रूपेश श्रोती
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता
(दाग)
जयपुर लेट्रेचर फेस्टिवल में ऐसा ही हुआ। जयपुर का नाम हुआ। साहित्यकार आए। कहानी कार आए। राजनेता आए। सब आए, जो नहीं आए, तो सलमान रूश्दी नहीं आए। जो नहीं तो आए, और आए भी। फेस्टिवल में वे शरीर से नहीं आए। पर वे, उनकी किताब और उनके विवाद फेस्टिवल में बने रहे। पर अब जो नहीं हुआ तो उसके लिए क्या गिला और क्या शिकवा। कोशिश तो बहुत हुई पर सनम का दीदार नहीं हुआ। तकनीक के जरिए सलमान को शामिल करने का नुस्खा भी निकाला गया। पर हाय री ! किस्मत जुवां से यही निकला-
तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी जिन्दगी का हमें ऐतबार होता
(दाग)
हाल दिल बुरा हुआ, दाग भी लगे, बदनाम भी हुए। जी हां। जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में ऐसा ही हुआ है। सब हुआ। मशहूर हुए। पर दाग लग गए। ये दाग ऐसे हैं जिससे फेस्टिवल दागदार हो गया। और सवाल छोड़ गया। क्या ये होना जरूरी था। एक फांस सी रह गई आयोजकों और सलमान रूश्दी के मन में। अगर दाग की बात की जाए तो सलमान रूश्दी ने टि्वट करके पूरी दुनिया में बता दिया कि राजस्थान पुलिस ने उनको गुमराह किया। यानि राजस्थान पुलिस भरोसे के लायक नहीं है। ऐसी पुलिस से सलमान रूश्दी यही कहते नजर आए।
आरजू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई
(दाग)
पर क्या करें। उनको गुस्सा आया। राज्य सरकार ने अपनी सफाई दी। और बता दिया कि उनको केन्द्र सरकार ने पत्र लिखकर हत्या की आशंका जताई थी।
सलमान के विवाद में फंसने का मन सरकार का नहीं था। दूर से ही तौबा कर रही थी। पर कहने वाले तो कह गए। सब खातिर हुआ वोट बैंक के। सलमान रूश्दी 2007 में भी जयपुर आए थे। तब किसी ने कुछ नहीं कहा। अब क्यों हुआ ? दाग लगा कांग्रेस पर। उत्तरप्रदेश में चुनाव हो रहे हैं। यहां कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। संगठनों ने विरोध किया। तो वोट बैंक बचाने के लिए केन्द्र और राज्य की कांग्रेस सरकार ने साजिश रची। संगठनों के विरोध को सुना।
जमहूरियत एक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें
बंदो को गिना करते हैं तोला नहीं करते।
(दाग)
बात गिनने की ही होती है चुनाव में। तभी तो बनता है वोट बैंक। राजनीति की ताकत संख्या में ही होती है। अगर पक्ष में मतदान करने वाले की संख्या नहीं तो पार्टी का वजूद क्या ?
ख्वाब बिकता है जब वो खूबसूरत होता है। जी हां. ऐसा ही कुछ नजर आया जयपुर लेट्रेचर फेस्टिवल में भी। ये दाग खूबसूरती के कारण खूबसूरत तरीके का है। फेस्टिवल में खूबसूरत सा मंच और खूबसूरत लोग नजर आए। खूबसूरती की तादाद में अपना पन नहीं था। सब कुछ बेगाना सा था। बेगाना होने की वजह भी थी। साहित्यकारों के मुंह से निकलने वाले “बोलों” को मंच के सामने ही जमीं नहीं मिल रही थी। उनके मुंह से निकले शब्द फेस्टिवल परिसर में लगे बुक स्टाल्स पर औंधे मुंह गिरे पड़े थे। शब्द हंस रहे थे। कह रहे थे जिसने मुझे जुबान दी। उसमें दम नहीं था। तभी तो मैं उनके मुंह से निकलकर भी अपनी जमीं नहीं पा पाया। जी हां। हिंदी को बढ़ाना है। बच्चे हमारे साहित्य पढ़े, हिंदी में। पर हिंदी की किताबें गायब थी बुक स्टाल्स से। हिंदी के कुछ ही साहित्यकार नजर आ रहे थे। यहां अंग्रेजी, हिंदी और ऊर्दू दोनों पर हावी रही।
उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'
हिन्दुस्तां में धूम हमारी ज़बां की है।
(दाग)
पर आज इंडिया में इसकी कमी सी है। अब वो दौर नहीं है। क्या करें, दाग देहलवी साहब ? आपके वक्त और अबके वक्त में फर्क आ गया है।
मीडिया पर भी ये फेस्टीवल दाग छोड़ गया..एक चुडैल ने ऐसा किया।
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई
(दाग)
जी हां, ये जन्नत हैं शबाना आजमी। शबाना आजमी हूर की परी हैं या चुडैल इस पर भी चर्चा हो गई फेस्टिवल में। सुनो कहानी, सुनो सत्र में गुलजार मुखातिब हुए बच्चों से। बच्चों से पूछा कि आपकी चुडैल कैसी है ? बच्चों ने जवाब अपना-अपना दिया। पर गुलजार को पसंद थी मकड़ी फिल्म की चुडैल (शबाना)। शबाना की तारीफ चुडैल के रूप में हुई। पर साहित्य को बच्चों से जुदा कर रही है टीवी। इसलिए गुलजार ने कह दिया टीवी हमारी चुडैल है। इसकी रिपोर्टिंग हुई। तो अखबारों की हैडलाइन भी बन गई। प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मारकंडेय काटजू ने इस हैडलाइन को पकड़ लिया। इस हैडलाइन को कोट करते हुए कह गए। मीडिया अफीम खिला रहा है दर्शकों को। इसके परिणाम ठीक नहीं होंगे। यानि दाग लगा मीडिया पर।
साहित्य के सम्मेलन का नाम जयपुर से जोड़ा गया। जयपुर यानि राजस्थान। पर यहां राजस्थानी भाषा और इसकी संस्कृति को नहीं समझा गया। जयपुर साहित्य सम्मेलन। ये नाम क्यों है ? दरअसल इसके दो कारण है। एक तो विदेशी जयपुर और राजस्थान से सम्मोहित होते हैं। वे राजस्थान को जानना चाहते हैं। इसलिए वे राजस्थान आना चाहते हैं। जयपुर से इस सम्मेलन को जोड़कर रखने का केवल यही मकसद था। बस, इसके अलावा राजस्थानी साहित्य और राजस्थान से, सम्मेलन का कोई लेना देना नहीं रहा। तभी तो इतने बड़े सम्मेलन में राजस्थानी साहित्य के पितामह विजयदान देथा नहीं आए। या उनको याद नहीं किया गया। सलमान रूश्दी ने वो नहीं किया जो देथा ने राजस्थानी साहित्य के लिए किया है। हालांकि देथा जी ने कहा मुझे बुलावा मिला था। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मैं नहीं आ सका। कोशिश होती तो वे शामिल हो जाते वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए। पर सलमान रूश्दी ने सबको व्यस्त करके रखा था। अब ये दाग कैसे धुलेगा ये आयोजक ही बता सकते हैं।
फेस्टिवल का एक सच और भी है। जो अनुपम खैर बता गए। उनसे सलमान रूश्दी के बारे में मीडिया ने पूछा। वे कह गए। भाई, मुझे सलमान रूश्दी से क्या करना है ? मैं तो अपनी किताब बेचने के लिए यहां आया हूं। इकराम राजथानी ने भी साहित्य के ठेकेदारों का सच बताया। कह गए, इस ठेकेदारी का टेंडर कब निकला, ये उनको पता नहीं चला।
जयपुर लिट्रेरेचर फेस्टीवल के दाग अब सबके सामने हैं। मोमिन सच कहते हैं।
कुछ लोग हैं खामोश
मगर सोच रहे हैं
सच बोलेंगे तब
सच के जब दाम बढेंगे।
रूपेश श्रोती, लेखक इंडिया न्यूज (राजस्थान) में आउटपुट हेड हैं।