प्रकाश कारात
पिछले कुछ अर्से में यह तो पूरी तरह से साफ ही हो चुका था कि भाजपा, उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए, ‘‘गोमांस की राजनीति’’ का इस्तेमाल करने जा रही है। दादरी के बिसाहड़ा गांव में, पिछले साल सितंबर के महीने में मोहम्मद अखलाक की उसके घर में घुसकर हत्या कर दी गयी थी। हत्यारी भीड़ का आरोप था कि उसके पास गोमांस तथा उसके घर में गोमांस खाया गया था। इस बर्बर हत्या के सिलसिले में 18 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें कुछ भाजपा के लोग भी शामिल हैं। अब उन पर अखलाक की हत्या का मामला चल रहा है।
पिछले सप्ताह, मथुरा की अपराध शोध प्रयोगशाला की, मांस के एक टुकड़े की जांच की रिपोर्ट सामने आयी है, जो अखलाक के घर दूर, एक सार्वजनिक स्थल पर पाया गया था। इस रिपोर्ट के इस निष्कर्ष को हथियार बनाकर कि यह ‘‘गाय या गाए की संतति’’ का मांस है, भाजपा के नेताओं ने, जिनमें केंद्र सरकार के मंत्री भी शामिल हैं, इसकी सुनियोजित कोशिश शुरू कर दी है कि मुद्दे को अखलाक की जगह, गोमांस खाने के मामले की ओर मोड़ दिया जाए।
पहली बात तो यह कि मथुरा की प्रयोगशाला की रिपोर्ट जिन परिस्थितियों में सार्वजनिक हुई है, वे खुद ही संदेह पैदा करने वाली हैं। याद रहे कि घटना के कुछ ही समय बाद आयी दादरी के सरकारी पशु चिकित्सालय के डाक्टर की प्राथमिक रिपोर्ट में मांस के संबंधित नमूने को ‘‘बकरी प्रजाति’’ का मांस बताया गया था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, अखिलेश यादव ने भी मथुरा की प्रयोगशाला की रिपोर्ट की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं।

याद रहे कि मथुरा की प्रयोगशाला ने मांस के जिस नमूने का परीक्षण किया था, वह कोई अखलाक के घर के फ्रिज से निकला मांस नहीं था बल्कि उसके घर से बाहर पड़ा पाया गया था। वैसे भी उत्तर प्रदेश में गोमांस रखने पर किसी भी तरह की कानूनी रोक नहीं है।
इसके बावजूद, मथुरा की प्रयोगशाला की रिपोर्ट को हथियार बनाकर भाजपा के नेताओं ने इसके प्रचार की सुनियोजित मुहिम छेड़ दी है कि अखलाक के घर पर गाय काटी गयी थी और उसका मांस बिसाहड़ा गांव के मुसलमान घरों में बांटा गया था। भाजपा के सांसद तथा घोर हिंदू कट्टरतावादी, योगी आदित्यनाथ ने मांग की है कि अखलाक के परिवार के खिलाफ गोहत्या का मामला दर्ज किया जाए और अखलाक की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए निर्दोष हिंदुओं को छोड़ा जाए।
उधर केंद्रीय संस्कृति मंत्री, महेश शर्मा ने मथुरा प्रयोगशाला की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की आलोचना की है और मुजफ्फरनगर के दंगों में अपनी भूमिका के लिए कुख्यात, केंद्रीय मंत्री संजीव बलियान ने मांग की है कि इसकी जांच करायी जानी चाहिए कि कथित रूप से वहां काटी गयी गाय का मांस किस-किस ने खाया था।
बिसाहड़ा गांव में, निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद 6 जून को एक महापंचायत की गयी। इस सभा में, जिसमें भाजपा तथा शिव सेना के स्थानीय नेताओं ने हिस्सा लिया, यह मांग रखी गयी कि 20 दिन के अंदर-अंदर, अखलाक के परिवार के लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए जाएं। यह धमकी दी गयी कि इस अवधि में यह कार्रवाई नहीं की गयी तो ‘‘जनता के आक्रोष’’ को नहीं रोका जा सकेगा। इस सभा मे जो कुछ कहा गया उसका कुल मिलाकर यह अर्थ था कि कथित रूप से गाय की ‘‘हत्या’’ करने वाले ही असली अपराधी हैं, न कि कथित रूप से गाय की हत्या करने वाले की हत्या करने वाले!
भाजपा अध्यक्ष, अमित शाह ने संजीव बलियान के उकसावेपूर्ण बयान की निंदा करने से इंकार कर दिया है। इसके संबंध में पूछे जाने पर, भाजपा अध्यक्ष ने सिर्फ इतना कहा कि उन्होंने मथुरा की प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर अपने विचार व्यक्त किए होंगे।
साफ है कि भाजपा का नेतृत्व दादरी के कथित गोमांस के मुद्दे को, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाने पर तुला हुआ है। यह शरारतपूर्ण खेल इसे ध्यान में रखकर खेला जा रहा है कि अगले साल के आरंभ में उत्तर प्रदेश में विधानसभाई चुनाव होने हैं। याद रहे कि दादरी की घटना के कुछ ही सप्ताह बाद हुए बिहार के चुनावों में भाजपा ने गोहत्या तथा गोमांस के मुद्दे को भुनाने की कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि बिहार की जनता ने उनके इस विघटनकारी एजेंडा को नकार दिया। लेकिन, इस तरह के बेशर्म तथा विभाजनकारी हथकंडों का असर सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रहता है। इनके जरिए समाज में सांप्रदायिक जहर फैलाया जा रहा होता है, जिसके सत्यानाशी नतीजे होते हैं। यही सांप्रदायिक जहर, झारखंड में लातेहर में दो मुस्लिम मवेशी व्यापारियों की पीट-पीटकर हत्या कर दिए जाने तथा बाद में उन्हें फंदे से लटका दिए जाने जैसे जघन्य अपराधों के लिए जिम्मेदार है। उक्त घटना में जान गंवाने वालों में एक तेरह वर्षीय बच्चा भी था।
केंद्र की मोदी सरकार को अंतत: तो अपने मंत्रियों तथा सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की घृणा की बोली तथा सांप्रदायिक भावनाएं उकसाने की हरकतों की कीमत चुकानी ही पड़ेगी। चुनाव आते-जाते रहते हैं, लेकिन देश की जनता भाजपा पर इसके लिए फैसला जरूर सुनाएगी कि उसने अपने हाथ में आयी सरकारी शक्ति का प्रयोग जनता को विभाजित करने के लिए, लोगों की ज़िंदगियों को खतरे में डालने लिए और शांति तथा सौहार्द्र में खलल डालने के लिए किया है।