श्यामा राय की कविताएँ

देवदासी

सजीव,
एक प्राणिमात्र
एक स्त्री
नारी समाज जिसका समुदाय
स्त्रीत्व जिसका व्यक्तित्व
प्रेम, वात्सल्यता की देवी
नहीं, नहीं,
भूल हो गयी
देवी नहीं, मूरत
देवियों की पूजा होती है
देवी दासी नहीं बन सकती
लेकिन कुछ अधर्मी हैं
जो पूजते हैं
दुर्गा और लक्ष्मी को
पर लक्ष्मी स्त्री हो तो?
तो क्या,
देवियों को भी दासी बनाते हैं
अपमानित करते हैं
उनका शोषण भी करते हैं
फिर लक्ष्मी दासी बन जाती है
पाखण्डियों के घिनौने जाल में
जैसे कि
मछली का शिकार करता बगुला
दुष्कर्मी लक्ष्मी के लज्जा रूपी धन का
हनन करते हैं
बेरोकटोक
अमानवीयता का नंगा नाच दिखाते हुए
देवी दासी बन जाती है
अस्वीकृति बहिष्कृत कर दी गयी है
कण्ठ अवरुद्ध है
तन पर रेशमी वस्त्र है
मग़र लक्ष्मी निर्वस्त्र हो चुकी है
अपनी ही दृष्टि में
स्त्री होने का भूल कर बैठी है
जिस दुःस्वप्न की कल्पना
न की थी
उसे ही अपनी नियति मान चुकी है
सर्वस्व न्यौछावर कर
प्रायश्चित कर रही है
देवी दासी बन गयी है
भोगियों के प्रहार से
आहत हो रही है
फ़िर भी समर्पण कर रही है
देवदासी हो रही है।

2. देवदासी ही हूँ
दासी हूँ मैं
देवों की नहीं
वरन् पुरुषों की
पुकारते सब मुझे
देवदासी
अचम्भित क्यूँ हो?
सदियों से हो रहे छलावे का
प्रमाण हूँ मैं
देवदासी हूँ मैं
ये सुन्दर अम्बर और अलंकार
मोलभाव करते हैं
मेरे मृत्तिक काया की
और मेरे अंतर्मन की भी
पाजेबों की झंकार में
छुपाती फिरती हूँ,
करुण रुदन की सहस्त्रों परतें
पर तनिक न विचलित हूँ
कि
देवदासी हूँ मैं
गजरे की अनेकों पंखुड़ियाँ
जो तुमको लुभाती हैं
उनमें पिरोएं हैं मैंने
वेदना के अनगिनत किस्से
ताकि
रजनीगन्धा की महक में
डूब सको तुम
कि मैं छुपा सकूँ वो
श्वास अवरोधक दुर्गन्ध
जो इस प्रांगण रूपी नर्क से निकलता
हरेक क्षण मुझको बाध्य करता
मृत्यु के समीप धकेलता
स्मरण कराता मुझे
मेरे अस्तित्व का
मेरे व्यक्तित्व का
परिचय कराता है मुझसे
कि देवदासी ही हूँ
मीरा-सी नहीं
कृष्ण-दासी नहीं
वरन,
भोग-विलासिता की दासी हूँ
देवदासी हूँ मैं।