शुचिता मिश्रा

आज एक शान्ति का अहसास हो रहा है, देर से ही सही, लेकिन तुम्हें इंसाफ तो मिला। यह सच है कि 16 दिसम्बर की उस रात के सदमे से मैं अब तक उभर नहीं पाया हूँ। कितना लाचार, कितना मजबूर था मैं। खुद को हर पल धिक्कार रहा था मैं, जब मैंने तुम्हारी अस्थियों को एक पोटली में बँधा देखा। मैं चीख रहा था, खुद को कोस रहा था, जी कर रहा था कि अभी सूख जाऊँ, भरभरा कर गिर जाऊँ, मेरी खुशबू जो लोगों को सुकून देती है, उससे घृणा होने लगी थी मुझे। मैं वही अभागा गुलाब था, जिसे तुमने अपनी माँ के साथ मिलकर अपने नन्हें-नन्हें हाथों से अपने आँगन में लगाया था।

कितना उत्साह होता था तुम्हारी आँखों में, जब तुम मुझमें पानी देती थीं, इसलिये, कि मैं जल्दी से बड़ा हो जाऊँ। आठ बरस की थीं तुम, जब तुम्हारे दोस्त खेलने तुम्हारे आँगन में आते थे, और मेरी नाजुक पँखुड़ियों को छूने का प्रयास करते, मैं ठिठुर जाता था। तुम मेरी संवेदना को समझ लेती थीं और उनसे झगड़ा कर लेती थीं। शाम होते ही तुम रोज मेरे पास आतीं, मुझे निहारतीं और मुझसे ढेर सारी बाते करतीं। मैं मूक साथी बनकर सब कुछ चुपचाप सुनता। जब तुम बड़ी हुयीं तो तुम्हारी माँ तुम्हारे यौवन को देख तुम पर रोक-टोक लगाने लगी थीं। वह तुमसे प्रेम तो करती थीं, पर इस जमाने से डरती थीं। पर तुम हिम्मती थीं, माँ की इन बातों को दरकिनार कर, तुमने स्वयं को आत्मनिर्भर बनाया था। ज़िन्दगी से बहुत प्यार था तुम्हें, हर रोज एक नए उत्साह के साथ तुम अपना दिन बिताती थीं, और सूरज ढलते ही मेरे पास आकर मुझे तरह-तरह के किस्से सुनातीं थीं। धीरे-धीरे तुम्हारे हर सुख-दुख का साथी बन गया था मैं। तुमसे बेइन्तहा प्रेम करने लगा था मैं। जब भी तुम घर से निकलतीं, मैं बेसब्री से तुम्हारे घर लौटने का इन्तजार करता। पर उस रात जब तुम नहीं लौटीं तो डर गया था मैं। एक अजब सन्नाटा था चारों ओर। लोग तुम्हारी तलाश कर रहे थे, पर तुम्हारा कुछ पता नहीं चल रहा था। कुछ लोग मेरे पास खड़े होकर तुम्हारे लिये उलटी सीधी बातें कर रहे थे । तुम्हें देर रात बाहर नहीं जाना चाहिये था, उस बस में नहीं चढ़ना चाहिये था वगैरह-वगैरह। मैं समझ रहा था कुछ तो गम्भीर मसला है, पर भला मुझे कोई क्यों बताता। एक तुम ही थीं जो मुझसे अपने हर व्यथा सुनाती थीं, मेरा खयाल रखती थीं। मुझे गुस्सा आ रहा था। किसी को तुम्हारी उस पीड़ा का अहसास नहीं था जब उन बहशी दरिन्दों ने तुम्हारे नाजुक हाथ को पकड़कर घसीटा था। वे 6 मिलकर तुम पर वार कर रहे थे। अमानवीय कृत्य की सारी हदें उन्होंने पार कर दी थीं। तुम स्वयं को बचाने का प्रयास कर रही थीं। तुम पीड़ा और अपमान से चिल्ला रही थीं। तुम्हारे मित्र के साथ, उन्होंने तुम्हें चलती बस से फेंक दिया था। निर्वस्त्र हालत में सड़क पर पड़ी तुम कराह रही थीं और उन दरिन्दों को तनिक भी अपने कुकृत्य पर पछतावा नहीं था। अरे! कोई तो मेरी आवाज सुनो, मैं रो रहा हूँ, कोई तो मेरे दर्द को समझो... ऐसे लोगों को जीने का कोई हक नहीं है। तुम बहादुर थीं। तुमने आखिरी साँस तक अपनी लड़ाई लड़ी। अपनी लड़ाई से तुमने पूरे देश को जगा दिया। हर तरफ से तुम्हारे लिए न्याय की माँग उठ रही थी। आज नौ महीने बाद तुम उस लड़ाई में विजयी हुयी हो। मालूम है मुझे, अब तक इस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं तुम, पर मेरी नजर में आज भी तुम मरी नहीं हो। सभी के दिलों में जिन्दा हो। इस देश की हर लड़की की पीड़ा का पर्याय बनी हो तुम। सबकी प्रेरणा बनी हो तुम। तुम्हारे जाने के बाद जो सन्नाटा पसरा था, आज वह शान्ति और सुकू न में तब्दील हो रहा है। तुमने जाने के बाद भी पुरुष प्रभुतावाद को मुँहतोड़ जवाब दिया है। मैं बेबस गुलाब तुम्हारे लिये कुछ नहीं कर पाया, पर तुम्हारे दर्द को मैंने महसूस किया है। मुझे माफ कर देना मैं तुम्हारे लिये कुछ नहीं कर सका। पर आज अपनी हर पँखुड़ी को मैं तुम पर न्योछावर करता हूँ, तुम्हें डबडबायी आँखों और भरे दिल से श्रद्धान्जलि देता हूँ।