जो काम मनमोहन नहीं कर पाए, मोदी ने कर दिखाया
यह लड़ाई 112.5 करोड़ लोगों बनाम 12.5 करोड़ लोगों की लड़ाई है और भारत की सरकार इन्हीं 12.5 करोड़ लोगों की नुमाइंदगी करती है
संदीप राउज़ी

जिस काम को कांग्रेस के मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम मिलकर पिछले दस सालों में भी अंजाम नहीं दे पाए थे, उसे वर्तमान मोदी सरकार ने एक झटके में कर दिखाया है।
अगले चार महीने या उससे भी अधिक समय तक अब इस देश में कार्पोरेट घरानों की कंपनियों के खजाने इतना लबालब हो जाएंगे, जितना उन्होंने पिछले छह महीने में कारोबार नहीं किया है।
खुदरा व्यापार में एफडीआई लागू करने से जो शायद दो चार साल बाद हो पाता, वो अब ‘50 दिनों’ के अंदर हो जाएगा। इतने दिनों में खुदरा व्यापारियों की कमर टूट चुकी होगी और ऑन लाइन खरीद बिक्री अपनी गति को प्राप्त कर चुकी होगी। फायदा किसका? बड़े बड़े मॉल और स्टोर चलाने वाले कारपोरेट घरानों का।
नोटबंदी लागू कर रेहड़ी पटरी, खोमचे, छोटे व्यापारियों, दिहाड़ी मजदूरों, छोटे-छोटे धंधे से आजीविका कमाने वाले, किसानों, असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों की बचत पर एक तरफ तो डाका डाल दिया गया है, तो दूसरी ओर बाज़ार में प्रतियोगिता का गला घोंटकर बड़े बड़े स्टोरों, रिलायंस फ्रेश, बिग बाज़ार, ऑनलाइन शॉपिंग, पेटीएम जैसी लेन-देन करने वाली बड़ी कंपनियों, मल्टीनेशनल होटल और टूरिज़्म व्यवसाय को लूट की खुली छूट दे दी गई है।
ध्यान देने की बात है कि देश की कुल अर्थव्यवस्था का 40 प्रतिशत हिस्सा अनौपचारिक है, यानी यहां लेन देन का तरीका परम्परागत है।

जाहिर है इसमें गरीब, किसान, दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी, छोटे और खुदरा व्यापारियों, छोटे कारखाने वाले आते हैं।
कुल अर्थव्यवस्था के इस 40 प्रतिशत हिस्से की कमर टूट जाने से सबसे अधिक प्रभावित किसान, गरीब और दिहाड़ी मजदूर होंगे, लेकिन दूसरी इस 40 प्रतिशत का एक बड़ा हिस्सा कारपोरेट घरानों के हाथ में अपने आप आ जाएगा।
मोदी सरकार की कारपोरेट भक्ति ने लोगों को अपने दैनिक कारोबार छोड़कर एटीएम और बैंकों की लाइन में खड़ा कर दिया है।
इसी साल 2 सितम्बर को हुई एक दिवसीय देशव्यापी हड़ताल में कार्पोरेट घरानों के संगठन एसोचैम ने 18,000 करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया था। अगर इसे आधार बनाया जाय तो नोटबंदी के पहले पांच दिन में देश को क़रीब 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। यह राशि मनरेगा के लिए जारी किए गये धन से 40,000 करोड़ रुपये अधिक बैठती है।
देश के प्रमुख अर्थशास्त्री मानते हैं कि यह संकट अभी चार छह-महीने तक चलने वाला है। अगर यह डेढ़ महीने तक भी खिंचता है तो देश को क़रीब-क़रीब 10 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान होने वाला है (एसोचैम के अनुमानों को आधार बनाएं तो)। लेकिन किसी भी उद्योग संगठन का अभी तक कोई बयान नहीं आया है इसलिए माना जा सकता है कि उद्योगों और बड़े बड़े कारपोरेट घरानों को इससे जबरदस्त फायदा हो रहा है।

दुनिया में पहले से ही मंदी का दौर जारी है।
चीन जैसी अर्थव्यवस्था भी मंदी का शिकार है। भारत बचा रह गया था, हालांकि पिछले तिमाही में जीडीपी में 0.4 प्रतिशत की गिरावट आई है।
नोटबंदी की वजह से भारत के आर्थिक मंदी के ऐसे दुष्चक्र में फंसने के आसार हैं, जिनसे उबर पाने लायक तैयारी भारतीय पूंजपति वर्ग के पास है ही नहीं।
बाज़ार से नकदी खत्म होने के कारण मांग अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। ऐसे में इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ने जा रहा है। जब मांग ही नहीं होगी तो उत्पादन किसके लिए किया जाएगा। इसलिए घरेलू बाज़ार पर निर्भर उद्योग धंधों और कारोबारों में छंटनी होनी तय है। इससे आम जनता में खरीदने की ताकत और कम होगी और बाज़ार का भठ्ठा बैठ जाएगा, जिसकी हालत पहले ही पतली थी।
भारत के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रनब सेन ने कहा कहना है कि इस साल देश की विकास दर में एक प्रतिशत की कमी होने की संभावना है। उनका ये भी कहना है कि देश को अपनी क्षमता के 14 प्रतिशत नोटों से अगले दो हफ्ते काम चलाना होगा।
देश में 500 और 1000 के नोटों का कुल मूल्य, नोटों की कुल मूल्य में 86 प्रतिशत है।
रिजर्व बैंक के अनुसार देश में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों की संख्या 22 अरब थी। यानी इसके बदले 22 अरब नोट बाज़ार में लाना एक टेढ़ी खीर है और जानकारों का कहना है कि इसमें चार से छह महीने लग सकते हैं।
अब आईये ज़रा नोटबंदी से कालाधन को खत्म करने के दावे की पड़ताल करते हैं।
तमाम स्रोत और अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कुल नोटों का छह प्रतिशत ही ब्लैक मनी के रूप में जमाखोरी की गई है। यानी इस नोटबंदी से महज छह प्रतिशत ही कालेधन का सफाया हो पाएगा।
ध्यान रहे इस गणना में आम लोगों की बचत भी स्वतः शामिल है, क्योंकि यह धन अर्थव्यवस्था के सफेद रास्तों से अलग है, इसलिए इसका भी सफाया तय है।
अधिकांश अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का मानना है कि देश का 90 प्रतिशत काला धन स्विस बैंकों में जमा है, बड़ी बड़ी कंपनियों के विदेशी कारोबार में लगा हुआ है। यह धन करेंसी यानी नोट के रूप में नहीं है।
देश में भी काला धन का एक बड़ा हिस्सा शेयर बाज़ार में, रीयल स्टेट कारोबार में, आभूषणों और अन्य वित्तीय लेनदेन के रूप में है, जिन पर इस नोटबंदी से ज़रा भी आंच नहीं आने वाली है।
यह फैसला बड़ी-बड़ी कारपोरेट कंपनियों को अकूत फायदा पहुंचाने के लिया गया है इसे मानने के कई कारण हैं।
पहला तो यही है कि अभी महीने भर पहले ही सुप्रीम कोर्ट में मोदी सरकार ने हलफनामा दायर कर उन 57 लोगों के नाम बताने से इनकार कर दिया, जो सरकारी खजाने का 85000 करोड़ रुपया डकार गए हैं।
दूसरा, नोटबंदी योजना को लागू करने से पहले ही बैंकों में रिकॉर्डतोड़ (सितम्बर माह में 10,000 अरब रुपये) पैसा जमा किया गया।
दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने इस आधार पर आरोप लगाया है कि योजना को लागू करने से पहले काला धन रखने वाले खास लोगों को लीक कर दिया गया।
तीसरा, नोटबंदी के हहाकार के बीच मोदी ने सरकारी कर्मचारियों को बचाने के लिए भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून में बदलाव का हरी झंडी दे दी है। और इस तरह भ्रष्टाचार की प्रमुख जड़ अफसरशाही को कवच कुंडल से लैस कर दिया है।

चौथा, सत्ता में पहुंचते ही मोदी ने बाहर भेजे जाने वाले धन की सीमा को दो किश्तों में 75,000 डॉलर से बढ़ाकर 2,50,000 डॉलर प्रतिवर्ष कर दिया।
इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक, पिछले 11 महीने में ही 30,000 करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे जा चुके हैं।
पांचवां, इस समय देश के बैंकों का क़रीब 6 लाख करोड़ रुपये बट्टा खाते में जा चुका है। यानी उद्योगपति 6 लाख करोड़ लेकर बैठ गए हैं। कोई भी अच्छी मंशा वाली सरकार सबसे पहले इन कारपोरेट घरानों को पकड़ेगी लेकिन मोदी सरकार ने पिछले वित्त वर्ष में पूंजीपतियों के टैक्स के सवा लाख करोड़ रुपये माफ कर दिये।
और सातवां, बीएसएनल-सीसको के बीच एक सौदे में 300 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ, मोदी सरकार इस पर एकदम चुप्पी लगाए बैठी हुई है।
नोटबंदी की योजना का दूसरा पक्ष इससे भी स्याह है।
सबसे अधिक मार खाने वाले सिरे पर आम जनता है। पिछले 25 सालों के उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण (एलपीजी) का परिणाम ये रहा है कि देश की अधिकांश जनता अधिक से अधिक गरीब होती गई है।
क्रेडिट स्विक की 2015 की रिपोर्ट बताती है कि देश के 10 प्रतिशत सर्वाधिक धनी लोगों के हाथ में देश की दो तिहाई सम्पत्ति पहुंच चुकी है। यानी बाकी बचे 90 प्रतिशत (एक अरब) लोगों के पास देश की कुल दौलत का एक चौथाई भी नहीं है।

अगर काला धन है तो इन्हीं 10 प्रतिशत लोगों यानी 12.5 करोड़ आबादी के पास है।
यह लड़ाई 112.5 करोड़ लोगों बनाम 12.5 करोड़ लोगों की लड़ाई है और भारत की सरकार इन्हीं की नुमाइंदगी करती है। इसीलिए जब मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो अडानी अम्बानी की बाछें खिल जाती हैं।
मोदी खुद अपने विमान में बैठाकर पूंजपति गौतम अडानी को कोयला खदान का पट्टा दिलाने के लिए ऑस्ट्रेलिया ले जाते हैं, सरकारी बैंक से गारंटी दिलाते हैं।
ये वही अडानी हैं जिन्होंने आम चुनावों में प्रचार के दौरान मोदी की सेवा में विमानों का एक पूरा बेड़ा ही लगा दिया था।
इसीलिए जब 4जी के मार्फत पर पूरे बाज़ार पर कब्ज़ा करने का समय आता है तो मोदी मुकेश अंबानी के इस प्रोजेक्ट में पोस्ट ब्वॉय बनकर विज्ञापन में चस्पा हो जाते हैं।
इसीलिए जब नोटबंदी लागू होती है तो पेटीएम के मालिक विजय शेखर शर्मा के पोस्टर ब्वॉय बन जाते हैं और पेटीएम के विज्ञापन में मुस्कराने लगते हैं।
ताज्जुब नहीं कि ये सभी पूंजीपति हिंदू जातीय क्रम में सवर्ण हैं (बनिया और ब्राह्मण), जिनके हितों के लिए आरएसएस देश में सनातनी हिंदू व्यवस्था लागू करना चाहता है।
लेकिन दूसरी तरफ जब पेट्रोल की बात आती है या दाल, आटा महंगे होने की बात हो या मनरेगा मजदूरी, शिक्षा और सेहत पर खर्च की बात आती है तो मोदी सरकार ऊंट के मुंह से जीरा भी छीन लेने की भरसक कोशिश करती है। इससे प्रभावित होने वाली आबादी अधिकांशतः दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएं, बेरोजगार और गरीब है।

प्रसिद्ध कहावत है कि राजनीति, अर्थनीति की प्रखर अभिव्यक्ति होती है।
मनमोहन सिंह और मोदी में बस इतना ही फर्क है। देसी और विदेशी पूंजीपतियों को जितनी निरंकुशता चाहिए वो उतने ही निरंकुश शासक के लिए अपना खजाना खोलेंगे।
आज बड़े बड़े कार्पोरेट घरानों की लूट के लिए मोदी मुफीद हैं।
अराजकता, जनता की लाचारी, सामंतवाद, साम्प्रदायिक हिंदू फासीवाद, और ब्राह्मणवाद मुफीद है। इसीलिए एक ऐसा व्यक्ति उनका सबसे चहेता होगा जो सर्वसत्तावादी हो, तानाशाही गुणों वाला हो, नार्सिसिस्ट (आत्म मुग्ध) और फासीवादी हो। पूंजीपतियों के भाग्य से मोदी में ये सारे गुण हैं।
अब प्रश्न आता है कि जनता के हाथ में क्या है।
यह सही है कि भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, जमाखोरी और काला धन से जनता त्रस्त है। लेकिन यह तो पूंजीवाद का एक स्वाभाविक पहलू है।
रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार, पूंजीवादी औद्योगिकरण वाली सभी अर्थव्यवस्थाओं का जीवंत लक्षण रहा है।
उदारीकरण ने वैसे भी दस में में नौ लोगों की दौलत को छीन लिया है, वो लगभग फुटपाथ पर आ चुके हैं। इसलिए जब तक निजी दौलत का खात्मा नहीं हो जाता भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं पाई जा सकती।
यही ऐतिहासिक कार्यभार है। इसको हाथ में लिए बिना जनता को और भी दुर्दिन देखने पड़ सकते हैं।

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