जब तक चुनावी मुकाबला काँग्रेस बनाम भाजपा तथा मोदी बनाम राहुल का रूप लेता नजर आ रहा था, भाजपा इस उम्मीद में खुश हो रही थी कि काँग्रेस के खिलाफ जनता के असंतोष को भुनाने में वह कामयाब रहेगी। लेकिन तीसरे मोर्चे के सक्रिय होने के बाद उसका हिसाब-किताब गलत हो गया है।
प्रकाश करात
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस बार चुनाव में मुकाबला दो नहीं, तीन गठबंधनों के बीच होगा-काँग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए, भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए तथा गैरकाँग्रेस, गैरभाजपा पार्टियों का गठबंधन। भाजपा या काँग्रेस हालांकि कुछ महीने पहले तक भी इस तरह के चुनावी मुकाबले की अपेक्षा नहीं कर रही थीं। संघ के हस्तक्षेप से नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रधामनंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद प्रचार का आक्रामक तेवर अपनाया गया था। और जब काँग्रेस ने यह तय कर लिया कि राहुल गांधी काँग्रेस के प्रचार अभियान का नेतृत्व करेंगे, तब चुनावी मुकाबले को कुछ करके दिखाने वाले मोदी बनाम अकुशल राहुल के मुकाबले के रूप में पेश किया जाने लगा। भाजपा के लिये ऐसा मुकाबला आदर्श है, क्योंकि इसमें मोदी का ही पलड़ा भारी रहना है।
लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में चुनावी मुकाबले के इस झूठ की पोल खुल गयी है। यह कोई दो नेताओं, दो पार्टियों और दो गठजोड़ों के बीच का मुकाबला नहीं होने जा रहा। आने वाला लोकसभा चुनाव वस्तुतः अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ने की पृष्ठभूमि में होने जा रहा है। कीमतों में बेलगाम बढ़ोतरी, गरीब किसानों और खेत मजदूरों की रोजी-रोटी छिनने तथा बेरोजगारों की फौज के लगातार बढ़ते जाने के साथ-साथ लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आवास की सुविधाएं गरीबों की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। यह सब नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का ही परिणाम है, जिन्हें मनमोहन सिंह की सरकार जोर-शोर से आगे बढ़ाती रही है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट तथा भारी भ्रष्टाचार इसी के कुपरिणाम हैं। इसका सामाजिक असर महिलाओं पर भयावह हमलों और अपने अधिकारों के लिये लड़ रहे लोगों के नृशंस दमन के रूप में देखा जा सकता है।
काँग्रेस के खिलाफ व्याप्त इस जनाक्रोश को भाजपा भुनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी जो उपचार पेश कर रहे हैं, वह बीमारी से भी बुरा है। वह आक्रामक पूँजीवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो जनता की हालत और बदतर ही करेगा। मोदी के कथित ‘विकास’ एजेंडे के पीछे जहरीली बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता काम कर रही है, जो भ्रष्ट काँग्रेस शासन से पैदा असंतोष से ताकत हासिल करती है। बहरहाल, मोदी और भाजपा की पहुंच सीमित है। अनेक राज्यों में दूसरी ऐसी पार्टियाँ और राजनीतिक ताकतें मौजूद हैं, जो काँग्रेस विरोधी हैं और भाजपा द्वारा पेश किये जा रहे विकल्प से अलग राजनीति करती हैं।
पिछले दो लोकसभा चुनावों में काँग्रेस और भाजपा को मिलकर भी 50 फीसदी से कम वोट मिले थे। 2004 में दोनों पार्टियों के वोट का योग 46.7 फीसदी था और 2009 में 47.4 प्रतिशत। इन चुनावों के बाद हुये राज्य विधानसभाओं के चुनाव ने क्षेत्रीय पर्टियों की ताकत दिखायी है। इनमें अन्नाद्रमुक, सपा, बीजद तथा जदयू जैसी पार्टियों ने गैर काँग्रेसी, गैर भाजपा गठबंधन का हिस्सा बनने का फैसला लिया है। इस प्रयास में जद (सेक्यूलर), अगप तथा झारखंड विकास मोर्चा जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ भी शामिल हैं।
इन पार्टियों के एकजुट होने तथा मीडिया की शब्दावली में तीसरा मोर्चा कायम होने की घोषणा से भाजपा बौखला गयी है। उसकी ओर से तीसरे मोर्चे पर यह कहकर हमला किया जा रहा है कि यह तो 'छलावा' है, यह ‘विफल हो चुका तजुर्बा’ है और ‘जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी’ आदि-आदि। नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह तो ‘तीसरे दर्जे’ का मोर्चा है। भाजपा की ऐसी प्रतिक्रिया का कारण स्पष्ट है। जब तक चुनावी मुकाबला काँग्रेस बनाम भाजपा तथा मोदी बनाम राहुल का रूप लेता नजर आ रहा था, भाजपा इस उम्मीद में खुश हो रही थी कि काँग्रेस के खिलाफ जनता के असंतोष को भुनाने में वह कामयाब रहेगी। लेकिन तीसरे मोर्चे के सक्रिय होने के बाद उसका हिसाब-किताब गलत हो गया है।
भाजपा जहाँ साम्प्रदायिकता को आधार बनाकर एक तानाशाह को पेश करने की कोशिश कर रही है, वहीं गैरकाँग्रेसी धर्मनिरपेक्ष विपक्षी गठबंधन एक भिन्न परिप्रेक्ष्य पर टिका हुआ है। इस मोर्चे में शामिल ग्यारह राजनीतिक पार्टियों ने तय किया है कि संसद् का यह सत्र खत्म होने के बाद एक घोषणापत्र जारी किया जायेगा, जो इस विकल्प की बुनियादी रूपरेखा, इसके सिद्धान्त तथा दिशा स्पष्ट करेगा। इस गठबंधन से जुड़ने वाली पार्टियों की प्रकृति को देखते हुये यह अनिवार्य नहीं है कि इसमें शामिल सभी राजनीतिक दलों के बीच चुनावी गठबंधन या सीटों पर तालमेल हो। चूँकि इनमें से अनेक पार्टियाँ राज्य आधारित हैं, ऐसे में उनका दूसरे राज्यों में अन्य घटक दलों के साथ सीटों पर तालमेल कायम करना व्यावहारिक नहीं होगा।
फिर भी ये सभी पार्टियाँ एक अखिल भारतीय गठबंधन के लिये, अपने-अपने राज्यों की ताकत को एकजुट तो कर ही सकती हैं। इस तरह का गठबंधन, जो काँग्रेस तथा भाजपा के खिलाफ राजनीतिक रुख तथा नीतियों का खाका पेश करेगा, अपने-अपने राज्यों के चुनाव में घटक दलों के प्रयासों को भी मजबूत करेगा। इस तरह का गैर काँग्रेसी, गैर भाजपा मंच काँग्रेस से आजिज आ गयी जनता को विकल्प मुहैया करायेगा और विकल्प पेश करने के भाजपा के दावे की कारगर तरीके से काट भी देगा।
इस तरह के विकल्प का उभरना वस्तुतः देश की ऐसी तमाम धर्मनिरपेक्ष-लोकतान्त्रिक शक्तियों के लिये गोलबन्दी का केन्द्र बनेगा, जो काँग्रेस के शासन का अन्त देखना चाहती हैं, और इसके साथ ही साम्प्रदायिक विचारधारा पर आधारित पार्टी को केन्द्र में सत्ता में आने से किसी भी कीमत पर रोकना चाहती हैं।
(कॉमरेड प्रकाश करात भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव हैं। उनका यह लेख माकपा के मुखपत्र लोकलहर के 10 से 16 फरवरी 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ है, वहीं से साभार)