भारतीय क्रिकेट ने विश्व कप जीत कर एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि इस समय क्रिकेट जगत में भारत का ही पहला सब्से बुलंद है। मुंबाई के वानखेड़े स्टेडियम में आयोजित फाइनल मैच में भारत ने पूर्व विश्व कप चैम्पियन रही श्रीलंका की टीम को 6 विकेट से पराजित कर विश्व विजेता के ताज से देश को सुशोभित किया। क्रिकेट के इतिहास में भारत दूसरी बार विश्व विजेता बनने में सफल रहा। विश्वकप क्रिकेट प्रतियोगिता का अंतःस्रावी स्तर का यह आयोजन जहां दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों को रोमांचित कर गया वहीं यह आयोजन अपने पीछे तमाम खट्टे-मीठे यादों को भी छोड़ गया। वैसे तो किसी भी दो अलग-अलग टीमों के बीच प्रतिस्पर्धा के मध्य अत्यधिक उत्साह का होना तो एक आम सी बात है। परंतु जब यही जोश और उत्साह किसी की जान को जोख़िम में डाल दे, किसी के लिए अपनापन या इंसान का कारण बन जाए, कहीं सांप्रदायिक तनाव पैदा कर दे या प्रतिस्पर्धियों की खिलाड़ियों की जान का दुश्मन बन जाए तो इसे आिख़र खेल या खेल संदर्भ को कोई घटक नहीं कहा जा सकता। वास्तव में खेल का तकाज़ा तो यही है कि इसके माध्यम से दर्शकों का मनोरणजन हो सके। दूसरी ओर खेल के प्रति दर्शकों का अथवा खेल प्रशंशकों का दायित्व भी यही होता है कि वे हमेशा अच्छे खेल तथा अच्छे खिलाडियों की प्रशंसा करें तथा तालियाँ बजाकर किसी भी खिलाड़ी की अच्छी खेल की प्रदर्शन की होंसला अफजाई करें। परंतु ऐसा लगता है कि दर्शकों तथा खिलाड़ियों की इस निष्ठा में काफी कमी आती जा रही है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों इसी विश्वकप श्रृंखला का एक मैच भारत व आस्ट्रेलिया के मध्य अहमदाबाद में आयोजित हुआ। हालाँकि भारत इस मैच में भी विजेता रहा परंतु आस्ट्रेलियाई टीम के कप्तान रिकी पोंटिंग ने इस मैच में एक शानदार शतक दागा। देखा गया कि पोंटिंग के शतक बनने पर दर्शकों ने कोई विशेष उत्साह का प्रदर्शन नहीं किया। जिससे पोंटिंग को कुछ मायूस होना पड़ा। इसे खेल भावना का सत्कार हरगिज नहीं कहा जा सकता। उदाहण के तौर पर पिछले दिनों इसी विश्वकप श्रृंखला का एक मैच भारत व आस्ट्रेलिया के मध्य अहमदाबाद में आयोजित हुआ। हालाँकि भारत इस मैच में भी विजेता रहा परंतु आस्ट्रेलियाई टीम के कप्तान रिकी पोंटिंग ने इस मैच में एक शानदार शतक दागा। देखा गया कि पोंटिंग के शतक बनने पर दर्शकों ने कोई विशेष उत्साह का प्रदर्शन नहीं किया। जिससे पोंटिंग को कुछ मायूस होना पड़ा। इसे खेल भावना का सत्कार हरगिज नहीं कहा जा सकता।