जेएनयू चुनावों के नतीजे क्या बताते हैं?
दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत उतने प्रश्न नहीं खड़े करती जितने जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के चुनाव की जीत करती है। यह जीत ये बताती है कि हवा का रुख किस ओर मुड़ता दिख रहा है।
एक तरफ़ हर तरह से लेफ्ट आइडियोलॉजी, समाजवाद आदि को बेकार, राष्ट्रविरोधी, विकास विरोधी ताकतें बताने के प्रयास बड़ी सावधानी से दक्षिणपंथी ताकतों ने किए, जिनमें वे काफी हद तक सफल भी रहे और आज भी हो रहे हैं। चाहे मिल मज़दूर हों, या अन्य कामगार, या फिर छात्र, हर जगह भगवा विचारधारा ने राष्ट्रवाद और विकास की चाशनी मिलाकर खुद को राष्ट्रवादी बताते हुए अपनी जगह बना ली है।
खैर देश में जिस पार्टी की सरकार है उसके विद्यार्थी खेमे का जीतना कोई बहुत बड़ा प्रश्न नहीं खड़ा करता, क्योंकि युवाओं का पी. एम. मोदी में काफी विश्वास बढ़ा है। कारण में चाहे मीडिया का रोल हो या भाजपा की युवाओं को जोड़ने के लिए चलाई गई रणनीति, मगर यह ट्रेंड दिख रहा है कि भाजपा को युवाओं का समर्थन काफी बढ़ रहा है।
लेफ्ट की बात करें तो जेएनयू के नतीजे शायद लेफ्ट दलों के लिए एक चिंता की घंटी भी हैं। आइसा (AISA) की पकड़ अगर जेएनयू में ढीली हो रही है तो ज़रूर लीडरशिप को कुछ नया सोचना होगा जो युवाओं को जोड़े। परस्पर संवाद, विचारधारा के प्रति सकारात्मक माहौल बनाना व तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हुए भी विभिन्न लेफ्ट समर्थकों को अपने से जोड़ना, आदि ऐसे कई काम करने होंगे जिन पर शायद लीडरशिप सोच ही रही होगी। जिस तरह लेफ्ट दलों के बड़े नेता भी आजकल सिर्फ़ चुनाव के समय बोलते, रैली करते दीखते हैं व कुछ ऊर्जावान नेतृत्व की कमी सी दिखती है, जो शायद नकारात्मक माहौल को बढ़ाने में मदद करती है, उससे लगता है यह वक्त अब लेफ्ट दलों को युवाओं में अपनी पकड़ बनाने के लिए सोचने का है, वरना जिस विचारधारा को लेफ्ट नकारता आया है वह विचारधारा बड़ी चालाकी से युवाओं को आकर्षित करती जाएगी और लेफ्ट का हाल इस बार के लोकसभा चुनावों से भी ज़्यादा गिरता जाएगा। यह बात सोचने वाली है कि युवाओं, मजदूरों को संगठित करने का विचार किस विचारधारा की देन है, हक़ की बात और पिछड़ों, शोषितों के लिए आवाज़ उठाना किस विचारधारा की देन है? वामपंथ के पुरोधाओं को अपनी गतिशीलता बढ़ानी पड़ेगी वरना वो दिन दूर नहीं जब लेफ्ट ताकतें सिर्फ़ कागज़ पर अकादमिक लेख लिखती रह जाएंगी और सरकार से लेकर लोगों में पहुँच दक्षिणपंथ की हावी होती जाएगी।
AISA से लेकर ट्रेड यूनियन के समूहों व सभी लेफ्ट दलों को इस बात पर सोचना पड़ेगा कि कैसे विपरीत हवा के दौर में अपनी लौ को जलाए रखें।
मोहम्मद ज़फ़र
मोहम्मद ज़फ़र शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं।