देखा सरऊ के, थूक के चाट लीह्स छिनरौ....का
देखा सरऊ के, थूक के चाट लीह्स छिनरौ....का
बड़के भईया बड़े गुस्सेवर और कड़क मिजाज़ आदमी थे।
जल्दी किसी को मुंह नहीं लगाते थे, घर के लोग बड़के भईया से सहमे-सहमे रहते थे। घर के छोटे तो छोटे, बुज़ुर्ग लोग तक बड़के भईया से डरते थे। एकाध बार किसी बुज़ुर्ग ने बड़के भईया को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश की भी तो बड़के भईया ने उल्टा उन बुजुर्गों को ही डांट फटकार के किनारे लगा दिया था।
नतीजा ये हुआ कि अब घर का कोई भी काम हो वो बुज़ुर्ग लोग ख़ामोशी से किसी कोने में बैठे टुकुर-टुकुर ताका करते थे। कुछ बोलने की हिम्मत भी करते तो बड़के भईया के डर से लोग उन्हें या तो चुप करा दिया करते या उनकी बात पर कान ही न धरते थे।
बड़के भईया का रुआब ऐसे ही चल निकला, वो घर में जिस रौब-दाब से रहते उससे उनका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर जा पहुंचा और अपने बारे में ढेर सारी गलतफहमियां भी हो गयीं। नतीजा ये निकला कि इसी रुआब में बड़के भईया आस-पास के छुटके पड़ोसियों को भी चापने की फिराक में रहने लगे।
एक दिन मोहल्ले के एक दावत कार्यक्रम में छुटके भईया नाम के पड़ोसी को आता देख बड़के भईया ने उसकी बेईज्जती करने के इरादे से गर्दन फिरा ली और अखबार उठा कर पढने लग गए। शिष्टाचार/सामान्य नैतिकता के तहत हाथ मिलाना भी ज़रूरी नहीं समझा। पड़ोसी छुटके भईया को यह बात नागवार गुजरी। आसपास के तीन चार और लोग जो उस दावत में शामिल थे वो भी बड़के भईया की दबंगई/बेरुखी को देख तप गए, सबने मिलकर उन्हें सबक सिखाने की सोची।
अगले दिन अचानक से एक खबर उड़ गयी कि अगली दावत अब से बाबू पहलवान को भी शामिल किया जाएगा। बाबू पहलवान को शामिल किये जाने का नाम सुनके बड़के भईया की हवा ढीली हो गयी। वो बड़के भईया के घराने को एक बार पहले भी लाल लंगोट पहन कर पटखनी दे चुका था। काम धंधे के मामले में भी वो बड़के भईया को पछाड़े हुए था।
लिहाज़ा बड़के भईया को चिंता होनी लाज़मी थी, हुई भी, परेशानी में सलाहकारों को फोन लगाया, एकाध मीटिंगे कीं, सबने मिलकर बड़के भईया को एक ही सलाह दी की आप अब पडोसी छुटके भईया को मनाइये, ज़रा प्यार मुहब्बत दिखाइए, जैसे उसे आपने उस दिन बुलाया था जब आप "दूल्हा" बने थे और लपक के गले मिले थे।
बड़के भईया को समझ आई। अगले दिन छुटके से मुलाक़ात क। ,प्यार से हाथ मिलाया,कुछ ताने शिकवे गिले और मलामत के बाद माहौल सामान्य सा नज़र आने लगा। बड़के भईया की चिंता कुछ कम हुई। बाबू पहलवान की चर्चाओं को कुछ विराम लगा, बड़के भईया ने राहत की साँस ली।
घर पे बैठे लोगों को सारे घटनाक्रम की जानकारी मिल ही रही थी, बड़के भईया से तपे बैठे एक बुज़ुर्ग चिहुंक के बोले,
-"देखा सरऊ के, थूक के चाट लीह्स छिनरौ....का-"
डिस्क्लेमर-इस कथानक के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक हैं, इस पूरे घटनाक्रम का हालिया सार्क बैठक से कोई लेना देना नहीं है, यदि दोनों घटनाओं या किरदारों में कोई समानताएं पाई जाती हैं तो यह मात्र संयोग होगा।
O- इमरान रिज़वी


