जो चाणक्य के उसूलों का पालन नहीं करता, वह शायद जेटली हो जाता है
केंद्रीय सत्ता और पार्टी की बागडोर तीन लोगों ने संभाल रखी है। प्रधानमंत्री मोदी-अमित शाह और अरुण जेटली। ऐसे में जेटली का इस्तीफा प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होगा।
महेंद्र मिश्रा
मास्को से खबर है कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय राष्ट्रगान के समय उसके खत्म होने का भी इंतजार नहीं किया और वह चल पड़े। फिर किसी रूसी सुरक्षाकर्मी के याद दिलाने पर वह सावधानी की मुद्रा में खड़े हुए। दरअसल प्रधानमंत्री सशरीर भले रूस चले गए हों, लेकिन उनका दिमाग भारत में ही है, क्योंकि यहां उनका दाहिना हाथ भ्रष्टाचार के आरे में फंस गया है और वह कटने के कगार पर है।
मोदी जी अपने प्रधानमंत्रित्व काल के सबसे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। डीडीसीए प्रकरण जेटली के रास्ते उनकी गर्दन तक पहुंच गया है। हालांकि कीर्ति आजाद का निलंबन कर पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह अरुण जेटली के साथ है। बावजूद इसके विपक्ष की घेरेबंदी और पार्टी के भीतर जेटली विरोधियों की शह पार्टी की पूरी रणनीति पर भारी पड़ रही है।
जेटली को मोदी का चाणक्य बताया जाता है, लेकिन जो चाणक्य के उसूलों का पालन नहीं करता, वह शायद जेटली हो जाता है। चाणक्य अनायास चाणक्य नहीं थे। वह ईमानदारी की मिसाल थे। उनके अपने घर में सरकारी और निजी दो दीपक रखने की कहानी से ज्यादातर लोग वाकिफ होंगे। दिमाग रखने भर और उसका इस्तेमाल करने से कोई चाणक्य नहीं बन जाता। उसके लिए उसकी सलाहियत भी सीखनी पड़ती है और उस पर चलना भी पड़ता है। लेकिन मोदीजी के चाणक्य इन नैतिकताओं से परे षड़यंत्र के मास्टर और पार्टी-सरकार में हर उठापठक के केंद्रक के तौर पर जाने जाते हैं। कब किसको कहां बैठाना है, किसको कितना गिराना है किसको कितना उठाना, यह सब कुछ उनके चैंबर में तय होता है। यहां तक कि जरूरत पड़ने पर मीडिया को भी इसमें इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया जाता। अनायास नहीं ललित प्रकरण में सुषमा स्वराज पानी मांगने लगी थीं। और एक दूसरे मामले में गडकरी को पसीने छूट गए थे। इन प्रकरणों के पीछे जेटली का हाथ बताया जाता है।
जेटली को बीजेपी की एक दूसरी महिला नेता स्मृति ईरानी ने सार्वजनिक तौर पर भगवान करार दिया है, लेकिन जैसी भक्त हैं वैसे उनके भगवान। जेटली पिछले तकरीबन 35 सालों से कोई चुनाव नहीं जीतने के बाद भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बने हुए हैं। इस बीच पार्टी भी उन्हें चोर दरवाजे से संसद भेजती रही। जेटली जनता के नेता भले न बन पाए हों, वकील बड़े हैं। लेकिन काली कोट में भी वह जनता की नहीं बल्कि कारपोरेट और कंपनियों की ही वकालत करते रहे हैं। कई बार तो उन्होंने काले कारनामों से जुड़े लोगों को भी बचाने से परहेज नहीं किया। भोपाल गैस त्रासदी पर कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने वाली बीजेपी के इस बड़े नेता ने ही एंडरसन का केस लड़ा था। ऐसे ही थोड़े नियमित तौर पर वकालत नहीं करने के बावजूद जेटली जी 120 करोड़ की संपत्ति के मालिक बन गए। यह दौलत अमृतसर में उनके प्रतिद्वंदी रहे पटियाला के राजा अमरिंदर सिंह की संपत्ति से भी ज्यादा है। संपत्ति इजाफे के मामले में जेटली ने किसी पूंजीपति को भी मात दे दी है। 2009 में उनके पास 23 करोड़ संपत्ति थी (राज्यसभा में उनके दाखिल शपथपत्र के मुताबिक) जो अब बढ़कर 120 करोड़ से ज्यादा हो गई है। पांच सालों में संपत्ति का इतना इजाफा किसी चमत्कार से कम नहीं है। आय के इन स्रोतों के बारे में देश के वित्तमंत्री को जनता को जरूर बताना चाहिए। नामी गिरामी वकील राम जेठमलानी बुढ़ापे तक भी इतनी संपत्ति नहीं जमा कर सके हैं।
डीडीसीए घोटाले ने एक बार फिर बिहार के चारा घोटाले की याद ताजा कर दी है। इस घोटाले में लैपटाप के एक दिन के किराये की राशि 16 हजार बताई गई है। इस राशि में एक नया लैपटाप आ सकता था (अगर थोक के हिसाब से लिया जाता)। प्रिटंर का प्रतिदिन का किराया 3 हजार रुपये बताया गया है जो उसके तकरीबन दाम के बराबर है। ऊपर से कारपोरेट को स्टेडियम के बाक्स किराये पर देने के गोरखधंधे से कितनी कमाई हुई, उसका हिसाब आना बाकी ही है। ऊपर से आगे अगर पंडोरा बाक्स खुला तो जेटली के लिए उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।
केपीएस गिल हाकी में घोटाले की नई कहानी लेकर आ गए हैं। उसमें अपनी बेटी की वकील के तौर पर नियुक्ति कराकर जेटली पर परिवार के जतन की भी व्यवस्था करने का आरोप है।
दरअसल जेटली के बाहर कम पार्टी के भीतर ज्यादा दुश्मन हैं। अब यही मौका है, जब लोग अपनी पूरी कसर निकाल लेना चाहते हैं। अनायास नहीं जेटली के साथ कोर्ट में पार्टी के केवल एक ही बड़े नेता वेंकैया नायडू गए और वह भी मोदी जी के निर्देश पर। संसदीय दल की बैठक में अपील करने के बाद ही राजनाथ सिंह ने बयान जारी किया। लेकिन सुषमा और गडकरी अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं। केंद्रीय सत्ता और पार्टी की बागडोर तीन लोगों ने संभाल रखी है। प्रधानमंत्री मोदी-अमित शाह और अरुण जेटली। ऐसे में जेटली का इस्तीफा प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित होगा। शायद यही वजह है कि मोदी जी ने सीधे जेटली से इस्तीफा नहीं मांगा।
तमाम मोर्चों पर नाकामी के बाद प्रधानमंत्री को भ्रष्टाचार पर आखिरी उम्मीद थी। इसलिए उन्होंने इस दिशा में पहल की। लेकिन ‘प्रथम ग्रासे मच्छिका पातम’। दिल्ली सचिवालय में गए थे केंचुआ पकड़ने, निकल आया सांप। और अब उसके आगे मोदी जैसे ओझा भी सारे मंतर भूल गए हैं।
मोदी जी की मुश्किल यह है कि अगर जेटली से इस्तीफा लें तो सरकार का नुकसान। न लेने पर बची खुसी साख के भी जाने का खतरा। लेकिन खाई और कुएं में से किसी एक को चुनना उनकी मजबूरी है। हालांकि इस बीच सारी समस्याओं से निजात पाने और भविष्य के रास्ते की तलाश के लिहाज से एक नये राग की शुरुआत कर दी गई है। वह है मंदिर राग।
इससे निजात पाने का जेटली ने जो तरीका निकाला वह बेहद घातक साबित हो सकता है। कोर्ट में मानहानि के मुकदमे में पासा पलटने का खतरा है। अगर कोर्ट को लग गया कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह उसकी जांच के आदेश दे सकता है। फिर उसके बाद जेटली का अपनी कुर्सी पर बने रहना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में जो काम विपक्ष सरकार से नहीं करा पाया वह कोर्ट से हो जाएगा। मामले में राम जेठमलानी का केजरीवाल के पक्ष में उतरना उनके लिए संभावनाओं को और कम कर देता है। ऊपर से कोर्ट में मामला चलने तक यह पार्टी और सरकार दोनों के लिए मुद्दा बना रहेगा। कुल मिलाकर एक राजनीतिक लड़ाई को कानूनी लड़ाई में ले जाकर उन्होंने खुद ही अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने का काम किया है।
जेटली जी को संसद में दिए अपने खुद के वक्तव्य का पालन करना चाहिए। हेरल्ड प्रकरण पर बहस के दौरान संसद में उन्होंने कहा था कि सीजर की पत्नी को संदेहों से ऊपर होना चाहिए। ऐसे में क्या उन्हें इस्तीफा देकर अपनी ही कसौटियों पर खरा उतरने की जरूरत नहीं है। शायद प्रधानमंत्री भी आडवाणी का उदाहरण देकर उसी तरफ इशारा कर रहे हैं।
महेंद्र मिश्रा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।