ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं वो मकाम वो फिर नहीं आते
ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं वो मकाम वो फिर नहीं आते
आज जिनका जन्म दिन है- - पंचम दा
सुनील दत्ता
"नदिया से दरिया- दरिया से सागर- सागर से गहरा जाम- जाम में डूब गयी यारो मेरे जीवन की हर शाम।" आज सात सुरों को नया आयाम देने वाले संगीतकार जिन्होंने संगीत की दुनिया में नये- नये प्रयोग किये हैं, गीत- गजल- उप शास्त्रीय संगीत के साथ आधुनिक संगीत में प्रयोग किया, वो थे हमारे आपके प्रिय राहुल देव बर्मन जी जिन्हें हम सब पंचम दादा कहते थे आज उनका जन्मदिन है।
याद है बारिशो के दिन थे वो पंचम पहाड़ी के नीचे वादी में धुन्ध से झाँककर निकलती हुई रेल की पटरिया गुजरती थीं- धुन्ध में ऐसे लग रहे थे हम जैसे दो पौधे पास बैठे हों- हम बहुत देर पटरियों पर बैठे हुए उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे जिसको आना था पिछले शब लेकिन उसकी आमद का वक्त टलता रहा हम बहुत देर पटरियों पर बैठे हुए ट्रेन का इन्तजार करते रहे। ट्रेन आई न उसका वक्त हुआ और हम यूँ ही दो कदम चलकर धुन्ध पर पाँव रखकर गुम हो गये। मैं अकेला हूँ धुन्ध में पंचम- गुलजार के ये शब्द कागज के उस कैनवास पर एक ऐसा चित्र खींचता है जिसको संगीत के कैनवास पर राहुल देव बर्मन ने खीचा है।
"कतरा- कतरा मिलती है कतरा- कतरा जीने दो ज़िन्दगी है ज़िन्दगी है- बहने दो प्यासी हूँ मैं- प्यासी रहने दो- प्रकृति के सात रंग उस प्रकृति से निकला सात सुर उन सात सुरों से श्रृगारित हुआ संगीत इसको निखारा अनेक उस्तादों ने और स्वर को सजाया तानसेन ने उसी सात सुरों से एक सुर निकला एक संगीत का नायब कोहिनूर- संगीत की दुनिया में पंचम दादा अजेय है। 27 जून 1941 को सचिन देव बर्मन और मीरा देव बर्मन के यहाँ जन्म हुआ राहुल देव बर्मन का। राहुल के पिता सचिन देव बर्मन सगीत के महारथी थे तो उनकी माता मीरा बर्मन स्वंय शास्त्रीय संगीत की हस्ताक्षर थीं। उनका बेटा राहुल बचपन से ही प्रकृति का रसिक थे। उन्होंने प्रकृति के सात सुरों को अपने अन्दर ही आत्मसात कर लिया था। राहुल का नाम पंचम कैसे पड़ा "एक दिन सचिन देव बर्मन किसी धुन पर रियाज कर रहे थे उसी वक्त राहुल के रोने की आवाज आई वो सरगम के पांचवे सुर में रो रहे थे बस उसी दिन से राहुल की माँ ने उनका नाम पंचम रख दिया और राहुल हम सब के पंचम दादा हो गये सबके दुलारे पंचम दादा की शिक्षा दीक्षा कोलकाता के स्कुल सेंट् जेवियर्स में हुई। राहुल ने नौ साल की उम्र में सचिन देव बर्मन को अपने होने का एहसास करा दिया था, एक धुन बनाकर उस धुन को। पंचम ने फिल्म "नमक हराम" में इस गीत पर प्रयोग किया "नदिया से दरिया- दरिया से सागर- सागर से गहरा जाम- जाम में डूब गयी यारो मेरे जीवन की हर शाम।
अपने सिने कैरियर की शुरुआत उन्होंने सचिन देव बर्मन के साथ बतौर सहायक निर्देशक के रूप में किया। फिल्म "चलती का नाम गाड़ी", "कागज के फूल" जैसी सुपरहिट फिल्में यादगार हैं। 1961 में महमूद निर्मित फिल्म "छोटे नवाब" से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उभरे। इस बीच सचिन देव बर्मन के सहायक के तौर पर बन्दिनी "तीन देवियां" और गाइड जैसी फिल्मो में संगीत दिया। अपने वजूद को तलाशते राहुल देव बर्मन ने दस वर्षो तक लम्बा संघर्ष किया और 1966 में फिल्म तीसरी मंजिल के सुपरहिट गीतों ने राहुल देव बर्मन को बुलन्दियों के शिकार पर बिठा दिया। 1972 उनके संगीत जीवन का अहम हिसा है। नमक हराम, आंधी दीवार, खुशबु जैसी कई फिल्मों ने संगीत का जादू बिखेरा। संगीत के साथ प्रयोग करने में माहिर पूरब और पश्चिम के संगीत का प्रयोग सिर्फ पंचम दा ही कर सकते थे इसके लिए उन्हें आलोचना का शिकार भी होना पड़ा। उनको अपनी धुनों के लिए एक ऐसी आवाज की तलाश थी जो उनके संगीत में रच- बस जाए यह आवाज उन्हें आशा जी द्वारा मिला। राहुल ने संगीत से जुड़े गीतों के लिए आशा जी को ही चुना। अगर थोड़ा सा हम पंचम दा के निजी जीवन में झांके तो पता लगता है उनकी पहली शादी रेता पटेल से हुई थी पर यह शादी सफल न हो सकी। लम्बी अवधि कटक एक दूसरे का गीत संगीत में साथ निभाते हुए आशा और पंचम दा एकाकार हो गये। संगीत निर्देशन के अलावा पंचम ने कई फिल्मो में अपने सुर का जादू बिखेरा है। राहुल देव बर्मन ने चार दशकों से भी ज्यादा लम्बे सिने कैरियर में तीन सौ फिल्मों में संगीत दिया। पंचम ने हिंदी फिल्मो के अलावा बांग्ला, तेलगु, तमिल, उड़िया आयर मराठी फिल्मों में भी अपने संगीत के जादू से लोगों को प्रभावित किया। पंचम दा अपने सिने कैरियर में तीन बार फिल्म फेयर एवार्ड "सनम तेरी कसम" मासूम और 1942 ए लव स्टोरी के लिए लिया। पंचम दा जितने अच्छे संगीतकार थे उतने ही मीठे इन्सान भी थे। आज पंचम नहीं है हमारे बीच पर आज भी हमारे दिलों में वो अपने संगीत के जादू को महसूस कराते चले आ रहे है। पंचम यह कहते हुए गुजर जाते हैं, ज़िन्दगी के सफर में गुजर जाते हैं वो मकाम वो फिर नहीं आते।


