व्यापार जंग की राह पर

क्या स्मूट-हावले जैसी स्थिति का दोहराव होने वाला है?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 1 मार्च को स्टील पर 25 फीसदी आयात शुल्क और अल्युमीनियम पर 10 फीसदी आयात शुल्क लगाने की घोषणा की. उन्होंने यह निर्णय ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर लिया. अंदेशा है कि इस निर्णय के बाद व्यापार जंग छिड़ जाए. अगर ऐसा होता है तो विश्व की अर्थव्यवस्था में संकुचन तय है. विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में इस तरह की जंग होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आती है. इससे विश्व की राजनीतिक स्थिति पर भी असर पड़ना तय है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की अपनी नीति पर चलते हुए ट्रंप इस तरह के निर्णय ले रहे हैं. उन्होंने बगैर किसी देश का नाम लिए कहा कि इन देशों ने अमेरिका के स्टील और अल्युमीनियम उद्योग को तबाह कर दिया है. उन्होंने कहा कि जब ऐसी स्थिति आ जाए कि अमेरिका स्टील और अल्युमीनियम नहीं बना पाए तो हम एक देश के रूप में बचे नहीं रह सकते.


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इन उद्योगों के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक के बाद आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया गया. निर्णय लेते वक्त यह नहीं सोचा गया कि स्टील और अल्युमीनियम से बनने वाले विभिन्न उत्पादों के उत्पादन और उनकी कीमतों पर इसका क्या असर होगा.

6 मार्च को ट्रंप के मुख्य आर्थिक सलाहकार और राष्ट्रीय आर्थिक परिषद के अध्यक्ष गैरी कोहन ने इस्तीफा दे दिया. उनकी पहल पर ही कॉरपोरेट और आय कर में भारी कटौती की गई थी. खबरों के मुताबिक कोहन उस तर्क के साथ थे जो ट्रंप की राष्ट्रीय सुरक्षा टीम दे रही थी. इस टीम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एच.आर. मैक्मास्टर, विदेश सचिव रेक्स टिलरसन और रक्षा सचिव जिम मैटिस शामिल हैं. इनका कहना था कि अगर अमेरिका आयात शुल्क लगाता है तो जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा और दक्षिण कोरिया जैसे उसके सुरक्षा सहयोगी उससे दूरे चले जाएंगे.

इस निर्णय पर यूरोपीय संघ, नाफ्टा सदस्यों, कनाडा और मैक्सिको की प्रतिक्रिया आई. यूरोपीय संघ की व्यापार आयुक्त सिसिलिया मैलमस्ट्रोम ने इसे विश्व व्यापार संघ में चुनौती देने की बात कही. उन्होंने इसे व्यापार युद्ध नहीं माना. इस पर ट्रंप ने कहा कि अगर यूरोपीय संघ ऐसा करता है तो यूरोप से आने वाली कारों पर हमला करेंगे. जिन अमेरिकी उत्पादों को बंदिशें लगाने के लिए यूरोपीय संघ ने चुना है उनमें हार्ले डेविसन की मोटरसाइकिल भी शामिल है. शायद इसी वजह से ट्रंप ने यूरोपीय कारों को घसीटा. ट्रंप की टीम में अमेरिका फर्स्ट की बात करने वालों में वाइट हाउस नैशनल ट्रेड काउंसिल के निदेश पीटर नवारो और वाणिज्य सचिव विल्बर रॉस प्रमुख हैं. इस मामले में ये कोहन पर हावी हो गए. रिपब्लिकन ने भी इसका विरोध किया है. हाउस के स्पीक पॉल डी रयान ने इस निर्णय की कड़ी आलोचना की है.

जब कनाडा और मैक्सिको ने अमेरिका से आयात शुल्क में छूट की मांग की तो उन्हें कह दिया गया कि ऐसा तब ही संभव है जब नाफ्टा वार्ता में वे अमेरिकी मांगों के लिए राजी हो जाएं. इन देशों की ओर से बातचीत में शामिल एक प्रतिनिधि ने कहा कि नाफ्टा समझौते में अमेरिका कनाडा और मैक्सिको के माथे पर बंदूक रखकर निर्णय कराना चाहता है. नवारो व्यापार और विनिर्माण नीतियों के कार्यालय के भी प्रमुख हैं. उन्होंने कहा कि छूट किसी देश को तो नहीं मिलेगी लेकिन कंपनियां इसके लिए आवेदन कर सकती हैं. इससे साफ है कि लॉबिंग बढ़ेगी.

तमात असहमतियों के बीच एक बात पर सहमति दिख रही है कि ट्रंप को अपनी कारोबारी जंग चीन पर केंद्रित रखनी चाहिए. लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि इस लड़ाई में जो देश उनका साथ दे सकते थे, उन्हें वे क्यों नाराज कर रहे हैं. अमेरिका चीन से सॉफ्टवेयर पाइरेसी, ट्रेड सिक्रेट की चोरी और नकली सामानों के उत्पादन से परेशान है. चीन अगर मुख्य अपराधी है तो अमेरिकी कानूनों के तहत उसकी बांह मरोड़ी जाए और उसे सजा दी जाए. अमेरिका में यह मांग भी उठ रही है कि चीन से आने वाले जूतों, कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर भी आयात शुल्क बढ़ाया जाए.

इन सबके बीच चीन ने धैर्य दिखाया है. ट्रंप के ये निर्णय विश्व व्यापार संघ के व्यापारिक निर्णयों को कमतर करने वाले हैं. दुनिया में एक बार फिर उसी तरह की परिस्थिति बनती दिख रही है जो 1930 के स्मूट-हावले टैरिफ एक्ट के बाद बनी थी. इसके जरिए 20,000 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया गया था. इसके जवाब में अमेरिका के व्यापार साझेदारों ने भी आयात शुल्क बढ़ा दिए थे. इससे जो कारोबारी जंग शुरू हुआ उससे विश्व व्यापार संकुचित हुआ और अंतत वैश्विक मंदी आई.

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इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली वर्षः 53, अंकः 09, 3 मार्च, 2018

(Economic and Political Weekly, )