जाति, जनगणना और संसद के साथ धोखा
जाति, जनगणना और संसद के साथ धोखा
दिलीप मंडल
2011 की जनगणना में जाति को शामिल करने का मामला राजनीतिक-बौद्धिक विमर्श के रूप में शुरू जरूर हुआ था, लेकिन देखते ही देखते जनता के बहुसंख्य तबके की आंकाक्षाएं इससे जुड़ गई और यह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। संसद से लेकर सेमिनारों और विश्वविद्यालयों तथा अकादमिक संस्थानों में इस सवाल पर व्यापक चर्चाएं हुईं। जनमानस में यह सवाल काफी गंभीरता से जगह बना चुका है कि आखिर सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान जाति को जनगणना से बाहर रखने के सवाल पर इस कदर अड़े हुए क्यों हैं? वर्चस्व की शक्तियों और खास कर सवर्ण बुद्धिजीवियों ने जातिवादी नजरिए से इस विचार का जितना विरोध किया, उसी अनुपात में जातिवार जनगणना के लिए समर्थन बढ़ता चला गया। सवर्ण वर्चस्व के बावजूद मीडिया इस प्रश्न पर जनभावनाओं को मोड़ने में नाकाम साबित हुआ।
संसद मे सहमति बनी, फिर क्या हुआ
आखिरकार इस देश की कैबिनेट ने लोकसभा में बनी व्यापक सहमति की धज्जियां उड़ाते हुए 2011 की जनगणना से जाति को बाहर कर दिया। यानी 2011 के फरवरी महीने में जनगणना के लिए सरकारी कर्मचारी जब आपके पास आएंगे (यह आलेख दिसंबर, 2010 में लिखा गया है) तो वे आपकी जाति नहीं पूछेंगे। जनगणना के फॉर्म में हमेशा की तरह अनुसूचित जाति और जनजाति का कॉलम तो होगा, इसके अलावा बाकी सभी कॉलम होंगे, लेकिन जाति का कॉलम नहीं होगा। भारत के संसदीय लोकतंत्र के लिए इसके मायने बेहद गंभीर हैं।
संसद के बजट सत्र में लोकसभा में इस बात पर आम सहमित बनी थी कि 2011 में होने वाली जनगणना में जाति को शामिल किया जाए। लोकसभा में ऐसे मौके कम आते हैं जब पक्ष और विपक्ष का भेद मिट जाता है। जनगणना में जाति को शामिल करने को लेकर लोकसभा में हुई बहस में यही हुआ। कांग्रेस और बीजेपी के साथ ही वामपंथी दलों और तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों ने इस बात का समर्थन किया कि जनगणना में जाति को शामिल करना अब जरूरी हो गया है और मौजूदा जनगणना में जाति को शामिल कर लिया जाए। संसद में हुई बहस के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि “लोकसभा की भावना से सरकार वाकिफ है और इस बारे में कैबिनेट फैसला करेगी।” उनकी इस घोषणा का लोकसभा में जोरदार स्वागत हुआ और इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा गया। इस घोषणा के लिए तमाम दलों के सांसदों ने प्रधानमंत्री और यूपीए यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा सोनिया गांधी की जमकर वाहवाही की।
ऐसे देश में 2010 के बजट सत्र में जनता के प्रतिनिधियों ने आम राय से जिस बात का समर्थन किया था, उसे शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले पलट दिया जाए, तो इस पर चिंता होनी चाहिए। आजादी के बाद भारत ने राजकाज के लिए संसदीय लोकतंत्र प्रणाली को चुना और इस नाते देश के लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सबसे प्रमुख मंच हमारे देश की संसद है। जनता द्वारा सीधे चुने प्रतिनिधियों की संस्था होने के नाते लोकसभा को संसद के दोनों सदनों में ऊंचा दर्जा हासिल है। देश पर वही सरकार राज करती है, जिसे लोकसभा के बहुमत का समर्थन हासिल हो।
7 मई, 2010 को दोपहर ढाई बजे के बाद लोकसभा की कार्यवाही इस तरह चली। देखिए उस कार्यवाही के अंश जिसे लोकसभा की वेबसाइट से शब्दश: लिया गया है -
THE PRIME MINISTER (DR. MANMOHAN SINGH): Madam, the hon. Home Minister has made a detailed statement on the issue of Census, 2011. I am aware of the views of hon. Members belonging to all sections of the House. I assure you that the Cabinet will take a decision shortly. (गृह मंत्री ने 2011 की जनगणना के बारे में विस्तृत बयान दिया है। मैं सदन के सभी तबकों के सदस्यों के विचारों से अवगत हूं। मैं आपको आश्वासन देता हूं कि कैबिनेट जल्द ही इस बारे में फैसला करेगी)
लालू प्रसाद (आरजेडी): माननीय अध्यक्ष महोदय, माननीय प्रधानमंत्री जी, नेता सदन और आप पर सदन का पूरा भरोसा है। आज आपके आश्वासन देने के बाद हमने अपना एजिटेशन रोक दिया।
मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी): माननीय प्रधानमंत्री जी और नेता सदन दोनों को बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई। मुझे विश्वास है कि आम तौर पर जो देश की बड़ी तादाद है, उनका भावनाओं का आदर करेंगे और बहुत से उच्च जातियों के जिन लोगों ने समर्थन दिया, उन्हें भी मैं विशेष बधाई देता हूं।
शरद यादव (जेडी-एस): अध्यक्ष महोदया, आज पिछले साठ साल से जो एक तनाव था, उसका आज आपने समाधान निकाला है। मैं पूरी तरह से आपके इस बयान का स्वागत करता हूं। इस देश के करोड़ों गरीब लोग साठ साल से इस मांग को उठाते रहे, जिसका आज आपने बड़े दिल का परिचय देकर समाधान निकाला है। इसलिए आपको सलाम के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं।
मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी): हम सोनिया जी का भी धन्यवाद करते हैं।
गोपीनाथ मुंडे (बीजेपी): अध्यक्ष महोदया, आजादी के बाद पहली बार ओबीसी की जनगणना की मांग थी। माननीय प्रधानमंत्री और सदन के नेता ने कई दिनों से इस बारे में तनाव था, उसे उन्होंने आज हल किया और इस पर फैसला किया। इसलिए मैं सरकार का अभिनंदन और स्वागत करता हूं।
दारा सिंह चौहान (बीएसपी): माननीय अध्यक्ष जी, मैं माननीय प्रधानमंत्री, नेता सदन, गृह मंत्री जी और उन सभी सहयोगियों को अपने दल की तरफ से धन्यवाद देता हूं। कल से संसद में जो तनाव बना हुआ था, यूपीए की चेयरपर्सन श्रीमती सोनिया गांधी जी के दिशा निर्देश में यह तय हुआ है, उसके लिए मैं श्रीमती सोनिया गांधी जी और आप सभी को बधाई देता हूं।
लालू प्रसाद (आरजेडी): हम सोनिया जी को भी धन्यवाद देते हैं।
प्रधानमंत्री की लोकसभा में घोषणा के बाद इस मामले पर विचार करने के लिए कैबिनेट मंत्रियों की एक समिति गठित की गई, जिसके अध्यक्ष वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बनाए गए। जिस सवाल पर लोकसभा में आम सहमति हो और प्रधानमंत्री जिसके लिए सदन में आश्वासन दे चुके हों
लेकिन शीतकालीन सत्र से पहले ऐसा कुछ हुआ कि 2011 की जनगणना से जाति को बाहर कर दिया गया। यह शायद हम कभी नहीं जान पाएंगे कि लोकसभा में बनी आम राय को बदलने के लिए परदे के पीछे क्या कुछ हुआ होगा। इस समिति की सिफारिशों के बाद कैबिनेट ने यह फैसला किया कि फरवरी, 2011 से शुरू होने वाली जनगणना में जाति को शामिल नहीं किया जाएगा बल्कि उसी वर्ष जून से सितंबर के बीच जाति की अलग से गिनती कर ली जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह यह है 6-7 मई, 2010 को लोकसभा में जनगणना पर हुई बहस के बाद जाति जनगणना संबंधी सभी घोषणाएं संसद से बाहर की जा रही हैं। यह संसद की, और एक तरह से भारतीय लोकतंत्र और जनता की अवमानना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के मुताबिक कैबिनेट सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी है। जाहिर है, संसद को कैबिनेट के ऊपर दर्जा दिया गया है और संसद का विश्वास खोने के बाद कैबिनेट को इस्तीफा देना होता है।
संसद से ऊपर कौन बैठा है
जनगणना को लेकर कैबिनेट ने जो फैसला किया उसकी सबसे बड़ी प्रक्रियागत खामी यह है कि जिस बात को लेकर चर्चा संसद में हुई हो और जिस तरह की सहमति बनी हो, उसे पलटने का फैसला कैबिनेट ने उस दौरान किया, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा था। अगर यही फैसला करना था कि जनगणना में जाति को शामिल नहीं किया जाएगा, तो फिर इसके लिए किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं थी। आजादी के बाद से ही भारत में जाति का प्रश्न जोड़े बगैर जनगणना होती रही है और जनगणना के मामले में यथास्थिति को बनाए रखने यानी जैसी जनगणना होती रही है, उसे जारी रखने की घोषणा करने के लिए संसद के दो सत्रों के बीच का समय किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। अगर यह घोषणा संसद के मानसून या शीतकालीन सत्र के दौरान होती तो सांसदों के पास यह मौका होता कि वे इस पर फिर से विचार करते। अगर कैबिनेट की यही राय थी कि जनगणना के बारे में फैसले को तत्काल घोषित करना आवश्यक है तो इसके लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने का विकल्प भी था।
संसद में इस फैसले की घोषणा न करने से यह संदेह पैदा होता कि है कि इस सवाल पर कुछ पर्दादारी थी। जनगणना से जाति को अलग करने का फैसला 9 सितंबर, 2010 को घोषित किया गया।
“After considering various options, based on the responses of various political parties, a separate house to house enumeration of caste will be done from June 2011 to September 2011. (विभिन्न विकल्पों पर विचार करने और राजनीतिक दलों की राय के आधार पर फैसला किया गया है कि 2011 में जून से सितंबर के बीच घर-घर जाकर जाति की गणना की जाएगी।)
इस दिन जारी गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति को देखें। इसमें कैबिनेट के फैसले का जिक्र इस तरह किया गया:
a) ‘Caste’ of all persons as returned by them would be canvassed.
b) The caste enumeration would be conducted as a separate exercise from the month of June 2011 and completed in a phased manner by September 2011 after the Population Enumeration phase (to be conducted in February-March 2011) of the Census 2011 is over.
c) A suitable legal regime for collection of data on Castes would be formulated in consultation with the Ministry of Law & Justice.
d) The Office of the Registrar General and Census Commissioner India would conduct the field operations of the caste enumeration. The Government of India would constitute an Expert Group to classify the caste/tribe returns after the enumeration is completed. The Office of the Registrar General and Census Commissioner India would hand over the details of the castes/tribes returned in the enumeration to the proposed Expert Group.
एक तरफ घोषणा, दूसरी तरफ कई जिलों में जनगणना शुरू
इस घोषणा के तुरंत बाद देश के उन इलाकों में जनगणना शुरू हो गई, जहां सर्दियों में बर्फ गिरती है। मिसाल के तौर पर हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में जनगणना सितंबर महीने में कर ली गई। यानी कैबिनेट ने जनगणना के बारे में फैसला इस तरह किया गया कि संसद को इस फैसले को सुधारने या फिर से विचार करने का मौका न मिले। शीतकालीन सत्र में अगर कैबिनेट के फैसले को बदलने पर विचार होता भी है तो यह एक विचित्र स्थिति होगी क्योंकि उस समय तक कई जिलों में जनगणना संपन्न हो चुकी होगी। सरकार के सामने यह विकल्प था कि वह बर्फबारी वाले जिलों में जनगणना का काम बर्फ पिघलने के बाद कराती। यह इसलिए भी सही होता क्योंकि जाति आधारित जनगणना पर विवाद चल रहा है और इस सवाल पर लोकसभा एक अलग नतीजे पर पहुंची थी।
सूची मौजूद है तो क्यों चाहिए एक्सपर्ट कमेटी
गृह मंत्रालय की विज्ञप्ति को गौर से देखें तो जाहिर हो जाएगा कि सरकार ने जाति जनगणना के आंकड़े जारी करने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की है। जातियों की गिनती का ब्यौरा सितंबर, 2011 तक जुटाने की बात जरूर की गई है लेकिन इन ब्यौरों को एक एक्सपर्ट कमेटी को सौंप दिया जाएगा। वह एक्सपर्ट कमेटी जातियों को अलग अलग समूहों में बांटेगी। यह काम कितने विवादों को जन्म देगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। विभिन्न जातियों के लोग और संगठन अपने जाति से जुड़े मामलों को लेकर अदालतों में जा सकते हैं और इस वजह से जातियों की गणना और आंकड़े जारी करने के काम में बाधा आएगी। सरकार ने अनावश्यक रूप से इस मामले में एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का फैसला किया है। इस समय हर राज्य में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों की सूची मौजूद है। इन सूचियों के होते हुए भी सरकार जातियों को समूहों में रखने के लिए एक्सपर्ट कमेटी क्यों गठित करना चाहती है, ये समझना मुश्किल नहीं है। सरकार दरअसल यही चाहती है कि जाति समूहों के बारे में नई-नई उलझनें पैदा हों, जिसकी आड़ में जाति गणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करने का काम टाला जा सके। साथ ही एक्सपर्ट कमेटी के बहाने से सरकार समाजशास्त्रियों और राजनीतिविज्ञानियों के आगे एक तरह का चारा भी फेंक रही है ताकि उन्हें अपने पक्ष में किया जा सके।
आर्थिक-शैक्षणिक ब्यौरा छिपाने के लिए खर्च किए जाएंगे लगभग 2000 करोड़ रु.
बायोमैट्रिक जाति गणना की तरह ही अलग से जाति गणना का फैसला भी निरर्थक है। इस फैसले की सबसे बड़ी खामी यह यह कि अलग से जातियों की गिनती करने से सिर्फ यह जानकारी मिलेगी कि इस देश में किस जाति के कितने लोग हैं। यह आंकड़ा राजनीति करने वालों के अलावा किसी के लिए भी उपयोगी नहीं है। जनगणना से दरअसल यह आंकड़ा सामने आना चाहिए कि किस जाति की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति क्या है। इस जानकारी के बगैर सिर्फ यह जानकर कोई क्या करेगा कि विभिन्न जातियों की संख्या कितनी है।
आर्थिक-शैक्षणिक स्तर की जानकारी देश में विकास योजनाओं को बनाने का महत्वपूर्ण आधार साबित होगी। इससे यह पता चलेगा कि आजादी के 63 साल बाद किस जाति और जाति समूह ने विकास का सफर तय किया है और कौन से समूह और जातियां पीछे रह गई हैं। इस तरह मिले आंकड़ों के आधार पर खास जातियों और समूहों के लिए विकास और शिक्षा के कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। आरक्षण प्राप्त करने के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग में शामिल होने या किसी समुदाय को आरक्षित समूह की सूची से बाहर करने की मांग को लेकर हुए आंदोलनों की वजह से इस देश में काफी खून बहा है। जनगणना में जाति को शामिल करने से जो आंकड़े सामने आएंगे, उससे इस तरह के सवालों को हल किया जा सकेगा। इस मायने में जनगणना से बाहर जाति की किसी भी तरह की गिनती बेमानी है। योजना आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से लेकर कार्मिक मंत्रालय तथा संसदीय समितियों तक ने लगातार इस बात की सिफारिश की है भारत में जाति आधारित आर्थिक-शैक्षणिक आकड़ों की जरूरत है।
अलग से जाति गणना में कई और खामियां भी हैं। मिसाल के तौर पर, इस वजह से देश के राजकोष पर लगभग 2,000 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगा।
लेकिन सरकार नहीं चाहती कि ये आंकड़े सामने आएं। इसलिए जनगणना में जाति को शामिल करने की जगह जनगणना से जाति को अलग कर दिया गया। यह सब लोकसभा में बनी सहमति का निर


