ठाकुरता को अदानी खा गए अपन को आडवाणी
ठाकुरता को अदानी खा गए अपन को आडवाणी
परॉन्जॉय गुहा ठाकुर्ता को जिस तरह इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली से अदानी पर लिखी रिपोर्ट पर हटाया गया... काफी कुछ ऐसा ही मैं झेल चुका हूं..
मामला था छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ढहाने की बरसी का... हालांकि खेल तो 1992 को बाबरी ढहाने वाले दिन भी हुआ... जब घटना की आंखों देखी रिपोर्ट संपादक घनश्याम पंकज ने इस आधार पर रोक दी कि स्थानीय प्रभारी को ही बता कर अयोध्या क्यों गया, उनके कान में क्यों नहीं फूंका...
वही खेल जरा और धड़ल्ले से कुछ साल बाद हिन्दुस्तान में खेला गया, जब मेरठ हिन्दुस्तान के प्रबंधन ने हत्यारों और भ्रष्टाचारियों, चरण सिंह के बेटे और यूनिवर्सिटी के चांसलर और एक बहुत बड़े ग्रुप के खिलाफ खुल कर लिखवाने पर दिल्ली की मदद से इसलिए हटवा दिया कि विज्ञापन देने की शर्त ही ये रखी गई थी कि इस संपादक को हटाओ, तो आखिरी वक्त गुजारने को लखनऊ हिन्दुस्तान में डाल दिया गया।
लखनऊ में ही छह दिसंबर यानी बाबरी की बरसी पड़ी.. तो वो ही आंखों देखी रिपोर्ट तैयार कर दिल्ली भिजवा दी।
अब आगे सुनिए...
वहां से एक गावदी किस्म के संपादक का फोन आता है कि आपने उस दिन की घटना में आडवाणी को अयोध्या में कैसे दिखा दिया, आडवाणी जी तो उस दिन अयोध्या में थे ही नहीं..
अब उस गधे को क्या बतलाता कि मेरे सामने ही मस्जिद ढहाने के बाद उमा, रितंभरा, और जोशी के गले मिल लालकृष्ण आडवाणी भीड़ को प्रसाद खा कर जाने की घोषणा कर रोक रहे थे...
खैर, मेरे अपनी पे आ जाने से वो रिपोर्ट डस्टबिन में डाल दी गई... बाकी नौकरी तो जानी ही जानी थी...
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