तुझे हम बली समझते जो न वादाख्वार होता
तुझे हम बली समझते जो न वादाख्वार होता
सुन्दर लोहिया
नरेन्द्र मोदी सरकार के एक तात्कालिक निर्णय का कई लोगों द्वारा स्वागत किया जा रहा है कि नये प्रधानमन्त्री ने मतदाताओं को किये गये वायदों को क्रियान्वित करने की दिशा में विदेशी बैंकों में जमा भारत से गैर कानूनी तरीकों से ले जाया गया धन वापिस लाने के लिए ठोस कदम उठाया है। ऐसे लोगों में स्वामी रामदेव, अन्ना हज़ारे जैसे शामिल हैं, जिन्हें लगता है कि इस धन को वापस लाकर भाजपा देश की जनता को गरीबी से मुक्ति मिल जायेगी।
रामदेव के बयानों के मुताबिक तो जनता को कर के बोझ से ही मुक्ति मिल सकती है।
लेकिन राजनीतिक तौर पर समझदार भाजपा नेताओं ने धन वापसी को अपने चुनाव अभियान में मुद्दा तो बनाया पर उसका इस्तेमाल कैसे होगा इस पर कुछ भी नहीं कहा। यह बात साफ हो गई कि धन को वापिस लाने के लिए रामदेव का मकसद टैक्स से मुक्ति पाने तक सीमित है। और राजनीति के माहिर जानते हैं कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे लोगों को विकास की अफीम चटाई जा सकती है और उस नशें में उनसे वोट बटोरे जा सकते हैं। इसलिए वे इस मुद्दे को शाश्वत समस्या बता कर इसे ज़िन्दा रखने की राजनीति में विश्वास रखते हैं। लेकिन अब क्योंकि सरकार भले ही मोदी की हो लेकिन लोगों ने वोट कमल के निशान पर दिये हैं जो भाजपा का चुनाव चिह्न रहा है इसलिए सरकार की कामयाबी या नाकामयाबी का ठीकरा भी पार्टी के सर ही फोड़ा जायेगा।
इस स्थिति में लालकृष्ण अडवानी और पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ के बयान उनकी जिम्मेवारी की याद दिलाने के लिए लिख रहा हूं।
लोक सभा में अडवानी ने 14 दिसम्बर 2011 को वक्तव्य दिया था कि स्विस बैंकों में 25 लाख करोड़ से ज़्यादा भारत का काला धन जमा है। इस बयान में उनका सुझाव था कि इस वक्त स्वीटज़रलैण्ड के बैंक विश्व स्तर पर बैंक खातों की गोपनीयता के सवाल पर दबाव में है, खासकर कालेधन के मामले में गोपनीयता के इस कानून को निरस्त करने की मुहिम चल रही है। यह ऐसा मौका है जब भारत इसका फायदा उठा कर अपने काले धन को वापिस ला सकता है।
150 दिनों में विदेश में जमा भारत का काला धन वापस लायेंगे!
पार्टी की कालेधन के बारे नीति का बखान करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था कि यदि भाजपा को तीन सौ से ज़्यादा सीटें प्राप्त होंगी तो वे 150 दिनों में विदेश में जमा भारत का काला धन वापस लायेंगे। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने तो अडवानी की बात एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दी लेकिन भारतीय जनता ने भाजपा को 335 सीटें देकर राजनाथसिंह की शर्त पूरी कर दी है अब देखना है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ध्वजवाहक किस हद तक अपने वचन का पालन करते हैं?
हमारे पाठकों को शायद याद होगा कि चुनाव प्रक्रिया शुरु हो जाने के कुछ समय बाद सर्वोच्च न्यायालय से केन्द्र सरकार को निर्देश आया था कि एक सप्ताह के भीतर विदेश में जमा कालेधन की जांच के लिए एसआईटी का गठन करके रिपोर्ट पेश करे। चुनाव प्रक्रिया शुरु हो चुकी थी इसलिए इस निर्देश की अनुपालना आने वाली सरकार की जिम्मेवारी बनती थी जिसे उसने पूरा कर दिया है। इसके लिए नरेन्द्र मोदी सरकार को श्रेय देना उचित नहीं है। ऐसा न करने पर उसे माननीय न्यायालय की अवमानना का दोषी बताया जा सकता था। इस समय देश की जनता को इस अदालत पर भरोसा है और कोई सरकार इस भरोसे के खिलाफ जा नहीं सकती। मीडिया जो लोकतन्त्र का चौथा खम्भा माना जाता है लेकिन इस दौर में उसकी स्वतन्त्रता सवालों के घेरे में आ गई है और यह पत्रकारिता के बजाये भविष्यवक्ता की भूमिका में चला गया है।
यदि सरकार वास्तव में काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या के प्रति ईमानदार है तो उसे विदेश में छुपाये गये धन के साथ-साथ देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से उधार लेकर वापिस न किये गये ऋण को वसूलने का अभियान शुरु करना चाहिये। विदेशी बैंक के बचाव के लिए वहां की सरकार आ गई है और वह बार-बार कह रही है कि जो आंकड़े काले धन के बारे में बताये जा रहे हैं वे काल्पनिक हैं और महज़ प्रचार के लिए हैं। मतलब साफ है कि आसानी से इस मामले में मदद करने वाले नहीं हैं। लेकिन
जो ऋण देसी उद्योगपति ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लिया है और उसे वापिस करने का नाम नहीं ले रहे हैं उनके खिलाफ आसानी से कारवाई की जा सकती है।
हैरानी तो इस बात की है कि दुनिया भर को भ्रष्ट और बेईमान मानने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल भी इन देसी सरमायादारों के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोल पाये। मैं समझता हूं कि इस ऋण की वसूली ज़्यादा ज़रुरी है क्योंकि यह पैसा इस देश के मज़दूर किसान और उन्हीं की तरह मर खप कर पैसा जोड़ने वाले मध्यमवर्ग के लोगों की ईमानदारी पूर्वक कमाई गई धनराशि है इसका महत्त्व भी अधिक है। भले ही व्यक्तिगत तौर पर गरीब जमाकर्ताओं को इससे नुकसान न पहुंचा हो लेकिन वास्तव में जो पैसा देश के विकास के लिए इस्तेमाल होना चाहिए था वह मुनाफाखोरों की तिजोरियों में बन्द हो कर उन्हें और ज़्यादा बेईमानी करने के लिए इस्तेमाल होने लगा। इससे भ्रष्टाचार बढ़ा है।
अगर नरेन्द्र मोदी सरकार सचमुच में भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो उसे इस संदर्भ में कोई ठोस कदम उठाना होगा।
जहां तक मेरे जैसे आमआदमी का सवाल है हमारे पास ज़िन्दगी की हर मुसीबत के मोड़ पर कवियों और शायरों की सधन छांव के अलावा और ठौर नहीं है। इसलिए इस मुसीबत की घड़ी में इस उपमहाद्वीप के शायर गा़लिब की गज़ल की याद आ रही है जिसमें उन्होंने लिखा है-
तेरे वादे पे जिये हम तू ए जान झूठ जाना
खुशी से मर न जाते गर ऐतबार होता
सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।


