ज़िन्दा कौमें पाँच साल इन्तजार नहीं करती....
ज़िन्दा कौमें पाँच साल इन्तजार नहीं करती....
चंचल
59 साल की उम्र में 12 अक्टूबर को डॉ. लोहिया का निधन हुआ। पूरा देश स्तब्द्ध रह गया। वह न किसी ओहदे पर रहा, न ही उसकी चाह थी। आजादी की लड़ाई से निकला एक तपा तपाया सेनानी था और सारे बड़े ओहदेदारों से उसके रसूख रहे। वह गाँधी का चहेता था, नेहरू से दोस्ताना रिश्ते थे लेकिन उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसकी अपनी शख्सियत थी जिसके सामने किसी की टिकने की हिम्मत नहीं थी। यह उसे गाँधी से मिली थी। पूरे देश का जो दबा कुचला, मजबूर मजलूम था वह उसे अपना मानता था। शायद यही वजह थी कि जब डॉ. लोहिया के मरने की खबर फ़ैली तो पूरा देश रो पड़ा। देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी, डॉ. लोहिया को कंधा देने के लिये खड़ी थीं। उनके मंत्रिमण्डल के कई सदस्य डॉ. लोहिया की अन्तिम यात्रा में पैदल चल रहे थे। जेपी रो रहे थे और केवल एक वाक्य बोल पाये थे- 'राम मनोहर मुझसे दो साल छोटा था'। शेख अब्दुल्ला को उनके अनुरोध पर जेल से लाया गया था। जिस समय वे शोक सन्देश लिख रहे थे रो रहे थे- 'कश्मीर तुम्हें सलाम करता है।'
गाँधी के बाद शायद यह पहली मौत थी जिसे देश ने शिद्दत के साथ महसूस किया। केवल सियासतदां ही नहीं- साहित्य, कला, संस्कृति सबको डॉ. लोहिया ने एक साथ प्रभावित किया था। सबसे ज्यादा पत्रकारिता से जुड़े लोगों को। एक तरह से कहा जाय तो डॉ. लोहिया ने पत्रकारिता को विषय ही नहीं दिया, भाषा भी दी। नया मुहावरा दिया। आज सब इस यात्रा में शामिल हैं।
डॉ. लोहिया 1963 में पहली बार फर्रुखाबाद से उप चुनाव जीत कर आये और आते ही अपने पुराने दोस्त से टकरा गये। नेहरू को पहली बार संसद में चुनौती मिली। 1963 में पहली बार लोक सभा में नेहरू सरकार के खिलाफ अविश्वास का प्रस्ताव आया। यह परम्परा आज तक चल रही है। सबसे बड़ी जो बात हुयी कि संसद की शक्ल बदल गयी। 63 के पहले संसद की कार्यवाही में हिन्दी न के बराबर है। यहाँ एक रोचक घटना का जिक्र करना चाहूँगा। जिस दिन पहली बार डॉ. लोहिया खड़े हुये बोलने के लिये उन्होंने हिन्दी में
बोलना शुरू किया। पत्रकार दीर्घा में बैठे तमाम पत्रकार उठकर चले गये। केवल एक पत्रकार वहाँ मौजूद रहे, वे थे रघुवीर सहाय। दूसरे दिन जब सहाय जी की रपट उनके पत्र में प्रकाशित हुयी तो मजबूरन अंगरेजी अखबारों को उसका तर्जुमा लेना पड़ा। संसद का वह स्वर्णिम युग है। समाजवादी पार्टी के संसद में नेता हैं किशन पटनायक। उस समय चली हर एक बहस संसद की धरोहर है। विशेष कर तीन आने बनाम तेरह आने। जिस पर नेहरू को अपने वित्त मंत्री मोरारजी भाई की तरफ से माफी तक माँगनी पड़ी है। इसी समय किशन पटनायक और पण्डित नेहरू के बीच जो पत्र व्यवहार हुआ वह आज एक दस्तावेज है " ट्वंटी फाइव थाउजैंड ये डे'
डॉ. लोहिया संसद ही नहीं सड़क को भी गरम करने में यकीन रखते थे। भाषा आंदोलन आजादी के बाद उठा नौजवानों का पहला कदम था जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। आज तक जो पीढ़ी सियासत में मायने रख रही है वो उसी काल खण्ड की उपज हैं दल कोई भी रहा हो उसे अपनी कार्य शैली बदलनी पड़ी थी और नौजवानों को ऊपर उठाना पड़ा था। आज वह सब समाप्त है और सियासत संदूक और बन्दूक के हवाले है।
केवल एक सवाल है क्या हम कोई नयी और सार्थक शुरुआत कर सकते हैं ?
डॉ. लोहिया को नमन।


