नई दिल्ली, 13 मई। सहारनपुर में दलितों पर अत्याचार के विरोध में आज दलितों पर अत्याचार विरोधी समन्वय समिति के द्वारा जंतर मंतर पर धरने का आयोजन कर राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया.

धरने पर विभिन्न संगठनों ने हिस्सेदारी की.

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जाति उन्मूलन संगठन ने जे.पी. नरेला ने कहा कि सहारनपुर की घटना पहली और आखरी नहीं है. सदियों से दलितों को दबा कर रखा गया है. इनको नारकीय जीवन जीने पर मजबूर किया गया. अब डा. भीमराव आम्बेडकर की शिक्षाओं की वजह से और पूंजीवादी संसदीय जनतंत्र के कारण दलितों के कुछ हिस्से में अपने अधिकारों को लेकर लड़ने की चेतना जागृत हुई है, भारतीय जाति व्यवस्था में अगड़ी जातियों को यही बात रास नहीं आ रही है। इसी वजह से देश भर में दलितों पर अत्याचारों में बढ़ोतरी हो रही है। सहारनपुर के दलितों में भी जागृति आई है और वे अपनी आजादी के लिए लड़ रहे हैं.

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एन.डी.पी.आई. के अरुण मांझी ने बताया कि आज देश के पैमाने पर जाति मुक्ति संघर्ष चलाने की आवश्यकता है और देश भर में हो रहे दलितों पर अत्याचारों के विरोध में तमाम देश भर में बिखरे तमाम दलित संगठनों को एक झंडे के नीचे आना जरूरी है, तभी दलित उत्पीड़न के खिलाफ एक सुसंगठित संघर्ष चलाया जा सकता है.

पीपुल्स फ्रंट के नरेंदर ने कहा कि इस देश में वर्ग और जाति की एकता के बिना जातिवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता है.

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इंकलाबी मजदूर संगठन के नागेंदर ने बताया कि सहारनपुर और देश के अन्य हिस्सों में हो रहे दलितों पर अत्याचारों के विरोध में आज एक बड़ी एकता की आवश्यकता है.

सामाजिक न्याय मोर्चे की और से आफताब ने कहा कि दलित समुदाय के पास लड़ने अलावा कोई भी रास्ता नहीं है, जो उसकी पुरानी रूढ़िवादी, जातिवादी जंजीरों से मुक्ति दिला सके और सहारनपुर के दलितों के संघर्ष के साथ हम कदम से कदम मिलकर आगे बढ़ेंगे.