जो कारगिल में मरने वालों की बहादुरी और शहादत पर लहालोट थे वे एक असुविधाज़नक कमेन्ट से शहीद हो गए....
आज कारगिल की लड़ाई के सोलह साल पूरे हुए....
मेरी आँखों के आगे ग्यारहवीं में पढ़ने वाली उस सोलह साल की बच्ची का चेहरा नाच गया जिसका बीस साल का पति इस लड़ाई में मारा गया था.... उसकी दुबारा शादी इसलिए नहीं हुई कि उसके गाँव में जाकर उसे शाहीद की बीवी का दर्ज़ा और उसके ससुर को कई लाख का चेक दिया गया....
एक कवि-लेखक के पोस्ट पर लाइक और कमेन्ट की बरसात के बीच मैंने कुछ कमेन्ट किया....
अरे, वे तो गायब हो गए....
ध्रुव गुप्त नाम है, ग़ज़ल लिखते हैं. मेरे पुराने मित्र हैं फेसबुकिया....
मेरा कमेन्ट भी गया....
तो ये है देशभक्ति का नशा....
जो कारगिल में मरने वालों की बहादुरी और शहादत पर लहालोट थे वे एक असुविधाज़नक कमेन्ट से शहीद हो गए....
श्रद्धासुमन.... रणबांकुरे, भारत माँ के वीर सपूत, क़र्ज़ उतारनेवाले, शत-शत नमन.... चार सौ लाइक, नब्बे कमेन्ट.....
(फेसबुक की भाषा में मैं ब्लॉक हो गया....यह कमेन्ट किसी और स्रोत से मिला)
ये बात तथ्यों से पुष्ट है कि यह अनावश्यक युद्ध(?) था..अक्टूबर-नवम्बर की बर्फ़बारी में पाकिस्तानी घुसपैठिये खुद ही गल जाते या भाग जाते.... वाच करना था बस. मासूम नौजवानों की बलि दी गयी.... परवीन स्वामी और कई युद्धविशारद लेखकों ने लिखा है.

कॉमनसेंस से भी जान सकते हैं कि ऐसे स्ट्रेटेजिक पोजीशन पर जब दुश्मन ऊपर हो, ऐसी लड़ाई? कोई और मोर्चा गुजरात, राज़स्थान, पंजाब में क्यों नहीं खोला? आपको कोई गाल पर मारे तो क्या आप उसके ढालयुक्त गाल पर मार कर अपना हाथ तोड़ेंगे गुप्ता जी? पेट पर मारो... लेकिन नहीं.... ज़रा याद करो कुर्बानी गा कर अपनी नाकामी ढकना और वोट लेना था न.....

ज़िन्दापीर देशभक्तों को श्रद्धान्ज़ली.....
दिगंबर
(फेसबुकिया टिप्पणी)
दिगंबर, लेखक प्रसिद्ध वामपंथी विचारक हैं।