दर्द और जज़्बात का मशहूर शायर, गीतकार निदा फ़ाज़ली (1938-2016)
फ़िरोज़ ख़ान

कभी किसी को मुककमल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता. - निदा फ़ाज़ली

आज सवेरे उठ कर नमाज़ पढ़ कर अपना लेपटॉप ले कर बैठा. जैसे ही फेसबुक का अपना पन्ना खोला तो एक झटका सा लगा. ऐसा लगा जैसे अपने परिवार का कोई सदस्य हमेशा के लिए हमें छोड़ गया. एक ऐसा मित्र जिन से सालों पहले मुंबई में एक मुशायरे में मुलाकात हुई थी. उस के बाद एक ही शहर में रहने के बावजूद अक्सर मुशायरों में मिलते रहते थे. मैं बात कर रहा हूँ जनाब निदा फ़ाज़ली साहब की. निदा फ़ाज़ली मुंबई में 8 फ़रवरी, 2016 को हम सब को अलविदा कर गये. दोस्तों, आज का यह लेख उन्हीं को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा है.
निदा फ़ाज़ली मुशायरों और कवि सम्मेलनों का एक अटूट हिस्सा थे. वह जितना बढ़िया उर्दू में लिखते थे, उतनी ही उनकी पकड़ हिन्दी पर भी थी. वैसे तो हम दोनों हम उम्र थे. वो मुझ से ४ साल बड़े थे. उन की खूबी यह थी कि वह आम आदमी के समझ में आने वाली भाषाओं में लिखते थे. जब उर्दू में लिखा तो फ़ारसी के बड़े भारी शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया. उसी तरह जब हिन्दी में कुछ लिखा तो संस्कृतमयी हिन्दी में नहीं लिखा. यही कारण था कि वे एक तरह से कहें तो मुशायरे लूट लेते थे. गज़ल गायकों के तो वह चहेते थे. उनकी लिखी ग़ज़लों को सबसे अधिक लेजेंडरी जगजीत सिंह ने गाया. उन्होने कई फिल्मों के लिए गीत और ग़ज़लें लिखीं, जो अपने अपने समय में बहुत मशहूर हुईं.

निदा फ़ाज़ली का असली नाम मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली था. दिल्ली में पिता मुर्तुज़ा हसन और माँ जमील फ़ातिमा के घर तीसरी संतान ने जन्म लिया, जिसका नाम बड़े भाई के नाम के क़ाफ़िये से मिला कर मुक़्तदा हसन रखा गया। दिल्ली कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड में इनके जन्म की तारीख १२ अक्टूबर १९३८ लिखवा दी गई। पिता स्वयं भी शायर थे। इन्होंने अपना बाल्यकाल ग्वालियर में गुजारा, जहाँ पर उनकी शिक्षा हुई। उन्होंने १९५८ में ग्वालियर कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से स्नातकोत्तर पढ़ाई पूरी करी।
वो छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। निदा फ़ाज़ली इनका लेखन का नाम है। निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़/ वाय्स। फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है, जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा।
जब वह पढ़ते थे तो उनके सामने की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी जिससे वो एक अनजाना, अनबोला सा रिश्ता अनुभव करने लगे थे। लेकिन एक दिन कॉलेज के बोर्ड पर एक नोटिस दिखा "मिस तोंडों मेट विथ एन एक्सीडेंट एंड हॅज़ एक्ष्पायर्ड" (कुमारी टंडन का एक्सीडेण्ट हुआ और उनका देहान्त हो गया है)। निदा बहुत दु:खी हुए और उन्होंने पाया कि उनका अभी तक का लिखा कुछ भी उनके इस दुख को व्यक्त नहीं कर पा रहा है, ना ही उनको लिखने का जो तरीका आता था उसमें वो कुछ ऐसा लिख पा रहे थे जिससे उनके अंदर का दुख की गिरहें खुलें।
एक दिन सुबह वह एक मंदिर के पास से गुजरे जहाँ पर उन्होंने किसी को सूरदास का भजन मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना, जिसमें कृष्ण के मथुरा से द्वारका चले जाने पर उनके वियोग में डूबी राधा और गोपियाँ फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? वह सुन कर निदा को लगा कि उनके अंदर दबे हुए दुख की गिरहें खुल रही हैं। फिर उन्होंने कबीरदास, तुलसीदास, बाबा फ़रीद इत्यादि कई अन्य कवियों को भी पढ़ा और उन्होंने पाया कि इन कवियों की सीधी-सादी, बिना लाग लपेट की, दो-टूक भाषा में लिखी रचनाएँ अधिक प्रभावकारी हैं जैसे सूरदास की ही उधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अराधै ते ईस॥, न कि मिर्ज़ा ग़ालिब की एब्सट्रैक्ट भाषा में "दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?"। तब से वैसी ही सरल भाषा सदैव के लिए उनकी अपनी शैली बन गई।
हिन्दू-मुस्लिम क़ौमी दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए, लेकिन निदा यहीं भारत में रहे। कमाई की तलाश में कई शहरों में भटके। उस समय बम्बई (मुंबई) हिन्दी/ उर्दू साहित्य का केन्द्र था और वहाँ से धर्मयुग/ सारिका जैसी लोकप्रिय और सम्मानित पत्रिकाएँ छपती थीं तो १९६४ में निदा काम की तलाश में वहाँ चले गए और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ (ब्लिट्ज़) जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे। उनकी सरल और प्रभावकारी लेखन शैली ने शीघ्र ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई। उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह १९६९ में छपा।
फ़िल्म प्रोड्यूसर-निर्देशक-लेखक कमाल अमरोही उन दिनों फ़िल्म रज़िया सुल्ताना (हेमा मालिनी, धर्मेन्द्र अभिनीत) बना रहे थे जिसके गीत जाँनिसार अख़्तर लिख रहे थे जिनका अकस्मात निधन हो गया। जाँनिसार अख़्तर ग्वालियर से ही थे और निदा के लेखन के बारे में जानकारी रखते थे जो उन्होंने शत-प्रतिशत शुद्ध उर्दू बोलने वाले कमाल अमरोही को बताया हुआ था। तब कमाल अमरोही ने उनसे संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म के वो शेष रहे दो गाने लिखने को कहा जो कि उन्होंने लिखे। इस प्रकार उन्होंने फ़िल्मी गीत लेखन प्रारम्भ किया और उसके बाद इन्होने कई हिन्दी फिल्मों के लिये गाने लिखे।
उनकी पुस्तक 'मुलाक़ातें' में उन्होंने उस समय के कई स्थापित लेखकों के बारे मे लिखा और भारतीय लेखन के दरबारी-करण को उजागर किया जिसमें लोग धनवान और राजनीतिक अधिकारयुक्त लोगों से अपने संपर्कों के आधार पर पुरस्कार और सम्मान पाते हैं। इसका बहुत विरोध हुआ और ऐसे कई स्थापित लेखकों ने निदा का बहिष्कार कर दिया और ऐसे सम्मेलनों में सम्मिलित होने से मना कर दिया जिसमें निदा को बुलाया जा रहा हो।
जब वह पाकिस्तान गए तो एक मुशायरे के बाद कट्टरपंथी मुल्लाओं ने उनका घेराव कर लिया और उनके लिखे शेर -

घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो ये कर लें।
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए॥

पर अपना विरोध प्रकट करते हुए उनसे पूछा कि क्या निदा किसी बच्चे को अल्लाह से बड़ा समझते हैं?
निदा फ़ाज़ली ने उत्तर दिया कि मैं केवल इतना जानता हूँ कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं जबकि बच्चे को अल्लाह अपने हाथों से बनाता है।
निदा फ़ाज़ली कई पुरस्कारों से सन्मानित हुए थे. १९९८ में साहित्य अकादमी और २०१३ में पद्मश्री पुरस्कार भी दिए गये थे.
निदा जी के लिखे हुए चन्द शेर:
अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम सफ़र करते हैं,
रुख़ हवाओं का जिधर हो उधर के हम हैं.

इक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया,
कोई जल्दी में कोई देर से जानेवाला.

'हस्तक्षेप' परिवार ऐसे महान शायर और गीतकार को नमन करता है.
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
तब जा के होता है चमन मे दीदावर पैदा.