मृणाल पाण्डे

आपने कभी गौर किया कि गांधी टोपी कहलाने के बावजूद पुरानी तस्वीरों में यह टोपी गांधी नहीं, नेहरू के सिर पर ही दिखती है। फिर भी जब मीडिया और विज्ञापन एजेंसियों ने दूसरे गांधी कहकर इसको अन्ना से जोड़ते हुए दोबारा ब्रैंडिंग की, तो देखते-देखते ‘मैं अन्ना’ मार्का टोपी का जादू देश भर में युवाओं के सिर चढ़कर बोलने लगा। लेकिन जो टोपी गांधी या अन्ना के लंबी जनसेवा में तपे जीवन से सहज जुड़कर ही महिमावान बनी है, वह ‘मैं अन्ना हूं’ की इबारत लिखते ही क्या हर आयु और आयवर्ग के शहरी युवा को अन्ना बना देगी? यह दावा एक क्रूर बेईमानी है।
रामलीला मैदान में जुटी अन्नाभक्तों की भीड़ के मन में यह विचार आया होता तो ही समावेशी चिंतन और गंभीर बहस पैदा होती, जो आंदोलन के समापन के बाद भी दूर तलक जाती। पर मैदान या मंच के बाहर से असहमति के सुर उभरते ही असहिष्णु फटकार या अन्ना नाम महिमा का जोशीला संकीर्तन सुनाई देता था। जिनके दिमाग ने रामलीला मैदान की भावनात्मक तर्कविमुखता में बहने की बजाय अपनी विचार क्षमता को बचाए रखा, उनको गांधीटोपियों से पटे रामलीला मैदान में व्यक्तिपूजक बड़बोले नारों और फिल्मी तेवरों से जरूर लगा होगा कि आखिर ऐसे नाटकीय हिस्टीरिया के बीच रामलीला मैदान पर जनता व सरकार के नुमाइंदों के बीच किसी गंभीर विषय पर कोई भी लंबा, गंभीर व भरोसेमंद संवाद कैसे किया जा सकता है? मंच पर सतत मुखर जनलोकपाल बिल के नुमाइंदों पर संसदीय बहस के दौरान एक पैना सवाल उठा भी कि आखिर सिविल सोसायटी ने इस नेतागिरी के लिए उनका चुनाव कब किया? अगर वे लोकप्रिय स्वयंभू नेता माने जाएं तो भी उनकी उपस्थिति में बारह दिनों तक हजारों लोग लगातार किस तरह फिल्मी गाने गाते-बजाते मंच पर क्षीणकाय होते जा रहे 74 बरस के बूढ़े की तरफ बस ‘अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं’, सरीखे हवा-हवाई नारे लगाने को प्रेरित किए जाते रहे?क्या रामलीला मैदान के अधिकतर लोग तमाशबीन थे, जिनके लिए यह आंदोलन निजी जीवन को बिना किसी तकलीफदेह बदलाव से गुजारे, लंबे वीकएंड पर गांधी या अन्ना की टोपी-मुखौटा लगा टीवी के आगे दसेक सेकंड को डिजाइनर क्रांतिकारी बनने का एक बंपर मौका था?
उस भीड़ के बीच अन्ना, गांधी या भगतसिंह के डुप्लीकेट बनकर या उनको देखकर परम तृप्ति का अनुभव करने वाले शहराती नागरिक क्या क्षणिक उफान उतरने पर दोबारा निजी हितस्वार्थ पर केंद्रित उस लाइफ में लौटकर अपने नफे-नुकसान का हिसाब लगाने तो न बैठ गए होंगे, जिस पर बने विज्ञापन दोस्त की तुक टोस्ट से मिलाते हैं? पुराने नारों और अन्ना टोपी जैसे टोटकों के नशे में जब ओम पुरी, केजरीवाल या किरण बेदी सरीखे लोग भाषा में सामान्य शिष्टता के तकाजों का घटश्राद्ध करते और अग्निवेश जैसे सलाहकार नेपथ्य में गुपचुप किसी संदिग्धजन से बतियाते दिखाई दिए हों तो ऐसे तमाम सवालों का ईमानदारी से पूछा जाना जरूरी है। वे चोट करें तो करें। रघुवीर सहाय ने आपातकाल के आसपास किसी ऐसे ही क्षण में लिखा था : टूट मेरे मन, एक बार सही तरह टूट, मत झूठमूठ यूं रूठ।
हमारे यहां कई झूठमूठ रूठे जोड़े घर से भागकर ब्याह करने के रोमांटिक सपने देखते हैं। वे भी यह नहीं सोचते कि उस रूमानी पल के बाद जब गृहस्थ जीवन की सामान्य नून, तेल, लकड़ी की चिंताएं उनको घेरेंगी तो वे क्या करेंगे? रामलीला मैदान में क्रांति के रूमानी सपनों में डूबे लोगों का भी यही हाल था। शायद ही यह ख्याल उनमें व्यापा हो कि सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद अन्ना की क्रांति की अगली डगर उनके निजी जीवन में भी लंबे समय तक बदलाव की कठोर चुनौतियां खड़ी करेगी। उनसे निपटने को वे कितने तैयार हैं?
असली जीवन में क्रांति के बाद ही बदलाव शुरू होता है और यह प्रक्रिया बड़ी कठोर जमीनी दिक्कतों से दो-चार कराती है। जब यूगोस्लाविया जर्मनी के नस्लवादी फासिज्म की प्रतिक्रिया में हुई क्रांति के बाद साम्यवादी देश बनकर उभरा तो क्या किसी को इलहाम था कि महज छह दशक बाद उसमें सर्बियाइयों और क्रोएशियाइयों के बीच ऐसी घोर नस्ली खूनी महाभारत छिड़ेगी कि अंतरराष्ट्रीय फौजों को वहां सामरिक हस्तक्षेप करने भेजना पडेगा? 1949 में साम्यवादी क्रांति के इश्क में गिरफ्तार माओ की लाल सेना को कितना पता था कि चीन 21वीं सदी में पूंजीवादी विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति बन बैठेगा?
फिर भी वस्तुस्थिति से सचमुच उकता चुके कई समझदार लोग हैं, जो जानते हैं कि सब रास्ते बंद नजर आते भी हों, तब भी स्थायी बदलाव लाने के लिए कोई शॉर्टकट काम नहीं करते। अगर व्यवस्था सचमुच इतनी सड़ी-गली हो गई है कि उसे ढहाना ही होगा तो उसे ढहाने को तैयार हाथों को इंकलाब जिंदाबाद का गगनभेदी नारा बुलंद करने के बजाय पहले गंभीरतापूर्वक नवनिर्माण का नक्शा तैयार करना होगा और प्रामाणिक इंजीनियरिंग का हुनर भी हासिल करना होगा। वरना दिक्कतों के सामने आने पर चमत्कारिक बदलाव की आशा से उतावली जनता का उत्साह चिड़चिड़े गुस्से में बदल सकता है।
भीड़ में गाते-नाचते लोगों के बीच से जो फुरसती क्रांति कामना मीडिया में उजागर हुई, वह बड़ी हद तक फिल्मी और टीवी के रियलिटी कार्यक्रमों की बेदिमाग विरासत थी। लेकिन विडंबना यह कि मनोरंजन व प्रचार की व्यावसायिक दुनिया के बीचोंबीच जीवन रेखा बनकर बहने वाली काले धन की विशाल पाताली गंगा के बारे में जानते हुए भी नेताओं ने उनको भ्रष्टाचार पर बोलने दिया और भीड़ ने भी उनके लिए खूब तालियां बजाईं।
सौ बात की एक बात यह कि हमारे विविधतामय राष्ट्र राज्य की पहली व टिकाऊ पहचान एक संविधान पर टिके गणतंत्र की है, जो अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली से चुनकर बनी संसद के मार्फत चलता है। संसद के बाहर से अनशन आंदोलन द्वारा बदलाव लाने की पेशकश और अंधी व्यक्तिपूजा, संविधान निर्माता व महान चिंतक बाबासाहब आंबेडकर के शब्दों में, अराजकता का व्याकरण बनाती है, जो तानाशाही के लिए रास्ता खोल सकती है। खुद बाबासाहब ने कानूनी राह से बुनियादी-टिकाऊ बदलाव लाने की उजली मिसालें कायम की हैं, जिन पर आज के उत्तेजनामय वातावरण में अविलंब गौर करना जरूरी है।

साभार -दैनिक भास्कर