"जूट की चादर" से झूठ की संस्कृति की चादर उतारने का अभियान
"जूट की चादर" से झूठ की संस्कृति की चादर उतारने का अभियान
“अली बाबू समझ नहीं रहे हैं आप, अभी के अभी दूसरा गुजरात बन जाएगा”
संजीव कुमार
ये शब्द रुकने का नाम ही नहीं ले रहें थे, और रुकते भी कैसे? आखिर हम एक बीजेपी के एम्एलए के घर के सामने आपने नाटक जूट की चादर का मंचन कर अपने रिपोर्ट को बेच रहे थे और लोगो को गुजरात के विकास के झूठे दावों के बारे में बता रहे थे। वो बुजुर्ग जो हमें खुले लब्जों में धमकी दे रहे थे वो ये भी जानते थे कि हमारे ग्रुप में आधे से ज्यादा लोग हिन्दू थे पर जैसे ही शक वश हामिद से उसका यूनिवर्सिटी का पहचान पत्र माँगा और उसमे हामिद अली नाम देखा तो उन्हें मौका मिल गया और वो और उनके समर्थक ये शब्द तब तक दोहराते रहे जब तक हम उस बिहार के इस हिसुआ को छोड़ कर गया के लिए रवाना नहीं हो गए। वैसे भड़कने वालों में केवल वो ही नहीं शामिल थे बल्कि उनके साथ हिंदुस्तान हिंदी समाचार पत्र के एक स्थानीय पत्रकार महोदय भी थे जिन्होंने भी हमें कांग्रेस और बिहार सरकार का एजेंट बताया। जब उनकी एक न चली और हमारे सवालों के जवाब देने में असमर्थ दिखे तो हाथापाई पर उतर गए। कुछ ऐसा ही नज़ारा दिखा बीजेपी के गढ़ गया में भी।
हामिद तो शांत हो गया, लेकिन मन को कैसे शांत करूं। आज खचाखच भरी बोलेरो में एक-दूसरे के गोद में बैठे अपने नाटक को गया में मंचन करने जाते साथियों को देखता हूं तो, चार महीने पहले की बात याद आ जाती है, जिस रात मैं लाइब्रेरी में बैठा एक लेख पढ़ रहा था, जिसने मुझे अंदर तक विचलित कर कुछ लिखने के लिए प्रेरित किया। वो लिखने का दौर इतना लम्बा और पीड़ादायक रहा कि कुछ करने की इच्छा हुई। दुनिया की नज़रों में देखे तो मैं कोई जनकल्याण का कार्य करने की सोच रहा था पर अपनी सुनाऊं तो मैं खुद की बेचैनी और गुस्से को बाहर निकालना चाहता था। कहते हैं गुस्सा थूकना हो तो आपबीती को दोस्तों के साथ बांटो, पर डरता था कि कहीं लोग मजाक न उड़ायें। हिम्मत किया और कुछ नजदीकी दोस्तों को अपनी सोच के बारे में बताने की ठानी पर हर किसी को बताने से पहले एक ही बात की गुजारिश करता था “यार हंसना मत और किसी को बताना मत”। कुछ ने व्यंगात्मक वाहवाही की तो कुछ ने दायें या बाएं हाथ का अंगूठा दिखाते हुए लाइब्रेरी की किताबों में गुम हो गए। कुछ ऐसे भी मिले जो बाहर से मदद करने को तो तैयार हुए पर कोई अन्दर से साथ देने को तैयार नहीं थे। अंततः एक शख्स मिले जिन्हें मेरी योजना पसंद आई और फिर हम दोनों ने काम शुरू कर दिया।
उस रात लाइब्रेरी में कुछ और नहीं बल्कि आये दिन चर्चाओं से घिरे बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र भाई मोदी जी के गुजरात के चौमुखी विकास के बारे में पढ़ रहा था। उस लेख में कुछ अटपटा लगा तो और छानबीन की और उसे एक लेख का रूप देने की सोची। जब लिखना शुरू किया तो इतना लम्बा होता चला गया कि एक अच्छी खासी रिपोर्ट की शक्ल लेने लगा। अब अगर रिपोर्ट लिखूंगा तो लोगों तक उस लम्बी रिपोर्ट को फैलाऊंगा कैसे? फिर दिमाग में आया कि, जेएनयू की धरती तो एक्टिविज्म के लिए ही जानी जाती है, तो फिर यहाँ के लोगों के साथ मिलकर एक नुक्कड़ नाटक की सहायता से रिपोर्ट को फैलाया जा सकता है। पर जब लोगों से बात की तो पता चला की जेएनयू के छात्रो में तो एक्टिविज्म है ही नहीं, बल्कि वो तो जेएनयू की मिट्टी में है और यही तो कारण है की कैंपस के बारह निकलते ही यहाँ के छात्र सारी एक्टिविज्म भूल जाते हैं। लेकिन फिर मुझे याद आई चंदू (चंद्रशेखर) की, जो जेएनयू की एक्टिविजम की लहर को जेएनयू से बाहर ले जाना चाहता था जिसे बिहार के सिवान के जेपी चौक परगोली मार मौन कर दिया गया हम उसी मौन को तोड़ना चाहते थे जिसकी शुरूआत के लिए हमें बिहार से अच्छी जगह लगी ही नहीं। जेएनयू या दिल्ली के अन्य विश्वविद्यालयों में जाकर नाटक करने के लिए तो कई लोग तैयार तो हो गए पर बाहर जाने के लिए....? “भाई एग्जाम है, पेपर प्रेजेंट करना है, सुपरवाईजर ने डंडा कर रखा है............”
फिर सोचा चलिए जेएनयू के बाहर नहीं जा सकते हैं तो क्या हुआ हमारे नाटक के लिए स्क्रिप्ट तो लिख ही सकते हैं। पर यहाँ भी धोखा खाया। आईआईएमसी भी गया, जामिया गया, डीयू गया। अंत में जामिया के एक शख्स स्क्रिप्ट लिखने को तैयार हुए। जनाब ने स्क्रिप्ट तो एक ही हफ्ते में लिख डाली पर उस स्क्रिप्ट को मुझ तक पहुंचने में महीनों भी कम पड़ने लगे और फिर हार के मैंने भी मान लिया कि जनाब ने कभी स्क्रिप्ट लिखी ही नहीं।
इस बीच मैं बिहार गया ताकि अपने अभियान की शुरुआत वहां से करने के लिए कुछ स्थानीय लोगों से मिल लूँ। पटना में इप्टा की एक मीटिंग के बाद लोकल ट्रेन से बुद्ध की ज्ञान स्थली गया लौट रहा था कि पता चला कि, अब स्क्रिप्ट भी मुझे ही लिखनी पड़ेगी। गुस्सा तो आया, कुछ उस जनाब पे तो, कुछ जेएनयू के छात्रो पें तो, कुछ अपने आप पे या यूँ कहें कि गुस्सा आना था तो वो किसी पे भी आये। उसी लोकल ट्रेन में बैठे इप्टा की मीटिंग में मिले कुछ कागजों के पीछे जूट की चादर का आगाज हुआ, और शुरूआत हुई निम्न पंक्तियों से.....
आओ आओ फिर से सुनाए नए बोतल में वही कहानी
कौन लुटा है, कौन लूटेगा डेवलपमेंट के मुद्दे पर
अरे हमने लूटा, हम लूटेंगे डेवलपमेंट के मुद्दे पर ।।।
दिल्ली आया, दोस्तों को स्क्रिप्ट लिखने वाले जनाब की कहानी बताई, जिसे जानकर कुछ लोगों ने हमारा साथ छोड़ दिया और हवाला देने लगे स्क्रिप्ट ना होने का। मैंने स्क्रिप्ट लिखने की कोशिश की, पर जिस शख्स ने आज तक एक नुक्कड़ नाटक प्रेम से देखा तक नहीं, वह भला स्क्रिप्ट राइटर बनने का सपना कैसे देख ले। फिर भी, मैंने एक बार फिर से आईआईएमसी का चक्कर लगाया और एक शख्स से मिलकर नुक्कड़ नाटक के कुछ गुर जानने की कोशिश की। मेरी जाहिलियत तो देखिये कि उसी दिन मैं पहली बार सफ़दर हाशमी के बारे में जाना। रात को लाइब्रेरी में लौटा तो यू ट्यूब पे उपलब्ध सारे नुक्कड़ नाटक देख डाले। और फिर स्क्रिप्ट लिखकर उस आईआईएमसी वाले दोस्त को दिखाने की बहुत कोशिश की...., जो अब तक जारी है।
चलिए, अब जूट की चादर (स्क्रिप्ट) हाथ में थी, कुछ लोगों को दिखाया भी। कुछ ने फिर से वही सिर्फ पीठ थपथपाई तो कुछ ने सुधार में मदद की वहीँ कुछ ने तो नाटक के आधार पर ही सवाल खड़ा कर दिया। विकल्प माँगा तो हड़बड़ा गए। स्क्रिप्ट तो हाथ में थी, पर नाटक करने वाले लोग नहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में वार्षिक महोत्सव के दिन आने ही वाले थे, सोचा वहां के कॉलेज के नाट्य मंचों से बात करते हैं अगर वो हमारे स्क्रिप्ट का नाटक करने को तैयार हो जाएँ। कुछ सफलता मिली पर उसी दौरान जोड़ तोड़ कर हमने आखिर अपनी एक नाटक मंडली तैयार कर ही डाली। रिहर्सल भी शुरु हो गया, नाटक की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हादी सरमदी जैसे शख्स भी हमारी मदद को तैयार हो गए। इस बीच लोगो का मंच के साथ जुड़ने और बिछुड़ने का सिलसिला जारी रहा।
अंततः हमने 17 जनवरी को जेएनयू से कार्यक्रम का आगाज कर ही दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय, और जामिया के कई चक्कर कटे, पर नाटक करने की इजाजत कहीं नहीं मिल पाई। बिहार की यात्रा का समय नजदीक आ रहा था इसलिए हमने दिल्ली और हिसार के कार्यक्रम को स्थगित कर बिहार पर अधिक ध्यान दिया। यात्रा के लिए पैसे इक्कठा करने के लिए जामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के शिक्षकों के खूब चक्कर काटे पर उम्मीद के अनुसार मदद नहीं मिल पाई। किस्मत, बिहार की जनता और खुद पर भरोसा कर यात्रा शुरू हुई पर शुरू होने से पहले ही हमारी ट्रेन रद्द हो गई और हमने किसी तरह जल्दी जल्दी दूसरी ट्रेन (महानंदा) में टिकट करवाया। ट्रेन 27 घंटे लेट है।
खैर 1 फरवरी को आधी रात में 1 बजे (दूसरा दिन लग गया है और 2 फरवरी हो गया है) हम पटना पहुंचे। सब थके हुए थे तो सो गए, लेकिन मेरी आंखो में तो नींद ही नहीं थी, रिपोर्ट उठाया और उसमे कुछ गलतियाँ ढूढने की कोशिश करने लगा। जाने कब सुबह हो गई और हम निकल गए दानापूर स्टेशन, अपना पहला नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत करने के लिए। उसी दिन शाम के 3 बजे हमे पटना के गांधी मैदान में भी नाटक करना था, जहां इप्टा के अरशद अजमल जैसे दिग्गज, पत्रकार और काफी लोग मौजूद थे, जिनके सामने हमे अपनी रिपोर्ट का हिंदी रूपांतरण भी रिलीज करना था।
पटना के गाँधी मैदान से हमारा सफ़र शुरू तो हुआ, पर दैनिक भास्कर के पत्रकार साथी ने अपने लेख में हमारे “जूट की चादर” को “झूठ की चादर” बना दिया। वैसे हिसुआ के अलावा एक अन्य स्थान का जिक्र करना आवश्यक है। वो है नवादा के आंबेडकर छात्रावास।
नवादा आंबेडकर छात्रावास के छात्रों का उत्साह देख कर तो हम जेएनयू और वहां की रेडिकल पॉलिटिक्स तक को भूल गए। हुआ यूँ कि जब हम अपना नाटक समाप्त कर लोगों को रिपोर्ट के बारे में संबोधित कर रहे थे तो आयोजकों ने हमें रात होने का हवाला देकर रोकने की कोशिश की। जिस पर वहां उपस्थित एक छात्र आयोजक को जा कर बोलता है – “ए सर बहुत बोल लिए, 2 घंटा से आप लोगन को सुन रहे हैं अब इ लोगन को भी बोल लेने दीजिए। बोलिए भैया आप बोलिए”..... तभी पीछे से आवाज आती है..... छात्र एकता जिंदाबाद... जिंदाबाद, जिंदाबाद.... और एक पल में ही सारा वातावरण जिंदाबाद के नारों से गूंजने लगता है।
हम अपना कार्यक्रम तो 8 तारीख तक चलाना चाहते थे पर पैसे की कमी के कारण हमें अपने कार्यक्रम को 6 तारीख को ही ख़त्म करना पड़ा। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो आत्मसंतुष्टि होती है कि कल तक कहां एक रिपोर्ट तैयार नहीं थी। आज हम जेएनयू, पटना, बाढ़, बेगुसराय, लखीसराय, राजगीर, हसुआ, वजीरगंज आदि कई जगहों पर सफलतापूर्वक नाटक कर चुके हैं।
हम कुछ साथी 8 तारीख तक बिहार में ही रुके थे, वहां रूकने के दौरान हमसे जितना हो सका हमने अपनी रिपोर्ट को अधिक फैलाने की कोशिश की। हम 8 तक भी बिहार में इसलिए रुक पाए क्यूंकि हम जहाँ-जहाँ जिस गांव में भी रूक रहे थे वहां हमें कुछ भी खाने-पीने और रहने पर खर्च नहीं करना पड़ रहा था और गाँव वालों ने हमारा हर तरह से स्वागत किया। चूंकी अब हम दिल्ली लौट चुके हैं और हमारे ज्यादातर साथियों की फरवरी माह के अंत तक परीक्षा चल रही है तो हम आगे कुछ करने में फ़िलहाल सक्षम नहीं हैं पर अगर हमें यूपी में स्थानीय लोगों की मदद मिली और कुछ आर्थिक मदद मिले तो हम एक हफ्ते के लिए यूपी का दौरा करना चाहते हैं।
वैसे बिहार के दौरे ने हमें अपने अगले नाटक की पृष्ठभूमि तैयार करने में मदद की है। जब हम बिहार के दौरे के दौरान वहां के ग्रामीण क्षेत्रों में रात गुजरते थे तो कुछ स्थानों में हमें दलित बस्तियों में घूमने और उनसे बात करने का मौका मिला जिसके द्वारा हमें दलितों के संस्कृतिकरण के लिए कट्टर हिन्दुओं द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बारे में पता चला। इस दौरान हमने दलित नेताओं से भी बात की और उनके द्वारा दलित राजनीति को गलत दिशा देने के प्रयासों से भी रुबरु हुए। हम अपना अगला नाटक इसी मुद्दे पे लिखना चाहते हैं और जूट की चादर के द्वारा मढ़ी जा रही झूठी संस्कृति की चादर को उधेड़ना चाहते हैं।


