तो अमेरिकी प्रेम में बदल जायेगा भाजपा का राष्ट्रप्रेम
तो अमेरिकी प्रेम में बदल जायेगा भाजपा का राष्ट्रप्रेम
शैलेन्द्र चौहान
अमरीका की पूर्व विदेश मन्त्री कोण्डालीजा राइस ने गत दिनों एक समाचार चैनल को दिये साक्षात्कार में भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के पक्ष में यह कहा था कि 2002 में गुजरात में हुआ दंगा अब कोई मुद्दा नहीं रह गया है। और अगर मोदी प्रधानमन्त्री बनते हैं तो अमरीका को कोई ऐतराज नहीं होगा। राइस ने यह भी कहा कि मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद अमरीका को उनके साथ काम करने में कोई दिक़्क़त नहीं होगी। राइस ने यह भी कहा कि हमें पुरानी बातों को पीछे छोड़कर भविष्य के लिये नींव तैयार करना चाहिए। वहीँ मोदी को अमेरिकी वीजा न दिये जाने के विवाद को लेकर पहले अमेरिका ने कहा था कि भाजपा के नरेंद्र मोदी को लेकर वीजा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा। तब दक्षिण एवं मध्य एशिया मामलों की सहायक विदेश मंत्री निशा देसाई बिस्वाल ने संवाददाताओं से कहा था कि मैं यह कहना चाहती हूँ कि वीजा नीति के सन्दर्भ में अमेरिका के नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। सभी लोगों को आवेदन करना होगा और उन्हें समीक्षा प्रक्रिया से गुज़रना होगा।
स्टेट डिपार्टमेंट के अधिकारी ने कहा कि "यह अमरीका और भारत के रिश्तों को लेकर हमारी मुहिम का हिस्सा है। वरिष्ठ राजनेताओं और कारोबारियों से मिलने का सिलसिला पिछले वर्ष नवंबर में शुरू हुआ था।"वहीँ एक अमेरिकी सांसद एफएन फालेओमावेगा ने अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा में दिये अपने संबोधन में कहा, मैं यह पूरी उम्मीद करता हूँ कि अमेरिका अब गुजरात के प्रति नया नजरिया अपनाएगा और गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी के विचारों का पूर्ण और खुले ढंग से समर्थन करेगा, क्योंकि वह घरेलू और विदेशों में नौकरियाँ सृजित करके विश्व अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। अमेरिकी प्रतिनिधिसभा में गैर मतदान प्रतिनिधि फालेओमावेगा अमेरिकी कांग्रेस में अमेरिका सामोआ का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह एशिया, प्रशांत और वैश्विक पर्यावरण की हाउस फॉरेन अफेयर्स सबकमेटी में डेमोक्रेटिक रैंकिंग सदस्य हैं। वह अमेरिकी कांग्रेस के एकमात्र सदस्य हैं, जो 113वीं कांग्रेस में गुजरात के मुख्यमंत्री के खुले समर्थन में सामने आये हैं। गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच करीब 100 अरब डॉलर का सालाना कारोबार है। अमेरिका के लिये भारत की अहमियत उसकी भौगोलिक स्थिति की वजह से भी बढ़ जाती है। एशिया में चीन सबसे मजबूत देश है और अमेरिका भारत के बल पर उसका मुकाबला भी करना चाहता है। गुजरात और अमेरिका के उद्योगपतियों के रिश्ते भी अच्छे रहे हैं। अमेरिकी मोटर कम्पनी फोर्ड इस साल गुजरात में एक संयंत्र लगाना चाहती है। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से भारत और अमरीका के रिश्ते लगातार मज़बूत हो रहे हैं और इसे अधिकांश अमरीकी सांसदों का समर्थन हासिल है लेकिन कुछ अमरीकी मानवधिकार संस्थाएं और सांसद नरेंद्र मोदी के साथ नज़दीकियों के ख़िलाफ़ हैं। वर्ष 2005 में नरेंद्र मोदी के वीज़ा का आवेदन अमरीकी प्रशासन ने रद्द कर दिया था और पिछले साल एक अमरीकी विश्वविद्यालय में भाषण देने के लिये भी उन्हें वीज़ा देने से इनकार कर दिया था। कई मानवाधिकार संगठनों का आरोप रहा है कि मोदी ने गुजरात में साल 2002 के हुये दंगों में उदासीन रवैया अपनाया था। मोदी ने इन आरोपों से इनकार किया है और वह लगातार कहते रहे हैं कि जाँच में उनके ख़िलाफ़ कोई आरोप साबित नहीं हुआ है। विरोधियों का मानना है कि पॉवेल की मोदी के साथ मुलाक़ात से यह संदेश जायेगा कि अमरीका उन्हें वीज़ा जारी करने को तैयार है। अमरीका के अलावा गत वर्षों में मोदी को लेकर यूरोपीय संघ का रुख़ भी कड़ा रहा है। हाल में उनके रुख़ में भी लचीलापन आया है। ब्रिटेन ने सबसे पहले मोदी का बहिष्कार खत्म करने का फैसला किया। ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों और ऑस्ट्रेलिया ने उनसे नजदीकी बढ़ाने की पहल की है। गुजरात दंगों के बाद से ही ब्रिटेन ने मोदी को दरकिनार रखा था। ब्रिटेन के बाद दूसरे यूरोपीय देशों ने भी दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी। ब्रितानी और यूरोप के दूसरे देशों के राजनयिकों ने गुजरात के मुख्यमंत्री से मेलजोल बढ़ा दिया है। पिछले वर्ष भारत की यात्रा पर आये ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भी कहा था कि वे भविष्य में ज़रूर मोदी से मिलना चाहेंगे.कैमरन ने कहा था, "हमने गुजरात सरकार और गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ सम्बंध शुरू किए हैं। हमारे विदेश मंत्री ने उनसे मुलाक़ात की है, हमारे बीच में सम्पर्क हैं, मुझे लगता है कि यह सम्बंध जारी रहने चाहिए। जब कैमरन से पूछा गया कि क्या वे मोदी से मुलाक़ात करेंगे, तो उन्होंने कहा, "भविष्य में ज़रूर, मिलना अच्छा होता है। हम सभी राजनेताओं और नेताओं से मिलना चाहते हैं।" कैमरन ने कहा, "आख़िर यह तो भारत के लोगों को ही तय करना है कि वे किसे चुनते हैं। मैं किसी भी चुने हुये नेता से मिलने के लिये तैयार हूँ।" दर असल यह पश्चिमी देशों की व्यवसायिक रणनीति और कूटनीति का एक तयशुदा हिस्सा है। जो उनके काम का हो उसे ही प्रश्रय दिया जाये। अब भारतीय जनता पार्टी को सोचना है कि उनका राष्ट्रप्रेम, अमेरिकी प्रेम में तो बदलने नहीं जा रहा है। आखिर राजनीति अवसरवाद का दूसरा नाम ही तो है।


