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कोलकाता। महाश्वेता दी के शब्दों में कोलकाता में ममता बनर्जी की शहीद दिवस रैली में जनसमुद्र उमड़ा पड़ा था, जैसा कf हर साल होता रहा है। लेकिन इस जनसमुद्र को केंद्र की आर्थिक नीतियों के बारे में दीदी ने कुछ भी नहीं बताया जबकि वे भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति पर मिसाइलें दागती रहीं।

खुदरा बाजार, प्रतिरक्षा, बीमा, मीडिया समेत सभी संवेदनशील सेक्टरों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खिलाफ, रेलवे और बैंकिंग समेत सारे सरकारी उपक्रमों के निजीकरण के खिलाफ, सारे कायदे कानून तोड़ने के खिलाफ, गाजा संकट पर भारत सरकार की खामोशी के खिलाफ और कुल मिलाकर आर्थिक सुधारों के खिलाफ उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा।

गौरतलब है कि कभी खुद देश की रेल मंत्री रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अभी पिछले 8 जुलाई को रेल बजट में अपने राज्य की अनदेखी पर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की थी। तब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रक्षा और रेलवे सरीखे क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) शुरू कर 'देश को बेचने' का आरोप लगाया। उस दिन ममता ने हुगली जिले में एक समारोह में कहा, "भारतीय जनता पार्टी रेलवे में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लाना चाहती है। मोदी सरकार देश को बेचना चाहती है..घरेलू उद्योगपति कहां जाएंगे? मोदी को चुनाव के समय ही कह देना चाहिए था कि देश एफडीआई के हाथ में सौंप दिया जाएगा।..यह तो जनता के साथ धोखा है।"

लेकिन इतनी बड़ी शहीद दिवस रैली में वे इस मुद्दे पर बोलना भूल गयीं।

दरअसल,राज्यों की सत्ता पर काबिज क्षत्रपों की दरिद्रता दयनीय है। सत्ता में टिके रहने के लिए केंद्र के खिलाफ जिहादी तेवर अपनाना वोट बैंक साधने के लिए अनिवार्य है तो केंद्रीय मदद और सहयोग की खातिर केंद्रीय सत्ता के खिलाफ चूं तक करने की गुंजाइश नहीं होती।

दीदी की तो कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है लेकिन दशकों तक हम विचारधारा और प्रतिबद्धता वाले लोगों का यह कारनामा देखा है और तेईस साल के अश्वमेध अभियान के पल पल इस हकीकत की जमीन पर लहूलुहान होते रहे हैं।

कोलकाता में शहीद दिवस के मौके पर पहली बार सत्ता में आने के बाद तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कांग्रेस और वामदलों को बख्श दिया और शुरु से आखिर तक भाजपा के सांप्रदायिक राजनतिक चरित्र पर प्रहार करती रहीं वे। पार्टी की ओर से सोमवार को यहां आयोजित शहीद रैली के दौरान पार्टी प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निशाने पर भाजपा ही रही। इससे पहले तक वे माकपा पर हमले बोलती रही थीं।

यहां तक कि खिसकते जनाधार के मध्य वाम कार्यकर्ताओं और नेताओं से भाजपा में शामिल न होने की हैरतअंगेज अपील करते हुये उनसे तृणमूल में शामिल होने की अपील भी कर दी।
सालाना 21 जुलाई की कोलकाता रैली में राज्यभर से लाखों की तादाद में लोगों का जमावड़ा हुआ। 1993 में युवा कांग्रेस की ओर से राज्य सचिवालय अभियान के दौरान हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए तेरह कार्यकर्ताओं की याद में ममता हर साल 21 जुलाई को शहीद दिवस मनाती हैं।
दीदी ने अभूतपूर्व ढंग से अपना भाषण आधे घंटे में ही निपटा दिया। भाजपा के खिलाफ अविराम हमले के मध्य अपने दल के भीतर बन रहे लाबी और गुटबंदी के खिलाफ भी वे खूब बोली। पार्टीजनों को जबरन वसूली न करने के लिए चेताय़ा। जांच एजेंसियों से तस्वीर बनाकर चुनाव लड़ने की बात न मानने वाली दीदी ने फिर लिखकर, तस्वीरें बनाकर चुनाव लड़ते रहने का ऐलान भी किया।

हालांकि उनके भाषण का तेवर बेहद आक्रामक रहा भाजपा के खिलाफ तो बागी तृणमूलियों को चेताने में भी उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी।

बहरहाल ममता बनर्जी ने भाजपा पर राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में दो सीटें जीतने के बाद भाजपा राज्य में बड़े-बड़े सपने देख रही है। लेकिन उसके सपने पूरे नहीं होंगे। अगले चुनाव में यह दोनों सीटें भी उसके हाथों से निकल जाएंगी।

हालांकि ममता बनर्जी ने ईंधन कीमतों एवं रेल किराए में वृद्धि के लिए भाजपा की सोमवार को आलोचना भी की। रैली में लाखों समर्थकों को संबोधित करते हुये तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता ने भाजपा पर चुनाव के दौरान लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया।

ममता ने रैली में कहा, “चुनाव से पहले उन्होंने कुछ और कहा था, जबकि चुनाव के बाद उन्होंने बिल्कुल विपरीत काम करना शुरू कर दिया। सत्ता में आने के एक माह के भीतर उन्होंने ईंधन की कीमत और रेल किराए में वृद्धि कर दी। हम इसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।”

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि भाजपा पश्चिम बंगाल में दंगों को बढ़ावा देना चाहती है। लेकिन उन्होंने चेताया कि उनके राज्य में विभाजनकारी नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

ममता ने कहा, “वे राज्य में साम्प्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देना चाहते हैं। लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे। बंगाल की धरती पर साम्प्रदायिकता के लिए कोई स्थान नहीं है।”

दीदी ने बाकायदा ऐलान भी कर दिया,“राज्य से भाजपा के पास एक संसदीय सीट थी। इस चुनाव में उनकी एक सीट बढ़ गई। लेकिन उनके रवैए से लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ हासिल कर लिया है। उनके पास इस वक्त दो सीटें हैं। लेकिन सीटों की यह संख्या कभी तीन नहीं होगी और अगले आम चुनाव में यह घटकर शून्य हो जाएगी।”

वाम मोर्चा के चेयरमैन ने दीदी के भाजपाई संबंध पर सवाल तो उठाये, लेकिन उनकी जिहाद के स्वर में आर्थिक सुधारों के विरोध की अनुपस्थिति पर कोई सवाल नहीं किये।

दीदी ने आधे घंटे तक भाषण दिया और शायद उससे ज्यादा वक्त जनता से नारे लगाती रहीं। जिलों, स्थानों, व्यक्तियों को तृणमूल बताने के नारे थे वे। बेसिक और बुनियादी मुद्दों से जुड़े नारे कतई नहीं थे।

इस रैली में एक वाम महिला विधायक भी तीन कांग्रेसी विधायकों के साथ तृणमूल में शामिल हो गयीं और वाम माने जाने वाले कई और बुद्धिजीवी कलाकार भी दीदी के साथ खड़ी नजर आयीं। इन्हीं के मध्य दीदी के भाषण के मध्य प्रख्यात लेखिका महाश्वेता दी भी आ गयीं जिनसे दीदी ने अपना वक्तव्य पेश करने के लिए बोलने को कहा। वे दीदी और रैली की तारीफ ही करती रहीं और उन्होंने भी जनसंहारी सत्ता के खिलाफ एक शब्द खर्च नहीं किये।

दीदी की खामोशी हैरतअंगेज है जबकि अल्पसंख्यकों को अपने हक में खड़ा करने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। अपना भाषण उन्होंने रमजान मुबारक, खुदा हाफिज और इंशाल्ला जैसे जुमलों के साथ खत्म किया।

लेकिन रिजवानुर की मां, दीदी के सत्ता में आने के बाद पहलीबार रैली के मंच पर नहीं दिखीं। ऐसा गौर तलब है क्योंकि रिजावनुर मामले में अभियुक्त लाल बाजार के अफसर ज्ञानवंत सिंह को दीदी ने हाल ही में प्रोमोट करके मुर्शिदाबाद जिले में एसपी बनाया है। रछपाल सिंह और सुल्तान सिंह के बाद ज्ञानवंत तीसरे बड़े पुलिस अफसर हैं जिन पर दीदी मेहरबान हो गयीं। रिजवानुर की मां के साथ रैली मंच पर हर साल की तरह शहीद परिवारों के चेहरे भी नहीं थे। दोनों मामलों में कोई संबंध है या नहीं, अभी इसका भी पता नहीं चला है।

गौरतलब है कि गाजा संकट के मध्य रमजान महीने में विश्वभर में मुसलमान जब इजरायली हमलों में मारे जा रहे बेगुनाहों के लिए गमगीन हैं, दीदी एक बड़े विवाद में भी फंस गयीं। दरअसल तृणमूल कांग्रेस ने रमजान के पवित्र महीने में सहरी और इफ्तार का एक टाइम टेबल छपवाया है, जिसमें ममता बनर्जी की तस्वीर भी छापी गई है। इस टाइम टेबल और उस पर छपी ममता की तस्वीर को लेकर मुस्ल‍िम समुदाय में काफी रोष है।

सूत्रों के अनुसार इस टाइम टेबल में जहाँ एक तरफ ममता बनर्जी मुस्ल‍िम भाईयों को इस पवित्र त्योहार की बधाई दे रही हैं, वहीं उनके पीछे मक्का की तस्वीर लगाई गई है। इस पर मुस्ल‍िमों का कहना है कि मक्का जैसी पवित्र जगह की तस्वीर पीछे छपवाकर सीधे-सीधे मुसलमानों का अपमान किया गया है।

मुस्ल‍िमों का कहना है कि ममता ने अपनी नमाज पढ़ते हुये तस्वीर छपवाकर ठीक नहीं किया है और ये मुस्ल‍िम धर्म के खि‍लाफ है। मुस्ल‍िम धर्म में किसी भी तस्वीर या मूर्ति का पूजन मना है। गौरतलब है कि मक्का मुसलमान का सबसे बड़ा धर्मस्थान है। बर्दवान के मुसलमानों का कहना है कि ये मक्का की तौहीन है, और तो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इफ्तार पार्टी आयोजन पर भी बर्दवान के मुस्लि‍मों को ऐतराज है।

उनका कहना है कि ममता ढोंगी हैं, ड्रामा कर रही हैं और उन्हें इस तरह की राजनीति बंद करनी चाहिए। मुस्ल‍िम धर्म गुरुओं का कहना है कि लीफलेट छपवाना ममता का एक पब्ल‍िसिटी स्टंट है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी अक्सर कहती हैं कि वो मुस्ल‍िम धर्म को मानती हैं लेकिन वो इस धर्म को दिल से नहीं मानतीं हैं।