दाग़ देहलवी के शहर में देल्ही बेली
दाग़ देहलवी के शहर में देल्ही बेली
अभिषेक रंजन सिंह
सिनेमा और साहित्य समाज के दर्पण होते हैं। समाज की दिशा तय करने में सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लेकिन, फिल्म ‘ देल्ही बेली’ में जिस तरह अनावश्यक रूप से असभ्य और अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। उससे एक सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाता है। कोई शहर कितना बदला या उसकी संस्कृति या उसके मिजाज में कितना फर्क आया इसकी गवाही समकालीन फिल्म और साहित्य ही बेहतर तरीके से दे सकते हैं।
‘ देल्ही बेली’ फिल्म की धूम इन दिनों देश के हर छोटे- बड़े शहरों में सुनाई दे रहा है साथ ही इसके विरोध में भी कई स्वर उठ रहे हैं। हालांकि, दिल्ली के लिए इस फिल्म के कुछ अलग ही मायने हैं। देखा जाए तो दिल्ली के लोगों खासकर युवाओं के लिए यह फिल्म किसी दीवानगी से कम नहीं है। दिल्ली के युवाओं में ‘ देल्ही बेली’ की खातिर पैदा हुए इस जुनून की पहली वजह है- फिल्म का नाम, जो देल्ही बेली है। दूसरी वजह है इस फिल्म की कहानी और संवाद की भाषा जो अमूमन दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में पढ़े-लिखे लोगों के बीच बोली और समझी जाती है। इस फिल्म के रिलीज होने से पहले ही मीडिया खासकर न्यूज चैनलों ने इसका महिमामंडन शुरू कर दिया। जिस दिन यह फिल्म रिलीज हुई दिल्ली के मल्टीपलेक्स मालिकों ने जमकर चांदी काटी। नौजवान युवक और युवतियां अपने समूह मित्रों के साथ इस फिल्म का लुत्फ उठाया। लगभग डेढ़ घंटे की इस फिल्म में शायद कोई ही ऐसा वाक्य रहा होगा, जिसमें भद्दी गालियों का इस्तेमाल न हुआ हो। मैने देखा कि गाली युक्त हर संवाद में सिनेमाहॉल में बैठे दर्शकों ने उन गालियों को अपनी तालियों से खूब सराहा। इस फिल्म के किरदार में संभवतः उन्हें अपना अक्स जरूर दिखता होगा, क्योंकि अमूमन ऐसी भाषा और विवाह पूर्व शारीरिक संबंध स्थापित करना इन युवाओं का खास शगल बन चुका है।
हालांकि, इस फिल्म के डायलॉग और बोल्ड सीन को लेकर देश के कई संगठनों में गहरी नाराजगी है। वहीं पड़ोसी देश नेपाल में भी पिछले दिनों काफी देल्ही बेली को लेकर काफी खींचतान हुई। नतीजतन नेपाल सेंसर बोर्ड ने अपनी कैंची चलाने के बाद ही इस फिल्म को दिखाए जाने की मंजूरी दी। जबकि, पाकिस्तान जहां भारतीय फिल्में बेहद लोकप्रिय है, वहां इस फिल्म को अंततः मंजूरी नहीं मिल सकी। तीसरी जो अहम बात है इस फिल्म की, जिस पर भी कई लोगों एतराज है वह है फिल्म की भाषा, जो अंग्रेजी-हिंदी मिश्रित है, जिसे हम हिंग्लिश के रूप में जानते हैं। कई साहित्यकार और बुद्धिजीवी पत्रकारों ने इसे भाषा पर हमला करार दिया है। उनका मानना है कि देल्ही बेली के जरिए महात्वाकांक्षी फिल्म निर्देशकों ने देश में अंग्रेजी फिल्मों का आगाज कर दिया है।
मिर्ज़ा दाग देहलवी
हालांकि, उनका यह एतराज जायज है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से बन रही हिंदी फिल्मों की भाषा पर ध्यान दें, तो आप पाएंगे कि उनमें अंग्रेजी के शब्दों का चलन बढ़ गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में बनी फिल्म देल्ही बेली भारतीय हिंदी सिनेमा की एक नई और गंदी शुरुआत कही जा सकती है। निश्चित ही इसकी कामयाबी एक नए चलन को जन्म दगी, जिसके परिणामस्वरूप मुंबई का हिंदी फिल्म उद्योग प्रभावित होगा।
जाहिर सी बात है भारतीय सिनेमा के आम दर्शकों पर भी इसका गहरा असर होगा, क्योंकि उन्होंने न तो अब तक फिल्मों में ऐसी भाषा सुनी है और न ऐसे दृश्य देखे हैं। अभी तक हम गालियों के इस्तेमाल से उद्वेलित होते रहे हैं। जबकि, इसमें तो गाली के साथ गलीज दृश्य भी हैं। इस फिल्म के लेखक-निर्देशक ने रचनात्मक शिष्टता का पालन नहीं किया है। वहीं इसके बरक्स इस फिल्म के निर्देशक आमिर खान बड़ी बेशर्मी के साथ यह कहते नहीं थकते कि देल्ही बेली आज के युवा दर्शकों के मिजाज के मुताबिक बनाई गई है। उनके मुताबिक इस फिल्म से युवाओं की अभिव्यक्ति क्षमता मजबूत होगी। बहरहाल, इस जानिब जनाब आमिर खान जो सोचें, लेकिन बहुतेरे लोग उनकी इस घटिया और निम्न दर्जे की दलील से कतई सहमत नहीं होगें। क्योंकि, देल्ही बेली में अपशब्दों को पूरे अर्थ विन्यास के साथ प्रस्तुत किया गया है। फिल्म की भाषा अंग्रेजी शायद इसी नजरिए से रखी गई है, ताकि बगैर हिचक के फूहड़ और द्विअर्थी शब्दों का इस्तेमाल फिल्म में किया जा सके।
हिंदी सिनेमा में नई सोच, नए प्रयोगों के आधार पर अगर कोई देल्ही बेली को स्तरीय फिल्म मानते हैं तो यह हमारे हिंदी सिनेमा का स्खलन काल ही कहा जाएगा। इसके अलावा भविष्य में फिल्म निर्देशक बनने की चाहत रखने वाले महानुभाव भी इसके लिए तैयार रहें कि अब उन्हें अपशब्दों का शब्दकोष कंठस्थ करना होगा। देखा जाए तो हिंदी सिनेमा की पतनगाथा आज की तारीख में खुद फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक ही लिख रहे हैं। जिस तरह दोयम दर्जे की फिल्में वो बना रहे हैं, उसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि समाज को दिशा देने में फिल्म का कोई योगदान भी रह गया है। लेकिन इस बात का उन्हें कोई मलाल भी नहीं है। फिल्म के हिट होने और उससे होने वाली बेशुमार कमाई को ही वे अपनी कामयाबी मानते हैं। परंतु सभी जानते हैं कि, इन दिनों फिल्मों और उसके गानों के हिट होने की असल वजह क्या है ? शीला की जवानी…. और मुन्नी बदनाम हुई….जैसे गाने को सुपरहिट बनाने में टीवी न्यूज चैनलों ने भी अपनी जबर्दस्त भूमिका निभाई है। लेकिन आज से कई दशक पहले जब तीसरी कसम, दो बीघा जमीन और मदर इंडिया फिल्म बनी थी। तब इस फिल्म को शहर और गांव के संजीदा दर्शकों ने इसे कई युगों तक के लिए हिट बना दिया। किसी न्यूज चैनल के भरोसे ये फिल्में मशहूर नहीं हुई थी। यही वजह है कि ऐसी फिल्मों की प्रासंगिकता कालजयी साहित्य की तरह आज भी कायम है।
फिल्म और कारोबार का रिश्ता उन दिनों भी था। बावजूद इसके सामाजिक मूल्यों की परख करना उस दौर के फिल्म निर्माता बखूबी जानते थे। शायद यही कारण है कि 21 वीं सदी में भी वे तमाम पुराने गीत आज के जमाने की इन नए गानों से ज्यादा जवान और कर्णप्रिय हैं। आखिर क्या वजह है कि नब्बे के दशक के बाद बनी ज्यादातर फिल्में चंद महीनों में ही गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं ?
कुछ साल पहले तक पर्दे पर फिल्मों के नाम अंग्रेजी के अलावा हिंदी और उर्दू में भी दिखते थे, लेकिन अब वे रूपहले पर्दे से गायब हो चुकी हैं। हिंदी भाषा की इस उपेक्षा पर चिंता करना लाजिमी है। देल्ही बेली फिल्म देखने के बाद ऐसा लगता है कि दिल्ली में वही तहजीब दिखती है, जो इस फिल्म में दिखाई गई है। अक्सर दिल्ली के बारे में कहा और सुना जाता है कि यह शहर कई दफा उजाड़ी और बसाई गई है। इस शहर की संस्कृति, रहन-सहन, भाषा, तहजीब समय-समय पर बदली है। एक जमाने में दिल्ली तहजीबों के शहर में शुमार होती थी। बात अगर उर्दू अदब और तहजीब की करें तो लोग बाग आज भी दिल्ली की तुलना लखनऊ, हैदराबाद, निजामाबाद और लाहौर से करते हैं। क्योंकि, यह शहर गंगा-जमुनी तहजीब की रवायत है और पूरा आलम इसकी इस रवायत पर रश्क करता है। यह अलग बात है कि बदलते वक्त के साथ दिल्ली में तब्दीलियां भी आई हैं, लेकिन उसकी तासीर आज भी मौजूद है। जिसे लाख कोशिशों के बाद भी मिटाया नहीं जा सकता।
63 साल पहले मुल्क का बंटवारा होने पर संस्कृतियां भी विभाजित हुई। आबादी में काफी उलटफेर आया। उर्दू और खड़ी बोली जानने वाले दानिशमंद लोग पाकिस्तान पलायन कर गए। उसी तरह पाकिस्तान से भी लाखों की संख्या में लोग दिल्ली आकर बस गए। बेशक, धीरे-धीरे इस शहर की भाषा भी बदलने लगी। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन दिनों दिल्ली में उर्दू और फारसी का दौर था। मध्यकाल के दौरान भारत में सूफी परंपरा विकसित हुई, जिसे हम गंगा-जमुनी तहजीब भी कहते हैं। चूंकि दिल्ली इसका केंद्र रहा इसलिए जब भी इनका जिक्र आता है तो दिल्ली का नाम बड़े ही अदब से लिया जाता है। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण हिंदी सिनेमा के निर्देशकों के दिल में शहर-ए-दिल्ली ने हमेशा राज किया है। फिल्म के किरदारों, कहानियों और गीतों के माध्यम से हमेशा निर्देशकों का दिल्ली चलो अभियान जारी रहा। दरअसल, दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि पूरे भारत का दिल है। यहां पूरे भारत की संस्कृति देखने को मिलती है। इस दिल्ली शहर के एक नहीं बल्कि कई रूप हैं। शायद यही कारण है कि हिंदी सिनेमा ने दिल्ली की तहजीब का गुणगान हमेशा किया है। निर्देशकों का मानना है कि दिल्ली में कुछ तो खास है। इस शहर की फिजां में कुछ तो बात है जो यह शहर दर्शकों और निर्देशकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। फिल्मकारों ने अब तक न जाने कितनी बार दिल्ली को अपने सिनेमा दिखाया, बावजूद इसके न दर्शक दिल्ली से बोर हुए हैं और न ही सिनेमावालों का दिल दिल्ली से दूर हुआ है। कितनी फिल्मों के नाम दिल्ली पर रखे जा चुके हैं। निर्देशक दिल्ली के मशहूर जगह को फिल्माने में कोई कंजूसी नहीं की। उन्होंने अपना कैमरे को इंडिया गेट, पुराना किला, कुतुबमीनार, जामा मस्जिद से लेकर दिल्ली की पराठेवाली गली में जा पहुंचाया है। लेकिन आमिर खान को अपनी फिल्म देल्ही बेली बनाने से पहले में दिल्ली की ये खूबियां नजर नहीं आई, जिसके लिए हमारी दिल्ली जानी जाती है। आमिर खान बेशक, उन सफल फिल्म अभिनेता और निर्देशक के रूप में शुमार हैं, जिन्होंने देश को काफी बेहतरीन फिल्में दी हैं। लेकिन, देल्ही बेली फिल्म बनाकर उन्होंने अपनी छवि खुद ही धूमिल कर ली। उनके करोड़ों प्रशंसक, जिन्होंने उनकी बनाई लगान, तारे जमीं पर जैसी अच्छी फिल्में देखी होगी। वे तमाम लोग देल्ही बेली फिल्म देखने के बाद निश्चित तौर पर निराश हुए होंगे कि जिस पुरानी दिल्ली को आमिर खान ने अपनी फिल्म में फिल्माया है, असल में उस पुरानी दिल्ली को उन्होंने कायदे से समझा ही नहीं, वरना ऐसी फिल्म बनाकर वो अपनी भद नहीं पिटवाते।


