ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है महंगाई
ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है महंगाई
अंततः मनमोहन सिंह के पदचिन्हों पर ही चल रही है मोदी सरकार
नई बोतल में पुरानी शराब
शैलेन्द्र चौहान
केंद्र सरकार ने रेल किराये में अभूतपूर्व बढ़ोतरी की है। रेल किराया 14.2 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है। माल भाड़े में भी 6.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। हाल के समय में अब तक की यह सबसे बड़ी वृद्धि है। बेसिक किराये में 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि 4.2 फीसदी फ्यूल अजस्टमेंट कॉस्ट है। बढ़े दाम 25 जून से लागू हो जाएंगे। अगर आप पहले ही टिकट चुके हैं, तो भी आपको बढ़ा हुआ किराया यात्रा करते वक्त टीटीई को देना होगा। इतनी अधिक बढ़ोतरी के पीछे सरकार का तर्क है कि यह फैसला यूपीए सरकार के गवक्त ही ले लिया गया था, लेकिन आचार संहिता की वजह से लागू नहीं हो पाया था, इसलिए इसे अब लागू किया जा रहा है। क्या यह सरासर वायदाखिलाफी नहीं है? 9 जुलाई को रेल बजट पेश होना है, लेकिन सरकार ने उससे पहले ही किरायों में बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया है।
यूपीए सरकार में बकाबू महंगाई को नियंत्रित करने मुद्दे पर बहुमत से सत्ता में आई मोदी सरकार अब खुद महंगाई के मोर्चे पर घिरती नजर आ रही है। अप्रैल की तुलना में मई महीने में महंगाई दर में बढ़ोतरी हुई है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक खाने पीने की चीजों के दाम बढ़ने की वजह से महंगाई बढ़ रही है। वित्त मंत्री जेटली ने राज्य सरकारों से जमाखोरों पर नकेल कसने को कहा है, ताकि जरूरी चीजों के दाम न बढ़ने पाएं। महंगाई पर मंत्रियों के साथ बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐलान किया कि सरकार खाने पीने की 22 चीजों और जमाखोरों पर कड़ी नजर रखेगी। वस्तुतः समस्त देश में आर्थिक-सामाजिक हालात में सुधार का नाम ही वास्तविक विकास है। एक वर्ग के अमीर बनते चले जाने और किसान-मजदूरों के दरिद्र बनते जाने का नाम विकास नहीं बल्कि देश का विनाश है। वर्तमान राजनैतिक समीकरण ने संभवत: शासक वर्ग को कुछ अधिक ही आश्वस्त कर दिया है कि आम आदमी के रोष से निकट भविष्य में उसकी सत्ता को कोई खतरा नहीं है। निरंतर गति से बढ़ती महंगाई और शोषण के बीच चोली-दामन का संबंध है। महंगाई वास्तव में ताकतवर अमीरों द्वारा गरीबों को लूटने का एक अस्त्र है। इस खतरनाक साजिश में सरकारें भी अमीरों के साथ बाकायदा शामिल हैं। सरकार ने बाजार की ताकतों को इतना प्रश्रय और समर्थन प्रदान कर दिया है कि घरेलू बाजार व्यवस्था नियंत्रण से बाहर होकर बेकाबू हो चुकी है। सटोरिए, दलाल और बिचौलिए इसमें सबसे अहम किरदार हो गए हैं। गत दो वर्षों के दौरान देश का किसान और अधिक गरीब हुआ है जबकि उसके द्वारा उत्पादित खाद्य पदार्थों के दामों में भारी इजाफा दर्ज किया गया। यह समूचा मुनाफा अमीरों की जेबों में चला गया। देश के अमीरों की अमीरी ने अद्भुत तेजी के साथ कुलांचें भरीं। मंत्रियों और प्रशासकों के वेतन में जबरदस्त वृद्धि हो गई। दूसरी ओर साधारण किसानों में गरीबी का आलम है। आम आदमी की रोटी-दाल किसानों ने नहीं, वरन बड़ी तिजोरियों के मालिकों ने दूभर कर दी है।
दिग्गज अर्थशास्त्री पॉल क्रूगमैन ने महंगाई को 'मात्र' मौद्रिक घटना न बताते हुए इसे हमेशा से 'गंभीर राजनीतिक और सामाजिक विघटन' से जुड़ी घटना करार दिया। यह कहना मुश्किल है कि लगातार महंगाई की मार झेल रहे भारत का ऐसे सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं से कुछ लेना-देना है या नहीं। लगभग चार सालों से भारत में महंगाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। इसके कारण चीज़ों की कीमतें बढ़ी हैं, लोगों की बचत घटी है। महंगाई की सबसे ज़्यादा मार ग़रीबों पर पड़ी है और मध्यम वर्ग का जीवन बहुत मुश्किल हो गया है।
बाज़ार और दुकान की कीमतों को दर्शाने वाली उपभोक्ता मुद्रास्फीति जनवरी 2012 से लेकर अब तक 7.65 फीसदी से 10.91 फीसदी के दायरे में रही है।
यद्यपि ईंधन और खनिजों के दाम भी बढ़े हैं, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत में महंगाई की मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें हैं। पेट्रोलियम कंपनियों के कथित नुकसान की भरपाई करने के नाम पर पहले पेट्रोल के दाम में और अब डीजल व रसोई गैस के दाम में बढ़ोतरी की जा रही हैं। तेल कंपनियों के आंकड़े कुछ और ही बयान करते हैं। गत वर्ष ओएनजीसी ने तकरीबन 20 हजार करोड़, इंडियन ऑइल ने 3 हजार करोड़ और जीएआईएल ने 3 हजार करोड़ रुपयों का शुद्ध मुनाफा अर्जित किया। वर्तमान प्रधानमंत्री एक ऐसी अर्थनीति के समर्थक हैं, जो एकदम ही अमीर कॉर्पोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचा सके। गत दो वर्षों से जारी महंगाई दर ने पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। अमीर आदमी को महंगाई से कुछ भी फर्क नहीं पड़ता, किंतु एक गरीब इंसान की हालत कितनी बदतर हो चली है, इसका कुछ भी अंदाजा शासक वर्ग को संभवतया नहीं होता। अन्यथा इस पर इतना बेरहम रुख हुकूमत की ओर से अख्तियार नहीं किया जाता।
विपक्ष के बिखराव और खराब सियासी हालात ने कमरतोड़ महंगाई के प्रश्न पर जनमानस के रोष की अभिव्यक्ति को तीव्र कर दिया है। अमीर तबके के और अधिक अमीर हो जाने की अंतहीन लिप्सा की खातिर आम आदमी को निचोड़ा जा रहा है। मार्केट इकोनॉमी के नाम पर अब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बेलगाम कर दिया गया है। समस्याएं और भी हैं, प्रायः सभी राजनीतिक दलों के नेताओं का अपना चरित्र भी कॉर्पोरेट परस्त होता जा रहा है। संसद के सदस्य एकजुट होकर अपना वेतन अब बीस हजार से बढ़ाकर नब्बे हजार कर रहे हैं। सरकारी आंकड़े बयान करते हैं कि गत वर्ष के दौरान खाने-पीने की वस्तुओं के दाम 16.5 की इंफ्लेशन की दर से बढ़े हैं। चीनी के दाम 73 फीसदी, मूंग दाल की कीमत 113 फीसद, उड़द दाल के दाम 71 फीसद, अनाज के दाम 20 फीसद, अरहर दाल की कीमत 58 फीसद और आलू-प्याज के दाम 32 फीसद बढ़ गए हैं। रिटेल के दामों और थोक दामों में भारी अंतर बना ही रहता है। सरकारी आंकड़े महज थोक सूचकांक बताते हैं, जबकि आम आदमी तक माल पहुंचने में बहुत से बिचौलियों और दलालों की जेबें गरम हो चुकी होती हैं। वैसे भी भारत की अर्थव्यवस्था हमेशा ही सटोरियों और बिचौलियों के हाथों में रही है। अपना खून-पसीना एक करके उत्पादन करने वाले किसानों की कमर कर्ज से झुक चुकी है। रिटेल बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम चाहे कुछ भी क्यों न बढ़ जाएँ, किसान वर्ग को इसका फायदा कदाचित नहीं पहुंचता। इतना ही नहीं, धीरे-धीरे उनके हाथ से उनकी जमीन भी छिनती जा रही है।
हिन्दुस्तान के आजाद होने के बाद कृषि और कृषक संबंधी ब्रिटिश राज की रीति-नीति में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। आज भी लगभग वही कानून चल रहे हैं जो अंग्रेजों के शासनकाल में चल रहे थे। देश का 80 करोड़ किसान शासकीय नीति से बाकायदा उपेक्षित है। सरकार दावा रही है कि मूल्यवृद्धि पर काबू पा लिया जाएगा। काले बाजार और काले अघोषित गोदामों में किसान को चावल, चीनी, दाल, गेहूं आदि के जखीरे को दबाकर बाजार में चालू आपूर्ति कम कर दी गई। कुछ अनचाहे सरकारी छापों में ही गोदामों में बाकायदा दबा पड़ा विशाल भंडार दिखाई दे गया। राजकाज और बाजार की मिलीभगत ने अब ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि राज्य व्यवस्था और बाजार के बीच फर्क महज औपचारिकता ही बन कर रह गया है। काली राजनीति का काले धंधे के साथ अवैध समीकरण भारत की जम्हूरियत और राज व्यवस्था का खास चेहरा बन गए हैं। वायदा बाजारों के चलते खाद्य पदार्थों की कीमतें कम नहीं हो पा रही हैं, क्योंकि कीमतें कम होने से बिचौलियों और कृषि कंपनियों को घाटा हो सकता है। हमारे देश में इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि एक तरफ गोदामों में अनाज सड़ रहा है और दूसरी तरफ लोग भुखमरी के शिकार हो रहे हैं। बिचौलिए मालामाल हो रहे हैं और किसान बदहाल हैं। और मोदी जी चाहे कुछ भी कहें यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार अंततः यूपीए सरकार पदचिन्हों पर ही चल रही है।


