दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक विरासत की पहचान उस्ताद मेहंदी हसन खान

रोमा और अशोक चौधरी

किसी भी देश की पहचान उसकी सांस्कृतिक विरासत से होती है, जो कि एक विशेष समयकाल में सामाजिक रंगनैतक परिस्थितियों को प्रभावित करती है। यूं तो दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप का रूढ़िवादीकरण के खिलाफ अपनी एक सांस्कृतिक विरासत है जिसका 700 साल का सुनहरा इतिहास है। उसी विरासत को उस्ताद मेहंदी हसन खान जैसे फ़नकारों ने जिंदा रखा और पूरे दक्षिण एशिया उपमहाद्वीप को अपनी नायाब गुहलुकारी व संगीत से नवाज़ा। उनकी जन्दमीं के जन्मदिन 18 जुलाई उनके शरद्धांजलि के तौर पर यह लेख प्रस्तुत है।

यह लेख पाकिस्तान और भारत की सामजिक और रंगनैतक परिस्थितियों में उस्ताद मेहंदी हसन जैसे गायकों के उभर व उनके द्वारा मी़, मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़', हबीब जालिब, नासिर काज़मी जैसे इंग़िलाबीय व कई तर्क्क़ीपसंद शायरों के साथ उनके संगीत के सफर को समर्पित है। दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप में 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे ने जिस बड़े पैमाने पर कट्लेयर, सामाजिक, धार्मिकता और वैनिटी की भावनाओं को फैलाया उसकी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलती, जिसके पीछे साम्राज्यवाद ताकतों और उनके पिछलग्गू सामंती-अभिजात वर्ग का हाथ था। इस बंटवारे के बाद जिस तरह से दोनों देशों में और इस पूरे उपमहाद्वीप में सामाजिक व सांस्कृतिक विविधताओं को तरजीह देने में भारी अवरोध उत्पन्न हुए वे साक्ष्य हैं।