववादी आतंकियों को बचाना चाहती है और उनकी करतूतों का ठीकरा मुसलमानों के सिर फोड़ना चाहती है। ऐसे में अगर विगत के कई मामलों की तरह ज़ाकिर नायक के मामले में भी आरोप के फर्जी होने या सबूतों के गढ़े हुए होने की बात सामने आती है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से लड़ने की भारत की दावेदारी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इसकी विश्वस्नीयता को भी ठेस पहुंचेगी।

वाह रे सरकार। साम्प्रदायिकता की जय हो
इफ्तेखार गीलानी ने एक लेख में लिखा है कि सन् 2003 में कश्मीर के गवर्नर एस के सिंहा ने ज़ाकिर नायक को अलगावाद के खिलाफ मदद करने के लिए कश्मीर बुलाया था और राजभवन में उनको ठहराया गया था। ज़ाकिर नायक ने अपनी भूमिका निभाई। अब ज़ाकिर नायक को आतंकवादियों का प्रेरणा स्रोत बताया जा रहा है। वाह रे सरकार। साम्प्रदायिकता की जय हो।
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